युवराज को बाहर करते हुए शास्त्री और कोहली ने धोनी को भी दे दिया है इशारा !

श्रीलंकाई दौरे पर गई विराट कोहली की कप्तानी में टीम इंडिया टेस्ट में कमाल का प्रदर्शन करते हुए मेज़बानों का क्लीन स्वीप करने में क़ामयाब रही। 3 टेस्ट मैचों में से दो में पारी की जीत दर्ज करने वाली भारतीय क्रिकेट टीम का ये घर से बाहर ये चौथा क्लीन स्वीप था और श्रीलंका के ख़िलाफ़ उन्हीं के घर में पहला।

टेस्ट के बाद भारत को 5 वनडे और एकमात्र टी20 खेलना है, 20 अगस्त से शुरू होने वाली इस सीमित ओवर की सीरीज़ के लिए टीम इंडिया का ऐलान कर दिया गया। जिसकी कमान विराट कोहली के ही कंधों पर है लेकिन आर अश्विन, रविंद्र जडेजा और मोहम्मद शमी को सीमित ओवर की सीरीज़ से आराम दिया गया है। जबकि वनडे से युवराज सिंह का पत्ता काट दिया गया है और सुरेश रैना की भी वापसी की उम्मीदें ख़त्म हो गईं, लेकिन महेंद्र सिंह धोनी विकेटकीपर के तौर पर टीम में बरक़रार हैं।

ऐसा माना जा रहा है कि चयनकर्ताओं ने कोच रवि शास्त्री और कप्तान विराट कोहली से सलाह-मशवराह करते हुए मिशन वर्ल्डकप 2019 के मद्देनज़र टीम का चयन किया है। यही वजह है कि इंग्लैंड के ख़िलाफ़ वनडे क्रिकेट में वापसी करने वाले बाएं हाथ के विस्फोटक बल्लेबाज़ युवराज सिंह को टीम में शामिल नहीं किया गया है, चयनकर्ताओं के मुताबिक़ युवराज की फ़ॉर्म से ज़्यादा चिंता का विषय उनकी फ़िट्नेस है।

चैंपियंस ट्रॉफ़ी से लेकर वेस्टइंडीज़ दौरे में भी युवराज की फ़िट्नेस और मैदान पर लचर फ़िल्डींग उन्हें बाहर बैठने का सबसे बड़ा कारण बनी है। दिसंबर में 36 वर्ष के होने वाले युवराज की जगह टीम में दाएं हाथ के मध्यक्रम बल्लेबाज़ मनीष पांडे को शामिल किया गया है जो योग्य भी हैं। तो वहीं आर अश्विन, रविंद्र जडेजा और मोहम्मद शमी को आराम देकर बेंच स्ट्रेंथ को मौक़ा देना और रोटेशन पॉलिसी के तहत हर एक खिलाड़ी को मैच फ़िट रखने पर भी ज़ोर दिया गया है।

जडेजा की जगह जहां टीम में अक्षर पटेल को एक बार फिर मौक़ा मिला है तो अश्विन की जगह युजवेंद्र चहल को लाया गया है जबकि शमी के स्थान पर शार्दुल ठाकुर के रूप में इकलौता नया चेहरा है। शार्दुल सीधे दक्षिण अफ़्रीका दौरे से टीम के साथ जुड़ेंगे, ठाकुर भारत-ए के साथ प्रोटियाज़ दौरे पर थे जहां उन्होंने त्रिकोणीय सीरीज़ में भारत-ए को चैंपियन बनाने में अहम योगदान दिया था और फ़ाइनल में 3 विकेट भी झटके थे।

लग तो ऐसा रहा है कि चयनकर्ताओं ने एक संतुलित और भविष्य को ध्यान में रखते हुए टीम चुनी है। लेकिन दिनेश कार्तिक के शानदार फ़ॉर्म में होते हुए एक बार फिर उन्हें टीम से बाहर करना सभी को हैरान भी कर रहा है। कार्तिक ने चैंपियंस ट्रॉफ़ी में जितने भी मौक़े मिले थे, उसे बख़ूबी भुनाया था और फिर वेस्टइंडीज़ में भी कार्तिक का प्रदर्शन अच्छा ही रहा था। उसके बावजूद कार्तिक पर गाज क्यों गिरी इसका जवाब चयनकर्ताओं के पास नहीं है।

# इसलिए कार्तिक पर गिरी गाज ?

इस टीम को अगर ध्यान से देखा जाए तो आप भी समझ जाएंगे कि इसमें भूत से लेकर भविष्य तक का ध्यान इस तरह रखा गया है कि बदला भी पूरा हो जाए और संतुलन भी नज़र आए। ज़रा सोचिए और याद कीजिए दिनेश कार्तिक को टीम में वापस लेकर कौन आया था ? जवाब है अनिल कुंबले, और फिर पूर्व कोच अनिल कुंबले और विराट कोहली की अनबन की वजह सभी के सामने है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसी अनबन का ख़ामियाज़ा कार्तिक को उठाना पड़ गया।

# तो फिर कुलदीप कैसे बच गए ?

आप सोच रहे होंगे कि अगर ऐसा होता तो फिर कुलदीप यादव कैसे ? क्योंकि कुंबले और कोहली के बीच के विवाद की शुरुआत तो धर्मशाला में कुलदीप यादव को टीम में शामिल करने से हुई थी, कोहली नहीं चाहते थे कि कुलदीप खेलें और जब उनकी ग़ैरमौजूदगी में कमान अजिंक्य रहाणे ने संभाली तो कुंबले ने कुलदीप को टेस्ट कैप दिलवा दी। और उसी मैच में 4 विकेट लेते हुए कुलदीप ने अपने चयन को सिद्ध करते हुए कोहली को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा तो नहीं दिया लेकिन कुंबले के साथ उनकी लड़ाई की शुरुआत यहीं से हो चुकी थी।

अगर आप ध्यान दें तो मौजूदा श्रीलंकाई सीरीज़ में भी कुलदीप यादव पहले दो टेस्ट बाहर ही बैठे थे और उन्हें मौक़ा तब मिला जब जडेजा पर एक मैच का बैन लगा और उस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए कुलदीप ने फिर विकेट का चौका लगा दिया। शायद यही कारण था कि उसी शाम हुए सेलेक्शन में कुलदीप को 15 खिलाड़ियों में शामिल कर लिया गया।

# क्या युवराज सिंह के करियर पर लग गया विराम ?

अब बात युवराज सिंह की, जिन्हें बाहर करते हुए शास्त्री, कोहली और चयनकर्ताओं ने एक बड़े और बोल्ड फ़ैसले के साथ साथ बड़े बदले की नींव भी तैयार कर ली है। इसमें कोई शक नहीं है कि युवराज की फ़िट्नेस और उम्र फ़टाफ़ट क्रिकेट में उनके आड़े आ रही थी और युवराज की यही कमज़ोरी रवि शास्त्री और विराट कोहली के बड़े बदले की बड़ी ताक़त बन गई। अभी युवराज को ये कहकर आराम से बाहर कर दिया गया कि युवी की फ़िट्नेस और उम्र टीम इंडिया के मिशन 2019 के बीच आड़े आ रही है और वह वहां फ़िट नहीं बैठ पा रहे।

# युवराज को बाहर करना धोनी के लिए इशारा है !

तो उम्र तो महेंद्र सिंह धोनी की भी 36 के पार हो गई है और वर्ल्डकप तक वह भी 37 साल के हो जाएंगे। यानी कोहली और शास्त्री ने एक संकेत दे दिया है कि युवराज के बाद अगला नंबर कैप्टेन कूल का ही होगा, एक साथ अगर दो बड़े खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता अभी दिखा दिया जाता तो उन्हें भी पता था कि वह फ़ैसला बोल्ड नहीं कहलाता बल्कि उन्हें ही क्लीन बोल्ड कर सकता था।

मतलब साफ़ है चयनकर्ताओं ने मिशन 2019 वर्ल्डकप को ध्यान में रखते हुए टीम इंडिया का चयन किया है तो शास्त्री और उनके साथी एक ऐसी चाल चल गए जहां न तो उन पर शक होगा और न ही सवाल। अगर कुछ होगा तो बड़ी ही आसानी से उनका ‘मिशन बदला’ क़ामयाब होगा, जिसके लिए उन्होंने युवराज का पत्ता और करियर साफ़ करते हुए धोनी की संन्यास की सड़क भी तैयार कर दी है।

क्या 304 रनों की इस विशाल जीत से टीम इंडिया के फ़ैंस ख़ुश नहीं ?

भारतीय क्रिकेट टीम ने एक नए कोच के साथ श्रीलंकाई दौरे का आग़ाज़ जीत के साथ किया और वह भी 304 रनों की विशाल और रिकॉर्ड जीत। विदेशी सरज़मीं पर रनों के मामले में टीम इंडिया की ये अब तक की सबसे बड़ी जीत है।

विराट कोहली ने भी टेस्ट क्रिकेट में अपना 17वां शतक और भारत को अपनी कप्तानी में 17वीं टेस्ट जीत दिलाई। कोहली के अलावा शिखर धवन भी शानदार वापसी करते हुए टेस्ट करियर की सबसे बड़ी पारी (190 रन) खेल गए, तो चेतेश्वर पुजारा ने भी एक और शतक लगाते हुए मिस्टर कंसिस्टेंट के तमग़े को बरक़रार रखा।

अभिनव मुकुंद और हार्दिक पांड्या ने भी मिले इस मौक़े को शानदार तौर पर भुनाया, कुल मिलाकर टीम इंडिया के लिए ये जीत यादगार रही। वह भी तब जब दौरे से ठीक पहले मुरली विजय चोट की वजह से साथ नहीं जा पाए और मैच शुरू होने के एक दिन पहले के एल राहुल बीमार पड़ गए। पर कोहली एंड कंपनी ने रवि शास्त्री की कोचिंग में किसी तरह की कोई कमी नहीं खलने दी।

इतनी शानदार और यादगार जीत के बाद तो स्वाभाविक है कि भारतीय क्रिकेट फ़ैंस को बेहद ख़ुश होना चाहिए और इस जीत को अपने दिल के बेहद क़रीब मानना चाहिए। मेरे साथ आपका भी जवाब हां में ही होगा, लेकिन सच कहें तो ऐसा कुछ दिखा नहीं या फिर इस ख़ुशी को फ़ैंस ने ज़ाहिर नहीं किया।

क्या आपने भी ऐसा महसूस किया या फिर ये मेरी व्यक्तिगत सोच है ? न सोशल मीडिया पर ख़ुशी की वह लहर देखने को मिली, जो आमूमन भारत की जीत को लेकर दिखती है, और न ही मीडिया ने इसे बहुत ज़्यादा तवज्जो दिया। क्या बिहार में नीतीश कुमार का लालू यादव का साथ छोड़ दोबारा बीजेपी में शामिल हो जाना इस जीत से ज़्यादा बड़ा और हैरान करने वाला था ?

मेरा जवाब न में होगा, क्योंकि धर्म की तरह क्रिकेट को पूजने वाले प्रशंसकों के लिए क्रिकेट और टीम इंडिया की जीत से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। कम से कम क्रिकेट प्रशंसकों के लिए तो हरगीज़ नहीं। तो फिर ऐसी क्या वजह है कि इस विशाल और रिकॉर्डतोड़ जीत ने उन्हें वह ख़ुशी नहीं दी ?

इसको जानने से पहले इस उदाहरण को समझिए, मान लीजिए आप जिससे सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं फिर चाहे वह आपकी बीवी, बेटी, बेटा, माता, पिता, बहन, दोस्त या कोई भी हो अगर उससे आप किसी बात को लेकर नाराज़ हैं तो उसकी ख़ुशी में आपको भी बेहद ख़ुशी तो होती है लेकिन आप उसको ज़ाहिर करने के बजाए चुप रहते हैं ताकि उसे इस बात का अहसास हो कि आप उससे नाराज़ हैं।

बस यहां भी यही हाल है, विराट कोहली और अनिल कुंबले प्रकरण ने भारतीय क्रिकेट फ़ैंस को नाराज़ कर दिया था। फिर आग में घी डालने का काम दूसरे कोच (रवि शास्त्री) की नियुक्ति से लेकर ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ को टीम इंडिया के साथ फ़िलहाल न जोड़ने के शास्त्री के फ़ैसले ने कर दिया। कुंबले-कोहली प्रकरण के बाद जब द्रविड़-ज़हीर के टीम से जुड़ने की ख़बर आई तो एक बार फिर भारतीय फ़ैंस ख़ुशी से झूम उठे थे। लेकिन अचानक ही उन्हें शास्त्री द्वारा दरकिनार करते हुए भरत अरुण को गेंदबाज़ी कोच बनाने के फ़ैसले ने झकझोर दिया।

भारतीय क्रिकेट को क़रीब से देखने वाले और समझने वाले ये जानते हैं कि राहुल द्रविड़ और ज़हीर ख़ान जैसी शख़्सियत टीम इंडिया को किस सुनहरे भविष्य की ओर ले जा सकती थी। ऐसा नहीं है कि उन्हें या हमें रवि शास्त्री और विराट कोहली या टीम इंडिया के खिलाड़ियों पर भरोसा नहीं या उनकी प्रतिभाओं की क़द्र नहीं लेकिन पिछले कुछ महीनों में भारतीय क्रिकेट के साथ जो चीज़ें चल रही हैं उससे वह निराश और उदास हैं।

इस बीच मिताली राज की कप्तानी में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने जिस तरह कमाल करते हुए विमेंस वर्ल्डकप के फ़ाइनल तक जा पहुंची थी, उसने भी भारतीय फ़ैंस की नाराज़गी को थोड़ा कम करते हुए उन्हें एक और विकल्प दे दिया है। जो महिला क्रिकेट के साथ साथ भारतीय क्रिकेट के लिए भी सुखद है।

हालांकि क्रिकेट फ़ैंस की नाराज़गी ज़्यादा दिनों तक रहने वाली नहीं, लेकिन कुछ तस्वीरें जो कैमरे के ज़रिए हम तक और क्रिकेट फ़ैंस तक पहुंच रही हैं वह इस उदासी और अंदर अंदर पल रहे ग़ुस्से को भड़का ज़रूर सकती हैं। गाले टेस्ट के दौरान रवि शास्त्री का हाव भाव और उनका रियेक्शन क़ाबिल-ए-तारीफ़ नहीं था उसमें घमंड की झलक साफ देखी जा सकती थी।

इन चीज़ों से आने वाले वक़्त में रवि शास्त्री और विराट कोहली को बचना होगा, क्योंकि ये तो बस परिवर्तन काल से गुज़र रही श्रीलंका पर जीत है। टीम इंडिया की राहों में असली चुनौतियां तो दक्षिण अफ़्रीका और इंग्लैंड दौरे से होते हुए 2019 क्रिकेट वर्ल्डकप में आएंगी जो रवि शास्त्री और कोहली का इम्तिहान तो लेंगी और इससे उन्होंने सबक़ नहीं लिया तो ये क्रिकेट फ़ैंस की दिलों की दुरियों को पाटने की बजाए बढ़ाने का काम भी कर सकती हैं।

देशभक्त और देशद्रोही का सर्टिफ़िकेट बांटने का हक़ किसके पास है ?

आज कल फिर भारत माता की जय और वंदेमातरम् चर्चा में है, इसे बोलने वाले को देशभक्त और न बोलने वाले को देशद्रोही की सर्टिफ़िकेट ज़ोंरो से बँट रही है। और तो और इसे इस्लाम और धर्म से भी फटाक से जोड़ दिया जाता है बिना समझे और जाने।

मैं ये कहता हूँ कि आख़िर हम ओवैसी, आज़म, साध्वी या इन जैसों की बातों को तवज्जो देकर देश को बाँटने के इनके मक़सद को सही करने में मदद क्यों करते हैं ?? क्या देश में आज चीन, पाकिस्तान, ग़रीबी महँगाई जैसी समस्याएँ ख़त्म हो गईं हैं ?? या उनका हल ढूँढ लिया गया है ??

इन समस्याओं के लिए आप सवाल न पूछें इसलिए ये सियासतदां ऐसी हरकत और ऐसे बयां देकर मुद्दों को भटकाते हैं और हम और आप इसी में उलझ कर रह जाते हैं। और रही बात किसी को कोई चीज़ मानने की या न मानने की तो उसके अंदर हम जाएंगे तो और भी हैरान हो जाएंगे, क्योंकि वंदे मातरम् और भारत माता की जय कहना तो छोड़ दीजिये कुछ तो ऐसे भी मुसलमान और हिन्दू हैं जो एक दूसरे के हाथों का खाना और पानी तक नहीं पीते।

तो क्या वह सभी के सभी हिन्दू धर्म या मुसलमान धर्म के ब्रांड ऐबेंसडर बन गए ?? अरे ऐसे जाहिलों को दरकिनार ही कर देना उनके लिए बड़ी सज़ा है, फिर चाहे वह हिन्दू हों या मुसलमान या फिर उनका हो कोई भी धर्म। अगर किसी का धर्म देखते हुए ही ब्रांड एंबेसेडर बनाना है तो उसके सकारात्मक और अच्छी चीज़ों को चुनकर बनाना चाहिए न कि नकारात्मक और ग़लत।

उदाहरण के तौर पर क्रिकेट को अगर धर्म मान लिया जाए तो उसके ब्रांड एंबेसडर सचिन तेंदुलकर या राहुल द्रविड़ हैं न कि मैच फ़िक्सर एस श्रीसंथ या मोहम्मद आसिफ़। इसलिए दोस्तों इन बकवास चीज़ों पर अपनी मेहनत ज़ाया न करें।

हाँ आख़िर में मैं ये भी बताता चलूँ कि मैं भारत माता की जय भी कहता हूँ और वंदे मातरम् भी मुझमें जोश भर देता है, और मैं पहले हिन्दुस्तानी हूँ फिर धर्म से मुसलमान।

जय हिन्द… भारत माता की जय… वंदे मातरम्

सियासत का मतलब ही है… स्वार्थ !

अगर किसी भी पार्टी का समर्थन न किया जाए और एक सच्चे क़लम को औज़ार बनाकर लिखा जाए तो स्याही से कुछ ऐसे हुर्फ़ निकलेंगे 👇

सियासत संभावनाओं के साथ साथ स्वार्थों का भी खेल है, इसपर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर मुहर तो लगा दी। लेकिन क्या ये उन्होंने या किसी भी राजनेता ने पहली बार किया है ?? लालू प्रसाद यादव ने 17 साल तक इन्ही सुशासन बाबु को क्या क्या नहीं कहा था कभी लालू को नीतीश के पेट में दांत दिखा था तो कभी आस्तीन का सांप थे नीतीश, लेकिन उसके बाद भी 17 साल की दुश्मनी को दरकिनार करते हुए दोनों एक साथ हो गए।

लालू यादव का वह बयान आज भी याद है जब नीतीश के साथ होने पर उन्होंने मंच से कहा था कि ”सांप्रदायिकता नाम के सांप का फन कुचलने (#BJP) के लिए मैं ज़हर का घोंट (नीतीश के साथ समझौता) पीने को तैयार हूं”। यानी उन्हें पता था कि डूबती हुई सियासत बचानी है तो नीतीश की नौका पर सवार हो जाओ। तो उधर NDA के साथ सालों पुराना रिश्ता ये कहते हुए नीतीश बाबु ने तोड़ डाला था कि ”मिट्टी में मिल जाउंगा लेकिन दोबारा भाजपा से दोस्ती नहीं करूंगा”।

पर देखिए सुशासन बाबु को शासन के लिए कीचड़ में मिलना ही पड़ गया जहां फिर कमल खिला, वाह रे कुर्सी और सियासत तेरे लिए क्या क्या न करना पड़ा। तो लालू जी भी ग़ज़ब कर गए, सियासत बचाने के लिए पूरे बिहार को अपना कहते हुए ज़हर का घोंट तो पी लिया, लेकिन अपने बच्चों की कुर्सी खिसक ना जाए इसकी पीड़ा बर्दाशस्त से बाहर थी लिहाज़ा उन्हें बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा गए। वाह रे लालू चचा… कमाल हैं आप।

अब ज़रा सियासत के तीसरे खंबे को देखिए, जो मौक़े की तलाश में इस क़दर बैठा हुआ था कि वह भूल ही गया कि ये वही नीतीश बाबु हैं जिनके जीतने पर पाकिस्तान में पटाखा छोड़ा गया था, ये वही सुशासन बाबु हैं जिनका DNA तो ख़राब है ही साथ ही साथ इशरत जहाँ के अब्बू भी हैं। लेकिन छोड़िए जनाब, कुर्सी का ख़्याल और कांग्रेस मुक्त राज्य बनाने के लिए इशरत जहां के अब्बू को अपना चचा बना लिया जाए तो क्या जाता है। वैसे भी वह कहावत तो है ही है वक़्त पर ”गधे” को भी बाप बनाना पड़ता है।

लेकिन इन सब के बीच अगर किसी की सबसे ज़्यादा दयनीय स्थिति हो गई है और देखकर तरस आ रहा है तो वह है देश की सबसे पुरानी और विलुप्त होने के कगार पर आ चुकी कांग्रेस की हालत। उसके सामने से तो लग रहा है कि किसी ने शाही पकवान छीन लिया हो, मानो तलाक़ पति और पत्नि के बीच हुआ हो लेकिन विधवा कांग्रेस हो गई।

बहरहाल इन सब चीज़ों को देखने के बाद मैं बेहद ख़ुश हूं क्योंकि मुझे किसी भी सियासी चेहरे और पार्टी को समर्थन न करने के फ़ैसले को सही साबित करने के लिए एक और उदाहरण मिल गया। ये राजनेता और पार्टियां न किसी की हुईं और न होंगी, बस अपने फ़ायदे और नुक़सान के लिए फ़ैसले बदलती और करती रहती हैं।

किसी के पास मौक़ा आए तो कोई आतंकवादियों की बेटी और अब अब्बू के साथ मिलकर सरकार बना ले, तो कोई पेट में दांत और आस्तीन के सांप को भी कुर्सी के लिए गले लगा लेता है। इसलिए कहता हूं भाईयों और बहनों ज़्यादा भक्तगिरी मत दिखाइए, वरना आप तो हरे और भगवा रंग के भक्तों के बीच दीवार बना देंगे और उसी दीवार के सहारे हरे और भगवा रंग का चोला ओढ़े राजनेता एक दूसरे के घर में जाकर ख़ूब अय्याशी करेंगे और बेवक़ूफ़ आप बनेंगे।

अभी भी वक़्त है नींद से जागिए और इनलोगों के चक्कर में अपने आस पास और भाईयों और बहनों के साथ हंसी और ख़ुशी के पल को बरबाद मत करिए। खुशी मनाइए और मिलकर रहिए, क्योंकि हम सभी अलग अलग रंगों में रंगे ज़रूर है लेकिन अंदर एक ही रंग का ख़ून है और वही सांस लेते हैं जो सभी रंग वाले लेते हैं। उसके अंदर भी हिन्दुस्तानी ख़ून है और हमारे अंदर भी भारतीय ख़ून है।

जय हिन्द… जब बिहार… वंदे मातरम्…

41 साल बाद भारतीय महिला क्रिकेट को मिली पहचान और 125 करोड़ देशवासियों के दिल में मुक़ाम

23 जुलाई 2017 का दिन भारतीय महिला क्रिकेट के लिए किसी सपने से कम नहीं था। भले ही वर्ल्डकप के फ़ाइनल में मेज़बान इंग्लैंड के हाथों मिताली राज की कप्तानी वाली भारतीय क्रिकेट टीम वर्ल्डकप की ट्रॉफ़ी उठाने से चूक गई हो, लेकिन उससे बड़ी जीत उन्हें हासिल हो गई।

एक ऐसी जीत जिसके सामने ट्रॉफ़ी और ख़िताब की कोई बिसात नहीं, जी हां जिस देश में क्रिकेट का मतलब कपिल देव, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर से लेकर महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली होता हो उस देश में जब सवा सौ करोड़ लोग अचानक मिताली…मिताली करने लगें जिस देश में हर मन की प्रीत बन जाएं हरमनप्रीत कौर, और जहां दिप्ती के एक एक रन पर सारे हिन्दुस्तानी की धड़कने बढ़ने लगें, उससे बड़ी जीत और क्या हो सकती है ?

वर्ल्डकप इंग्लैंड में खेला जा रहा था, और उसका फ़ाइनल हुआ क्रिकेट के मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स पर जहां खेलना ही किसी सपने से कम नहीं होता। मिताली की इस टीम इंडिया ने न सिर्फ़ उस सपने को सच किया बल्कि ऐसा न धोनी ने किया था न अज़हर ने और न ही दादा या कोहली को ये मौक़ा मिला। कपिल देव की कप्तानी के बाद ये पहली टीम इंडिया थी जो वर्ल्डकप का फ़ाइनल लॉर्ड्स पर खेल रही थी।

फ़ाइनल लॉर्ड्स पर हो रहा था और उम्मीदों भरी नज़रें पूरे हिन्दुस्तान में टीवी और मोबाइल पर लगी हुई थी। जैसे जैसे मैच बढ़ रहा था दुआओं के हाथ आसमान की ओर उठ रहे थे, ऊपर वाले ने भी ये सब देखकर सोचा होगा कि इस ब्लू ब्रिगेड की तो जीत ऐसे ही हो चुकी है तो फिर अंग्रोज़ों को भी ट्रॉफ़ी के साथ ख़ुश कर दिया जाए।

स्कोरकार्ड पर भले ही कुछ और लिखा हो, आंकड़े ज़रूर कुछ और ही गवाही दे रहे हों लेकिन सभी देशवासियों के लिए वर्ल्ड चैंपियन मिताली राज की शेरनियां ही हैं। दूसरों का तो नहीं पता लेकिन मेरे लिए तो वर्ल्ड कप जीत लिया इन भारतीय शेरनियों ने। इनकी बदौलत आज भारतीय महिला क्रिकेट ने भी सभी को दीवाना बना दिया और अपनी अहमियत भी बता दी, वह मुक़ाम जिसके इंतज़ार में ये पिछले 4 दशकों से थीं।

विराट कोहली और बीसीसीआई को भी इन शेरनियों से प्रेरणा लेनी चाहिए, मुझे नाज़ है देश की इन लाडलियों पर, जिन्होंने बेहद कम संसाधन और कम मदद मिलने के बावजूद तिरंगे का मान बढ़ाया। यही वजह है कि इस हार में भी जीत छुपी है और वह भी इतनी बड़ी जिसने पूरे देश को एक नया विकल्प दे दिया है, अब तक जिस देश में क्रिकेट का मतलब लड़कों वाली टीम इंडिया होती थी। आज क्रिकेट फ़ैंस और देशवासियों के दिलों में इन महिलाओं ने भी अपना मुक़ाम बना लिया है। कल तक जो एक महिला खिलाड़ी का नाम नहीं जानते थे, आज वह सभी के नाम भी जानते हैं और उन्हें किसी दूसरे से नहीं बल्कि उन्हें उनके खेल के लिए पहचानने लगे हैं।

लेकिन विडंबना ये भी है कि इतना सब होने और समझने में तथाकथित क्रिकेट फ़ैंस और धर्म की तरह पूजे जाने वाले इस देश के लोगों को 41 साल से भी ज़्यादा लग गए। महिला क्रिकेट का इतिहास भी कम सुनहरा और प्रेरणादायक नहीं है, 1973 में विमेंस क्रिकेट ऑफ़ एसोशिएन की स्थापना हुई थी और 1976 में पहली बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने डायना एडुलजी (मौजूदा CoA सदस्य) की कप्तानी में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में दस्तक दी थी। ये मुक़ाबला बैंगलोर के चिन्नास्वामी स्टेडियम में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ खेला गया था, जहां टीम इंडिया को हार मिली थी।

2 साल बाद महिला क्रिकेट टीम ने शांता रंगास्वामी की कप्तानी में वेस्टइंडीज़ से बदला लिया और भारतीय महिला क्रिकेट टीम को पहली अंतर्राष्ट्रीय जीत दिलाई। ये जीत टेस्ट मैचों में आई थी और इस ऐतिहासिक जीत का गवाह बना था पटना का मोइन-उल-हक़ स्टेडियम, जो फ़िलहाल अपनी पहचान खो रहा है।

वनडे में टीम इंडिया पहली बार 1978 में मैदान में उतरी थी, जो विश्वकप का मुक़ाबला था और खेला गया था ऐतिहासिक इडेन गार्डेन्स पर। इंग्लैंड के ख़िलाफ़ इस मुक़ाबले में भी भारतीय महिला क्रिकेट टीम को हार मिली और फिर पटना में ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड ने भी भारत को शिकस्त दी थी।

वनडे की पहली जीत महिला टीम इंडिया को न्यूज़ीलैंड के नेपियर में 4 साल बाद यानी 1982 में हासिल हुई थी। हालांकि इसके बाद से महिला क्रिकेट टीम लगातार खेलती रही जहां अब 13 कप्तानों ने इस टीम को कई सुनहरी जीत और यादगार पल दिए हैं। मिताली राज की कप्तानी में ही इस टीम ने 2005 में भी विश्वकप के फ़ाइनल में जगह बनाई थी, तब कंगारुओं के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी।

12 साल बाद एक बार फिर मिताली चैंपियन बनने की दहलीज़ तक ले पहुंची थी लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। हालांकि, इस हार में भी जीत है और वह भी ऐसी जो शायद जीत से भी बड़ी है। भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए रविवार की रात एक ऐसा ट्रेलर लेकर आई है जिसके भविष्य में कई ऐसी तस्वीरें छुपी हैं जिसे आने वाले वक़्त में मिताली की ये शेरनियां अपने बच्चों को दिखाती हुई कहेंगी कि वे हम ही थे जिन्होंने काली सुरंग में से निकलते हुए सुनहरी धूप दिखाई।

मिताली एंड कंपनी के मैजिक से आज महक उठेगा हिन्दुस्तान…

महिला क्रिकेट को आज तक भारतीय मीडिया ने भले ही वह तवज्जो न दिया हो, जिसकी वह हक़दार हैं। लेकिन आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि महिला क्रिकेट वर्ल्डकप की शुरुआत पुरुष क्रिकेट वर्ल्डकप के 2 साल पहले ही हो गई थी।

जी हां, 1975 में पहली बार पुरुष क्रिकेट वर्ल्डकप खेला गया था जिसे वेस्टइंडीज़ ने अपने नाम किया था, ये तो सभी को याद होगा लेकिन शायह ही किसी क्रिकेट फ़ैन को ये पता होगा कि पहला महिला क्रिकेट वर्ल्डकप 1973 में खेला गया था और उसे इंग्लैंड ने प्वाइंट्स के आधार पर अपने नाम किया था।
हालांकि पहले विश्वकप में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने शिरकत नहीं की थी, लेकिन दूसरे यानी 1978 वर्ल्डकप में टीम इंडिया ने पहली बार हिस्सा लिया और चौथे स्थान पर रही थी। तब और अब में काफ़ी फ़र्क आ चुका है, पहले जहां दबदबा इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया का रहता था तो अब भारतीय महिला क्रिकेट टीम की तूती बोलने लगी है।

टीम इंडिया की कप्तान मिताली राज तो वनडे क्रिकेट इतिहास की सबसे ज़्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बन गईं हैं, वनडे में उन्होंने इसी विश्वकप के दौरान 6000 रन पूरे करने वाली पहली महिला क्रिकेटर भी बन गईं। टीम इंडिया ने इस टूर्नामेंट में कमाल का प्रदर्शन करते हुए फ़ाइनल तक का सफ़र तय किया है।

सेमीफ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया और उससे पहले वर्चुअल क्वार्टरफ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड को जिस अंदाज में मिताली एंड कंपनी ने हर विभाग में चारो ख़ाने चित किया है वह ये दर्शाता है कि इस टीम की नज़र सिर्फ़ और सिर्फ़ कप पर है। क्रिकेट के मक्का पर होने वाला आज का ख़िताबी मुक़ाबला भारतीय महिलाओं के लिए और पूरे देश के लिए किसी सपने से कम नहीं है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ये लड़ाई न सिर्फ़ लॉर्ड्स में वर्ल्डकप के जीतकर दुनिया पर राज करने के लिए है। बल्कि मिताली की कप्तानी वाली इस टीम को अपने उन आलोचकों के साथ साथ क्रिकेट बोर्ड को भी जवाब देना है जो उनमें और पुरुष टीम में फ़र्क समझता है। आज भी विराट कोहली की टीम इंडिया और उनके खिलाड़ियों को मिलने वाला मेहनताना मिताली की महिला टीम और उनकी साथी खिलाड़ियों से कहीं ज़्यादा है।

क्रिकेट को धर्म की तरह पूजे जाने वाले इस देश में पुरुष क्रिकेटरों को तो भगवान का दर्जा हासिल है लेकिन इसी खेल में देश का नाम रोशन करने वाली महिला खिलाड़ियों के तो नाम भी शायद ही किसी को पता हों। तो क्या क्रिकेट के तथाकथित दीवानों को सिर्फ़ पुरुष क्रिकेट से प्यार है ? भारतीय मीडिया और स्पोन्सर भी इसके लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितना कि क्रिकेट बोर्ड।

फ़र्ज़ कीजिए अगर विराट कोहली वाली टीम इंडिया वर्ल्डकप का फ़ाइनल तो छोड़ ही दीजिए किसी तीन या चार देशों वाले टूर्नामेंट के फ़ाइनल में भी पहुंची होती तो हर अख़बार और टीवी चैनलों में उनके जयकारे लग रहे होते, कहीं यज्ञ हो रहा होता तो कोई हवन कर रहा होता। लेकिन मिताली की कप्तानी वाली ये टीम जब इतिहास रचने और विश्व चैंपियन बनने के इतने क़रीब खड़ी है तब भी न वह हल्ला है न ही वह पागलपन और जुनून।

मिताली एंड कंपनी भी इस बात को जानती है और उन्होंने भी ये संकल्प कर रखा है कि इस बार कुछ ऐसा कर दिखाना है कि लोग उन्हें विराट कोहली या कपिल देव या महेंद्र सिंह धोनी जैसा न कहें, बल्कि कोहली और धोनी को मिताली और हरमनप्रीत जैसा कहने पर मजबूर हो जाएं।

भारतीय क्रिकेट इतिहास के लिए 23 जुलाई 2018 का दिन कितना सुनहरा और बड़ा है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये सिर्फ़ दूसरा मौक़ा है जब कोई भारतीय क्रिकेट टीम क्रिकेट के मक्का यानी लॉर्ड्स पर वर्ल्डकप का फ़ाइनल खेल रही है। इससे पहले 1983 में कपिल देव की कप्तानी में टीम इंडिया ने इसी मैदान पर वेस्टइंडीज़ को हराकर ख़िताब अपने नाम किया था और अब 34 साल बाद मिताली राज लॉर्ड्स पर टीम इंडिया की वर्ल्डकप के फ़ाइनल में अगुवाई कर रही हैं।

मिताली के साथ साथ पूरा हिन्दुस्तान भी दुआ कर रहा है कि कपिल की ही तरह मिताली भी इस टीम को जीत दिलाते हुए न सिर्फ़ पहली बार विश्व चैंपियन बनाएं, बल्कि भारतीय महिला क्रिकेट की पूरी तस्वीर बदल डालें। मिताली जानती हैं कि ये तभी मुमकिन है जब ट्रॉफ़ी पर कब्ज़ा किया जाए, क्योंकि रनर अप तो टीम इंडिया 2005 में भी रही थी।

रविवार की रात सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानी के लिए सात समंदर पार से ख़ुशी की ऐसी महक ला सकती है जिसका असर सालों तक नहीं बल्कि दशकों तक रहेगा। मिताली को भी इस जीत के मायने और हार के टीस के बीच का फ़र्क अच्छे से मालूम है। क्योंकि लोगों की फ़ितरत और दुनिया का दस्तूर भी यही है कि पहली बार की जीत तक़यामत सभी को याद रह जाती है, लेकिन दूसरी बार कौन जीता था इसे ज़माना भूल जाता है।

ज़हीर ख़ान-राहुल द्रविड़ के टीम इंडिया के साथ जुड़ने पर विराम लगाना रवि शास्त्री की जीत नहीं भारतीय क्रिकेट की हार है !

आख़िरकार वही हुआ जिसका अंदाज़ा हम सभी को था, रवि शास्त्री की मांगों के सामने बीसीसीआई को झुकना पड़ा और भरत अरुण के गेंदबाज़ी कोच पर मुहर लग ही गई। जिसकी औपचारिक घोषणा भी बस होने ही वाली है, श्रीलंका दौरे के साथ ही 54 वर्षीय भरत अरुण गेंदबाज़ी कोच के तौर पर अपनी दूसरी पारी शूरू करने जा रहे हैं।

रवि शास्त्री का समय और उनका भविष्य सुनहरे दौर में है, आप ही सोचिए जिसके लिए वक़्त की सुई और कैलेंडर की तारीख़ों को रोक और बढ़ा दिया जाता है वह कितना ख़ुशक़िस्मत होगा। रवि शास्त्री के लिए सब कुछ मानो उनके मुताबिक़ चल रहा है, पॉवर का एक छोटा सा नमूना तो उन्होंने दे ही दिया। ख़बरें ये भी हैं कि उन्हें एक मोटी रक़म भी मिलने वाली है, कोच के तौर पर टीम इंडिया की सेवा करने के लिए शास्त्री के साथ बीसीसीआई ने सालाना 7 से 7.5 करोड़ रुपये का क़रार किया है।

ख़ैर पॉवर और पैसों का खेल तो बीसीसीआई में कैसे चलता है ये हम सभी जानते हैं, लेकिन जिन्हें ये लग रहा है कि सौरव गांगुली के ख़िलाफ़ शास्त्री की ये पहली जीत है। उन्हें इसके लिए अभी थोड़ा इंतज़ार करना होगा, क्योंकि ये भले ही रवि शास्त्री की जीत या दबदबदा हो सकता है पर भारतीय क्रिकेट के लिए ये एक बड़ी हार है।
बीसीसीआई ने रवि शास्त्री के लिए जो फ़ैसला किया है, उसके बाद तो ऐसा लगता है कि उन्हें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट ‘कंन्फ़ूज़न’ बोर्ड कहा जाए तो शायद ग़लत नहीं होगा। ऐसा इसलिए कि पहले वह एक समिति बनाते हैं जिसमें भारतीय क्रिकेट के तीन बड़े दिग्ग्जों को शामिल किया जाता है। क्रिकेट एडवाइज़री कमिटी (CAC) यानी क्रिकेट सलाहकार समिति में सचिन रमेश तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीवएस लक्ष्मण शामिल हैं।

इन तीनों को इस मक़सद के साथ रखा गया है कि भारतीय क्रिकेट और उसके भविष्य के लिए ये शानदार सलाह दे सकें और फिर उसपर अमल करते हुए बीसीसीआई बेहतर फ़ैसले लेगी। इस समिति ने अपने पहले चरण में तो अनिल कुंबले को बतौर कोच रखने की सलाह दी जिसे बीसीसीआई ने स्वीकार किया। और फिर तमाम क्रिकेट जगत ने इसका स्वागत किया। एक बार लगा कि सचिन, सौरव और लक्ष्मण जैसे महान खिलाड़ियों की ये समिति भारतीय क्रिकेट की दिशा और दशा बदल देगी।

हालांकि कुंबले और कोहली के बीच में तालमेल न बैठ पाया और फिर एक साल के बाद ही नए कोच के लिए इस समिति ने रवि शास्त्री के नाम को आगे किया। कुंबले प्रकरण देखने के बाद दादा ने इस बार रवि शास्त्री की मदद के लिए रहुल द्रविड़ और ज़हीर ख़ान जैसे दिग्गजों को भी सलाहकार के तौर पर टीम इंडिया के साथ जोड़ा।

लेकिन शास्त्री को ये बात पसंद नहीं आई और उन्होंने ये कह कर ज़हीर और द्रविड़ के शामिल होने को चुनौती दे दी कि ये काम सलाहकार समिति का नहीं बल्कि एक कोच का है कि वह किसको सपोर्ट स्टाफ़ रखें और किसको नहीं। यानी दूसरे अल्फ़ाज़ों में कहें तो सलाहकार समिति के इस फ़ैसले को शास्त्री ने ख़ारिज कर दिया। इसकी वजह है उनके अंडर-19 के साथी भरत अरुण जिन्हें वे गेंदबाज़ी कोच के तौर पर जोड़ना चाह रहे थे और बीसीसीआई ने उनकी बात को मान भी लिया।

इतना ही नहीं बीसीसआई ने ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ के सलाहकार के तौर पर टीम इंडिया से जुड़ने के CAC के फ़ैसले पर फ़िलहाल रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के द्वारा गठित CoA ने ये कहा है कि 22 जुलाई को रवि शास्त्री से मिलने के बाद वह इसका फ़ैसला करेंगे कि ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ का रोल क्या होगा। ख़बरें ये भी हैं कि अगर वे (ज़हीर और द्रविड़) टीम के साथ जुड़े तब भी उनका इस्तेमाल कैसे और कब करना है इसका फ़ैसला भी शास्त्री करेंगे।

ऐसे में सवाल ये उठता है:
• इस सलाहकार समिति को बनाने का मक़सद क्या था ? जब उनके फ़ैसले और उनकी सलाह का कोई महत्व ही नहीं है तो फिर इस समिति को बनाया ही क्यों गया ?

• गेंदबाज़ी कोच की भूमिका अगर भरत अरुण निभाएंगे तो ज़हीर का क्या काम रह जाएगा ?

• बल्लेबाज़ी कोच के तौर पर अगर संजय बांगर ही फ़िट हैं तो फिर राहुल द्रविड़ का क्या रोल होगा ?

इन सवालों का जवाब न बीसीसीआई के पास है और न ही सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण समझ पा रहे हैं कि ये हो क्या रहा है। रवि शास्त्री को ज़रूरत से ज़्यादा समर्थन करना और उन्हें अधिकार देना न सिर्फ़ सौरव गांगुली या सचिन तेंदुलकर या लक्ष्मण के क़द का अपमान है बल्कि इतनी छूट टीम इंडिया के भविष्य के लिए ख़तरनाक है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए ग्रेग चैपल को भी कोच के तौर पर बीसीसीआई ने ज़रूरत से ज़्यादा आज़ादी और पॉवर दिए थे, जिसका इस्तेमाल उन्होंने उस समय पूर्व कप्तान सौरव गांगुली के ख़िलाफ़ ही किया था और ख़ामियाज़ा पूरी टीम को भुगतना पड़ा था।

एक बार फिर वक़्त ने करवट ली है और हम उसी दिशा में जा रहे हैं इत्तेफ़ाक देखिए इस बार भी विवाद कोच और सौरव गांगुली के बीच ही है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है तब दादा एक खिलाड़ी और कप्तान के तौर पर मैदान के अंदर थे और अब वह एक अधिकारी और पूर्व खिलाड़ी के तौर पर मैदान से बाहर हैं। लेकिन दादा और कोच की लड़ाई में जीत कोच की हो या दादा की, पर हार भारतीय क्रिकेट की ही हो रही है।

मिताली की कप्तानी वाली ये टीम इंडिया इतिहास दोहराने नहीं रचने गई है !

भारतीय महिला टीम ने करो या मरो के मुक़ाबले में अपने से कहीं मज़बूत न्यूज़ीलैंड को 186 रनों से शिकस्त देकर साबित कर दिया है कि इस बार वह इतिहास बनाने से चूकने नहीं बल्कि रचने गईं हैं। मिताली राज की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट टीम ने इस जीत के साथ ही सेमीफ़ाइनल में जगह बना लही है, जहां उनका सामना दुनिया की नंबर-1 टीम ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ होगा।

ये पहला मौक़ा नहीं है जब टीम इंडिया ने सेमीफ़ाइनल में जगह बनाई हो, इससे पहले 1997, 2000 और 2005 में भारतीय टीम अंतिम-4 में पहुंची थी जिसमें 2005 में तो फ़ाइनल तक का सफ़र विमेंस इन ब्लू ने तय कर लिया था। जहां ऑस्ट्रेलिया के हाथों शिकस्त झेलने के बाद उन्हें रनर अप से संतोष करन पड़ा था। 2009 में सेमीफ़ाइनल की जगह प्ले-ऑफ़ ने ली थी और तब भारत का सफ़र नंबर-3 पर रहते हुए ख़त्म हुआ था।
लेकिन इस बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम के इरादे अलग और लक्ष्य साफ़ है, पहले 4 मैचों में इंग्लैंड, पाकिस्तान, श्रीलंका और वेस्टइंडीज़ को हराकर शानदार शुरुआत करने वाली टीम की लय दक्षिण अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ भटक गई थी। लिहाज़ा न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ करो या मरो की स्थिति पैदा हो गई थी, जहां टॉस हारने के बाद बादल से घिरे आसमान और पिच पर मौजूद नमी पर बल्लेबाज़ी करते हुए 21 रनों पर भारत के 2 विकेट गिर गए थे।

यहां से विश्व क्रिकेट में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाली बल्लेबाज़ और भारतीय महिला टीम की कप्तान मिताली राज ने मोर्चा संभाला और उनका शानदार साथ निभाया अनुभवी हरमनप्रीत कौर ने, दोनों के बीच हुई शतकीय साझेदारी ने भारत को मैच में वापस लाया। मिताली का मैजिक यहीं ख़त्म नहीं हुआ बल्कि उन्होंने वनडे करियर का 6ठा शतक लगाते हुए भारत को एक चुनौतीपूर्ण स्कोर तक पहुंचा दिया।

मिताली की मेहनत और उनके लक्ष्य को साकार किया विश्वकप में अपना पहला मैच खेल रही राजेश्वरी गायकवाड़ ने जिन्होंने 5 विकेट लेते हुए कीवियो की पूरी टीम को 79 रनों पर ढेर कर दिया और भारत को 186 रनों से विशाल जीत दिला दी।

विमेंस इन ब्लू की ख़ासियत है एक या दो नहीं बल्कि कई मैच विनर, और यही वजह है कि टूर्नामेंट में अंडरडॉग्स के तौर पर शुरुआत करने वाली मिताली एंड कंपनी अब ख़िताब के प्रबल दावेदारों में से एक हो गई है। भारतीय महिलाओं के सामने अब बस दो जीत का लक्ष्य है, पहले सेमीफ़ाइनल और फिर फ़ाइनल। हालांकि ये इतना आसान नहीं होने वाला क्योंकि ऑस्ट्रेलिया का फ़ॉर्म शानदार चल रहा है और बड़े मैचों में कंगारू टीम और भी ख़ूंख़ार हो जाती है।

मिताली के लिए अब बात अपने मक़सद को पूरा करना है, विश्व क्रिकेट में अपनी बल्लेबाज़ी का लोहा मनवाने वाली मिताली राज एक बेहतरीन कप्तान भी हैं। और जब भी ज़रूरत पड़ती है वह टीम को सामने से लीड करती हैं, उनकी आंखों में भी वह चमक दिखाई दे रही है जिस मक़सद के साथ वह इंग्लैंड आईं हैं। 1978 वर्ल्डकप से शिरकत कर रही भारतीय महिला क्रिकेट टीम अब एक ऐसे मुक़ाम के नज़दीक पहुंची हुई है जहां से वह पीछे नहीं मुड़ना चाहेंगी।

मिताली के साथ साथ पूरी टीम की आंखों में इन दो मैचों की अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, उन्हें पता है कि यहां से अगर दोनों मैचों में जीत मिल गई और हाथ में कप और वर्ल्ड चैंपियन के साथ वह वतन वापस लौटीं तो फिर क्रिकेट को धर्म की तरह पूजने वाला ये देश कैसे उन्हें सिर आंखों पर बैठाएगा और इतिहास के पन्नों में हमेशा हमेशा के लिए सभी के सभी अमर हो जाएंगी। लेकिन अगले दोनों में से एक मुक़ाबले में भी उन्हें हार मिली तो फिर इसके लिए अगले 4 साल का इंतज़ार करना होगा और तब शायद तस्वीर और इरादे बदल भी सकते हैं।

बीसीसीआई से लेकर भारतीय सरकार, मीडिया और क्रिकेट फ़ैन्स की नज़र अगले कुछ दिन भारतीय महिला क्रिकेट टीम पर होंगी। अगर उन्हें अपने मक़सद में क़ामयाब होना है और सवा सौ करोड़ देशवासियों के साथ साथ भारतीय महिलाओं की प्रेरणा बनते हुए उनके सपनों को सच करना है तो बस मिताली एंड कंपनी को अगले दो मैचों में भी इस मैजिक को बरक़रार रखना है। इसमें अगर वे क़ामयाब हो गईं तो भारतीय महिला क्रिकेट का इतिहास तो बदलेगा ही साथ ही साथ वर्तमान ही नहीं भविष्य भी सुनहरा हो जाएगा।

रवि शास्त्री का कोच बनना ‘विराट’ जीत और धोनी युग का अंत है !

इमोशन, ड्रामा और सस्पेंस… अगर ये सब एक साथ एक ही फ़िल्म में हो तो समझो पिक्चर सुपर डूपर हिट है। सिर्फ़ फ़िल्म तक ही ये सीमित नहीं है क्रिकेट के मैदान में भी ये तीनों चीजों का मिश्रण रोमांच को चरम पर पहुंचा देता है। लेकिन फ़िलहाल तो मैदान से बाहर टीम इंडिया के कोच के चयन में ये सब हावी रहा और नतीजा रवि शास्त्री के तौर पर भारतीय क्रिकेट टीम को मिल गया नया कोच।

थोड़ा फ़्लैशबैक में चलते हैं फिर शास्त्री के कोच बनने के शस्त्र और बीसीसीआई के बॉस का ड्रामा भी जानेंगे। आज से क़रीब 13 महीने पहले टीम इंडिया के कोच के लिए एक हाईटेक कमिटी जिसे सलाहकार समिति भी कहते हैं, उसमें मौजूद तीन सदस्यों (सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण) ने कई आवेदनों को देखने के बाद और इंटरव्यू लेते हुए अनिल कुंबले को कोच पद पर नियुक्त कर दिया।

भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सफल गेंदबाज़ और एक बेहतरीन क्रिकेटिंग ब्रेन रखने वाले अनिल कुंबले के कोच बनने को कप्तान विराट कोहली से लेकर हरेक क्रिकेट फ़ैन्स तक ने सराहा। लेकिन तब एक और आवेदक रवि शास्त्री को इसमें पक्षपात की बू नज़र आई और उन्होंने आरोप सलाहकार समिती पर ख़ास तौर से उनमें मौजूद सौरव गांगुली पर मढ़ दिया। दादा और शास्त्री में कुछ दिनों तक वाद-विवाद का सिलसिला चलता रहा और आख़िरकार टीम इंडिया के मैदान में शानदार खेल ने उनपर विराम लगाते हुए फ़ोकस क्रिकेट पर कर दिया था।

लेकिन भावनाएं कोहली की भी आहत हुईं थी क्योंकि उनकी भी पहली पसंद रवि शास्त्री ही थे पर तब सलाहकार समिति के सामने कोहली की पूरी तरह से नहीं चली थी। कोहली के ख़राब फ़ॉर्म को टीम इंडिया के डायरेक्टर रहते हुए रवि शास्त्री ने अपनी टिप्स और सलाह से इंग्लैंड दौरे पर बेहतर कर दिया था, यही वजह थी कि कोहली के दिल में शास्त्री के लिए एक सॉफ़्ट कॉर्नर तो था ही।

यही सॉफ़्ट कॉर्नर धीरे धीरे अनिल कुंबले के लिए सख़्त होता जा रहा था, ऊपर से सीनियर खिलाड़ियों को कुंबले का इज़्ज़त देना कोहली को नागवार गुज़र रहा था। कोहली जहां युवा खिलाड़ियों की पौध बढ़ाना चाहते थे तो कुंबले ने गौतम गंभीर और पार्थिव पटेल से लेकर दिनेश कार्तिक जैसे पुराने और अनुभवी खिलाड़ियों की वापसी टीम इंडिया में कराई।

कौन सा खिलाड़ी टीम में रहेगा ? कौन खिलाड़ी कब क्या करेगा ? कौन कब सोएगा और कौन कितनी देर प्रैक्टिस करेगा ? अनुशासन पसंद कुंबले की ये चीज़ें अब आज़ाद ख़्याल और बिंदास रहने वाले कोहली को खटकने लगी थी। चिंगारी शोले में तब भड़क गई जब बीसीसीआई के सालाना कॉन्ट्रैक्ट में भी उन्होंने कोहली के न चाहते हुए पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को ग्रेड ए में रखा।

एक दूसरे के लिए नाराज़गी और दूरी बढ़ती जा रही थी, कहा जाता है कि कई महीनों तक दोनों आपस में बात नहीं करते थे और इसका असर ज़ाहिर तौर पर टीम के प्रदर्शन पर भी पड़ता था। आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी से पहले जब ये बात मीडिया के सामने लीक हुई थी, तब पहले तो इसको खंडन किया गया, लेकिन पाकिस्तान के ख़िलाफ़ फ़ाइनल में मिली हार ने भावनाएं बाहर ला दीं। कोच और कप्तान के बीच महीनों की शांति तू तू मैं मैं और गाली गलौज तक जा पहुंची। जिसके बाद कुंबले ने कोच पद से इस्तीफ़ा दे दिया और वेस्टइंडीज़ दौरे पर भी जाने से मना कर दिया।

कुंबले ने एक चिट्ठी भी लिखी जिसमें कप्तान कोहली पर सीधे तौर पर आरोप लगाया और उनके साथ काम करना बेहद मुश्किल बताया। सचिन, दादा और लक्ष्मण वाली सलाहकार समिति ने सुलह कराने की कोशिश तो पूरी की लेकिन आग की लपटें इतनी तेज़ थी की उसकी चपेट में कोई भी आ सकता था लिहाज़ा नए सिरे से आवेदन और इंटरव्यू का दौर शुरु हुआ।

कोच पद के लिए टॉम मूडी, वीरेंद्र सहवाग (सौरव गांगुली की गुज़ारिश पर), रिचर्ड पायबस और लालचंद राजपूत जैसे दिग्गजों ने आवेदन दिया और आख़िरी तारीख़ ख़त्म हो गई थी। यहां से आता है कहानी में ट्विस्ट जब कोच पद के लिए आवेदन न करने पर एक नीजि चैनल के सवालों का जवाब देते हुए शास्त्री ने कहा कि, ‘’इस बार मैं लाइन में लग कर इंटरव्यू देने तो नहीं जाउंगा, उन्हें लगता है कि मुझे कोच बनना चाहिए तो वह ख़ुद बुलाएंगे।‘’

रवि शास्त्री की नाराज़गी को देखते हुए सचिन तेंदुलकर ने उन्हें मनाया और फिर बीसीसीआई की तरफ़ से तारीख़ में फेरबदल किया गया जिसके बाद शास्त्री ने आवेदन दाख़िल किया। 10 जुलाई को सभी का इंटरव्यू हुआ और फिर ये कहा गया कि विराट कोहली की राय के बाद आख़िरी फ़ैसला सुनाया जाएगा। शायद दादा की ये प्रतिक्रिया सहवाग भांप गए और इंटरव्यू के ठीक बाद छुट्टियां मनाने के लिए कनाडा रवाना हो गए और तभी ये क़यास लग चुका था कि कप्तान की राय का मतलब है रवि शास्त्री का नया कोच बनना तय है।

मंगलवार को दिन में ये ख़बर भी आ गई कि रवि शास्त्री कोच बनाए गए, और एक बार फिर जीत विराट कोहली की हुई। लेकिन बीसीसीआई ने इस पर सस्पेंस बनाए रखा और कहा कि अभी कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है पर कुछ घंटो बाद टीम इंडिया के बॉस विराट कोहली के चहेते रवि शास्त्री के नाम पर बीसीसीआई का आधिकारिक ऐलान भी हो गया।

रवि शास्त्री को 2019 वर्ल्डकप तक के लिए टीम का हेड कोच नियुक्त कर दिया गया, जबकि ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ को भी बड़ी भूमिका मिल गई। ज़हीर टीम इंडिया के नए गेंदबाज़ी कोच होंगे और द्रविड़ भारतीय क्रिकेट टीम के विदेशी दौर पर बल्लेबाज़ी सलाहकार।

शास्त्री का कोच बनना जहां विराट कोहली की जीत के तौर पर देखा जा रहा है तो इसे धोनी के युग का अंत भी माना जा रहा है। क्योंकि जब शास्त्री टीम इंडिया के डायरेक्टर थे तब ये ख़बरें अक्सर आती रहती थी कि शास्त्री कप्तान के तौर पर धोनी की जगह कोहली को पसंद करते हैं। कहा तो ये भी जाता है कि धोनी ने टेस्ट से संन्यास भी शास्त्री के दबाव और उनके कोहली प्रेम की वजह से ही लिया था। हालांकि ये बातें आजतक पर्दे के पीछे ही रही हैं और धोनी के स्वभाव और आदत को देखते हुए लगता है कि कभी बाहर आएंगी भी नहीं। बहरहाल, यही वजह है कि जानकारों को लग रहा है कि धोनी के लिए 2019 वर्ल्डकप तक टीम में रहना अब मुश्किल से भी ज़्यादा मुश्किल है।

रवि शास्त्री को कोच बनाने के लिए बीसीसीआई और सलाहकार समिति ने कुछ ऐसे काम किए हैं जिसपर सवाल खड़ा होना लाज़िमी है:

रवि शास्त्री कोच पद के लिए आवेदन दे सकें, इसके लिए आख़िरी तारीख़ को बढ़ाना कहां तक जायज़ था ?
सलाहकार समिति में होते हुए सचिन तेंदुलकर ने रवि शास्त्री को आवेदन देने के लिए मनाने की कोशिश क्यों की ?
कुंबले ने जब इस्तीफ़ा देने के बाद लिखी चिट्ठी में साफ़ लिखा था कि कोहली के साथ काम करना मुश्किल, तो फिर उन्हीं (कोहली) से राय लेना कहां तक जायज़ ?
क्या कोहली को बिग बॉस जैसा अधिकार देना और उनकी हर बात मानना भारतीय क्रिकेट टीम पर असर नहीं डालेगा ?
जब कुंबले के साथ तालमेल बैठा पाने में कोहली नाकाम रहे तो कैसे मान लिया जाए कि ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ के साथ उनका रवैया अच्छा रहेगा ?

रवि शास्त्री का कोच बनना धोनी युग के अंत के साथ साथ कोहली की विराट छवि की ओर भी इशारा कर रहा है। जिस तरह कोहली की ख़्वाहिशों के लिए बीसीसीआई और सलाहकार समिति ने मापदंडो और नियमों को ताक पर रखा है वह दर्शाता है कि इस समय कोहली कप्तान नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के बिग बॉस हो गए हैं।

हिन्दी हैं हम वतन है… हिन्दुस्तां… हमारा… हमारा !!

गुस्ताख़ी माफ़, जो मैं लिखने जा रहा हूं उससे हो सकता है तथाकथित मुसलमानों को बुरा लग जाए, और उनमें से कुछ मेरे ख़िलाफ़ भी फ़तवा जारी कर दें और मुझे इनब़क्स कर गाली भी दें, जैसा मेरी कुछ सच्ची और कड़ी बातों पर तथाकथित ”देशभक्तों और अंधभक्तों” को भी लग जाता है कि मैं पड़ोसी मुल्क का समर्थक हूं। लेकिन उनके कहने सा न मैं रुक जाता हूं और न ही लिखना छोड़ देता हूं।

हिन्दुस्तान की भाषा और हिन्दी को लेकर मैं हमेशा लिखता रहता हूं, फिर चाहे #SanjayManjrekar उसकी तौहीन करे या #ShoibAkhtar उसका मज़ाक उड़ाए, क्योंकि मुझे जितना हिन्दुस्तान से प्यार है उतना ही हिन्दी से भी। पर इसी हिन्दुस्तान में कुछ धर्म के ठेकेदार ऐसे हैं भी जिन्हें हिन्दुस्तान में रहते हुए हिन्दी से बैर है, इन ठेकेदारों का बस चले तो कुछ दिनों में कौन सी भाषा बोलें और कौन सी न बोलें इस पर भी फ़तवा जारी कर दें। जैसे कि सीधे मुहम्मद साहब ने ही उन्हें इसका अधिकार दिया है, उदाहरण के तौर पर वे चाहते हैं कि मुसलमान को ऊर्दू ही लिखना और बोलना चाहिए। वह क़ुरान-ए-पाक भी पढ़ें तो ऊर्दू या अरबी में ही हिन्दी में तर्जुमा (ट्रांसलेट) की हुई न पढ़ें।

अगर किसी का बच्चा या भाई या बेटी या बहन नौहा या मजलिस (इमाम हुसैन अ.स के साथ साथ इस्लाम को बचाने के लिए करबला में हुए 72 शहीद की याद में पढ़ी जाने वाली तक़रीर और शोकगीत) बेहतरीन लिखता और पढ़ता हो, लेकिन वह हिन्दी में इसे लिखता हो तो इस पर भी मौलाना को ऐतराज़ हो जाता है। इतना ही नहीं अगर कोई मुहम्मद साहब के उपदेशों को भी हिन्दी में पढ़े या सामने वाले को हिन्दी में लिख कर बताए और फैलाए तो भी उन्हें इस बात की ख़ुशी नहीं बल्कि इस बात का दुख होता है कि वह ऊर्दू में क्यों नहीं बोलता या लिखता।

भले ही वह बेहद धार्मिक हो और इस्लाम को फैलाने के लिए हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा में उसका प्रचार या प्रसार करे तो भी इन मुल्लाओं और मौलवी को ये गंवारा नहीं, उन्हें लगता है कि मुसलमानों की भाषा ऊर्दू है, और उसी भाषा से अल्लाह ख़ुश होगा और उसी भाषा को वह समझ सकता है। ये लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दबाव डालने की कोशिश करते हैं कि हिन्दी की जगह उन्हें ऊर्दू सिखाओ। मैं कहीं से भी ऊर्दू के ख़िलाफ़ नहीं हूं, बल्कि मुहम्मद साहब के उपदेश का पालन करते हुए मैं भी चाहता हूं ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान हासिल करूं और हर भाषा को जानूं और समझूं।

मुझे भी हिन्दी और इंग्लिश के अलावा ऊर्दू लिखना और पढ़ना आता है लेकिन प्यार मुझे हिन्दी से है, इसका ये मतलब नहीं कि अल्लाह पाक तक मेरी दुआएं हिन्दी में नहीं पहुंचेगी। इन मुल्ललाओं से मैं बोलना चाहता हूं कि जाकर बांग्लादेश में देखो कि कैसे वहां एक ही ज़ुबान है जिन्हें उनसे प्यार है और वह है ‘बांग्ला’। तो क्या उनके ख़ुदा को ऊर्दू नहीं आती ?? इसी तरह ईरान और इराक़ में फ़ारसी, अरब में अरबी। जब बात हो रही है तो इन मुल्लाओं की जानकारी के लिए ये भी बता दूं कि दुनिया में सबसे ज़्यादा मुसलमान इंडोनेशिया में हैं जहां क़रीब 25 करोड़ आबादी में 23 करोड़ मुसलमान हैं। लेकिन उनकी भाषा भी ऊर्दू नहीं है बल्कि ‘’इंडोनेशियन और बाली’’ है।

भारत में तो फिर भी आबादी के मामले में मुसलमान दूसरे नंबर पर आते हैं (क़रीब 20 करोड़। लिखते लिखते अल्लामा इक़्बाल साहब (मुल्ला जी, आप से पूछ रहा हूं वह शायद मुसलमान ही थे न ??) के लिखे हुए सारे जहां से अच्छा की वह लाइन याद आ गई, ‘’हिन्दी हैं हम… वतन है हिन्दुस्तां हमारा… हमारा…” उनके इस गीत की तो इज़्ज्त रखो और अपनी इस भाषा से प्यार करो।

इसमें कुछ क़सूर हमारे संविधान का भी है जिसने हमें मातृभाषा तो दी लेकिन राष्ट्रभाषा की जगह ख़ाली छोड़ दी है। इसी का फ़ायदा दक्षिण भारत में रहने वाले “अंग्रेज़ भारतीय” उठाते हैं और हिन्दी और हिन्दीभाषी से नफ़रत करते हैं, और अब इतनी प्यारी भाषा को भी कुछ मुल्ला पराई बनाने पर अमादा हैं, जबकि सच पूछो तो पराई तो ऊर्दू है जो तुर्की से दक्षिण एशियाई क्षेत्रों से होते हुए भारत में आई।

मुल्लाओं को बस मुहम्मद साहब के उस उपदेश को याद दिलाते हुए अपनी बात ख़त्म करना चाहूंगा जिसमें उन्होंने कहा था कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इस्लाम को पहुंचाना उनका मक़सद है। मुल्लाओं और मौलवी की उतपत्ति भी इसलिए ही हुई कि वह लोगों को मुहम्मद साहब और इस्लाम के बारे में बता पाएं। लेकिन यहां तो उन्होंने राजनीति के लिए मुहम्मद साहब के उपदेशों को ही नज़रअंदाज़ कर दिया, उन्होंने कहा था ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इस्लाम की अच्छाई और उसके बारे में बताओ।

तो दुनिया में तो सब से ज़्यादा बोलने वाली भाषा चाइनीज़ के बाद हिन्दी ही है तो फिर हिन्दी से क्यों तौबा मौलाना साहब ??? मेरी बातें कई लोगों को ज़रूर नश्तर की तरह चुभेंगी और यहां अगर हिम्मत न हो सकी तो इनबॉक्स में गालियां पड़ेंगी लेकिन जो सच है सो सच है और हां मुझे मुसलमान का मतलब समझाने से पहले ज़रा ख़ुद के अंदर भी झांक लीजिएगा क्योंकि ‘’मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना… हिन्दी हैं हम… वतन है हिन्दुस्तां हमारा…”।

जय हिन्द… जय हिन्दी… वंदे मातरम्’’!!

दिप्ती को अंग्रेज़ी न आना शर्म की बात नहीं, लेकिन मांजरेकर का हिन्दी न बोलना देश का अपमान है !

किसी भी देश के विकास में महिलाओं का बहुत बड़ा किरदार होता है, ऐसा कहा जाता है कि पुरुष के कंधों से कंधा मिलाकर अगर महिलाएं भी चलने लगें तो देश का विकास तय है। भारत में भी महिलाओं और पुरुष के बीच की ये दूरी मिटती जा रही है, फिर चाहे वह राजनीति का अखाड़ा हो या फिर खेल का मैदान।
ओलंपिक्स में तो भारतीय तिरंगे की शान महिलाएं ही रहीं, जब पीवी सिंधू और साक्षी मलिक ने भारत की झोली में 2 पदक दिलाए थे। देश में धर्म की तरह रुत्बा रखने वाले क्रिकेट में भी भारतीय महिलाएं देश की शान बनी हुई हैं। हाल ही में चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल तक पहुंचने वाली भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम की तरह महिला क्रिकेट टीम भी वर्ल्डकप में चमक बिखेर रही है।

इंग्लैंड में खेले जा रहे विश्वकप में मिताली राज की कप्तानी वाली टीम इंडिया सेमीफ़ाइनल में पहुंचने वाली पहली टीम बन गई है। 4 मैचों में 4 जीत के साथ भारतीय महिला टीम क्रिकेट पर राज करने के बेहद क़रीब खड़ी है। और इसका श्रेय जाता है टीम इंडिया की कैप्टन मिताली राज को, अपने नाम की ही तरह वह भी क्रिकेट पर मानो ‘राज’ कर रही हैं।

वनडे क्रिकेट में 181 मैचों में 51.81 की बेमिसाल औसत से 5959 रन बनाने वाली मिताली महिला क्रिकेट में 6000 रन बनाने वाली पहली क्रिकेटर बनने से कुछ ही दूर हैं। उनके आगे बस इंग्लैंड की पूर्व कप्तान शार्लोट एडवर्ड्स ही हैं जिनके नाम 191 मैचों में 5992 रन है। यानी 41 रन बनाने के साथ ही मिताली महिला क्रिकेट में 6 हज़ार रन बनाने वाली पहली खिलाड़ी बन जाएंगी।

मिताली के लिए ये किसी सपने से कम नहीं होगा, लेकिन उससे भी बढ़कर ये है कि जिस देश में क्रिकेट को धर्म और सचिन तेंदुलकर को भगवान माना जाता है उस देश में मिताली का एक अलग मुक़ाम हो गया है। पहले किसी महिला खिलाड़ी के बारे में कहा जाता था, ‘’क्या खेलती है महिला क्रिकेट की सचिन है।‘’ ‘’उसे देखो महिला क्रिकेट की कपिल देव है।‘’ लेकिन उस सोच को बदलते हुए मिताली ने अब कुछ ऐसा कर दिया है, ‘’मेरी बेटी तो अगली मिताली बनेगी’’।

2013 में जब अपने ही घर में टीम इंडिया को वर्ल्डकप में हार मिली थी तो मिताली के साथ साथ पूरा देश निराश और हताश था, लेकिन उस हार से न सिर्फ़ मिताली ने सबक़ लिया बल्कि क्रिकेट पर राज करने की रणनीति बनाने लगीं और उसका रंग अब इंग्लैंड में उफ़ान पर है। मिताली एक शानदार सेनापति की तरह टीम का नेतृत्व कर रही हैं तो उनकी साथी खिलाड़ी भी एक लक्ष्य के साथ भारत को वर्ल्ड चैंपियन बनाने की ओर तेज़ी से ले जा रही हैं।

एकता बिश्ट से लेकर अनुभवी झूलन गोस्वामी और श्रीलंका के ख़िलाफ़ शानदार ऑलराउंड प्रदर्शन (78 रन और 1 विकेट) करने वाली दिप्ती शर्मा ने टीम इंडिया को महत्वपूर्ण जीत के साथ सेमीफ़ाइनल का टिकट हासिल करा दिया। दिप्ती के इस प्रदर्शन से सारा हिन्दुस्तान झूम रहा था, उन्हें जब मैन ऑफ़ द मैच की ट्रॉफ़ी मिली तो भारतीय क्रिकेट फ़ैन्स के मुंह से बस एक ही बात निकली कि ‘’दिप्ती इसकी असली हक़दार हैं’’।

लेकिन फिर जो हुआ उसने दिप्ती के साथ साथ सारे हिन्दुस्तान को शर्मसार कर दिया, और ये किसी और ने नहीं बल्कि भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम के पूर्व बल्लेबाज़ और वर्तमान कॉमेंटेटर संजय मांजरेकर ने किया। दरअसल, पोस्ट मैच प्रेज़ेंटेशन में जब दिप्ती आईं तो मांजरेकर ने उनसे अंग्रेज़ी में सवाल किया। दिप्ती अंग्रेज़ी में असहज दिखीं लिहाज़ा उन्होंने अपनी मातृ भाषा और हिन्दुस्तान की अपनी भाषा हिन्दी में जवाब दिया। सभी को लगा कि हिन्दुस्तान के बड़े और ख़ूबसूरत शहर मुंबई मे जन्में मांजरेकर भी अब हिन्दी में ही अगला सवाल करेंगे। लेकिन शायद मांजरेकर को टीवी के सामने और इंग्लैंड में अंग्रेज़ों की मौजूदगी में हिन्दी बोलने में शर्म महसूस हो रही थी। वह हिन्दुस्तानी ‘’अंग्रेज़’’ की तरह फ़र्राटे से इंग्लिश में सवालों का बाउंसर दिप्ती पर दाग रहे थे जिसे वहां मौजूद ट्रांसलेटर हिन्दी में दिप्ती को समझा रही थी।

भारत की जीत की ख़ुशी और दिप्ती के ख़ुश करने वाले प्रदर्शन से अचानक हिन्दुस्तानियों का ध्यान मांजरेकर के द्वारा दिप्ती की बेइज़्ज़ती और देश को शर्मसार करने पर चला गया। सवाल ये नहीं कि दिप्ती को अंग्रेज़ी नहीं आती, बल्कि सवाल ये है कि क्या हिन्दुस्तान के लिए खेलने वाले और हिन्दुस्तान में जन्में और हिन्दी गाना गाने का शौक़ रखने वाले मांजरेकर की ज़ुबान से अंग्रेज़ों की ज़मीन पर हिन्दी क्यों ग़ायब हो गई ? क्या मांजरेकर को पाकिस्तानी पुरुष क्रिकेट टीम के कप्तान सरफ़राज़ अहमद का वह वाक़्या याद आ गया था जिसमें उनके इंग्लिश अच्छी न बोलने की वजह से ख़ूब खिंचाई हुई थी ?

जवाब चाहे जो भी हो, लेकिन मांजरेकर अगर हिन्दी में दिप्ती से बात कर लेते तो उनका सिर शर्म से झुकता नहीं बल्कि हिन्दी और हम हिन्दुस्तानियों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। अब बस फ़र्क इतना है कि इंग्लिश न आते हुए भी अपने दिल और देश की भाषा बोलने वाली दिप्ती को सारे देश ने दिल में जगह दी है तो हिन्दुस्तान के लिए 37 टेस्ट और 74 वनडे खेलने वाले मांजरेकर अचानक हिन्दी से प्यार करने वालों के दिल से उतर गए।

कोहली और कुंबले की अलग हुई राहों पर लड़खड़ाता हुआ भारतीय क्रिकेट का भविष्य !

18 जून को चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में पाकिस्तान से मिली हार की टीस अभी टीम इंडिया के फ़ैन्स के दिल से कम भी नहीं हुई थी, कि बस दो दिन बाद 20 जून को कोच के पद से अनिल कुंबले के इस्तीफ़े ने एक और झटका दे दिया।

हालांकि ये तय था क्योंकि 20 जून को अनिल कुंबले का बतौर कोच कार्यकाल ख़त्म हो रहा था। लेकिन बीसीसीआई की ओर से वेस्टइंडीज़ दौरे तक उन्हें कोच पद पर बने रहने की गुज़ारिश ने उम्मीद भी बांध रखी थी। भारत के लिए टेस्ट इतिहास में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ अनिल कुंबले ने इस गुज़ारिश को स्वीकार नहीं किया और इस्तीफ़ा दे दिया।

इससे पहले ही कप्तान विराट कोहली और कुंबले के बीच विवादों की ख़बरें छाई हुईं थी। हालांकि चैंपियंस ट्रॉफ़ी में टीम इंडिया के शानदार प्रदर्शन और कोहली के बयान के बाद लगा कि ये बस अफ़वाह ही थी। पर इस विवाद ने कुंबले के इस्तीफ़े के बाद सोशल मीडिया पर शोले की शक़्ल अख़्तियार कर ली थी, हर तरफ़ से इसे कोहली से जोड़कर देखा जाने लगा।

एक बार फिर हमें लगा कि ये सिर्फ़ अफ़वाह ही होगी और कुंबले ख़ुद मीडिया के सामने आकर इसे ख़त्म कर देंगे और बेबुनियाद करार देंगे। लेकिन कुंबले तो नहीं पर उनका मैसेज सभी के सामने आया और वह किसी बॉम्ब से कम नहीं है, जिसने टीम इंडिया और क्रिकेट फ़ैन्स को झकझोड़ कर रख दिया।

कुंबले ने कोच पद छोड़ने के बाद बीसीसीआई और टीम इंडिया का शुक्रिया तो अदा किया लेकिन साथ ही साथ कोहली और उनके बीच विवाद को सिर्फ़ हवा नहीं दे दी बल्कि साफ़ अलफ़ाज़ों में कह दिया कि मेरा कोच रहना कोहली को पसंद नहीं था।

कुंबले के लिखे पत्र की मुख्य पंक्ति जो कोहली के लिए है वह ये है, ‘’मुझे बीसीसीआई से पता चला कि कोहली मेरे काम करने के तरीक़े से ख़ुश नहीं हैं, लिहाज़ा इस माहौल में काम करना मेरे लिए मुमकिन नहीं।‘’

मतलब साफ़ है कि कुंबले का काम करने का तरीक़ा कोहली को पसंद नहीं था, लेकिन आख़िर ऐसा क्या कर दिया कुंबले ने कि कोहली को इतना नागवार गुज़रा। हमें जो जानकारी मिली है उसके अनुसार ये कुछ ऐसे प्वाइंट्स हैं जो कोहली को पसंद नहीं आए और उन्हें लगा कि उनका इगो क्लैश हो रहा है।

#1 धर्मशाला टेस्ट में कोहली चाहते थे अमित मिश्रा को खिलाना, लेकिन कुंबले ने कुलदीप यादव को दिया मौक़ा।

#2 कुंबले खिलाड़ियों को अनुशासन में रहने की हमेशा देते थे नसीहत।

#3 कुंबले ने फ़िट्नेस साबित करने के लिए खिलाड़ियों को बिना घरेलू क्रिकेट खेले हुए टीम में वापसी करने से मना कर दिया था।

#4 कोहली बीसीसीआई के वार्षिक कॉन्ट्रैक्ट में महेंद्र सिंह धोनी को ग्रेड ए में नहीं रखना चाहते थे, लेकिन कुंबले ने उन्हें बरक़रार रखा।

#5 कोहली शुरू से ही कुंबले को बतौर कोच नहीं चाहते थे, उनकी पहली पसंद थे रवि शास्त्री।

पहले चार प्वाइंट्स ये दर्शाते हैं कि किस तरह कोहली को कुंबले का रवैया पसंद नहीं था और आख़िरी यानी पांचवें प्वाइंट से ये पता चलता है कि कोहली ने कुंबले के लिए पहले से ही अपनी सोच बना रखी थी क्योंकि वह उनकी स्कीम ऑफ़ थिंग्स में शास्त्री की तरह शायद फ़िट नहीं थे।

टीम इंडिया के लिए कप्तान और कोच के बीच विवाद कोई नया नहीं है, ग्रेग चैपल और सौरव गांगुली का क़िस्सा तो ऐसा है कि अगर बॉलीवुड में उस पर फ़िल्म बने तो बाहुबली और दंगल की तरह 1000 करोड़ क्लब में शामिल हो जाए। दाग़ तो जॉन राइट और वीरेंद्र सहवाग के बीच भी नज़र आया था लेकिन वह इतना नहीं दिखा कि गंदा लग सके। पर इस बार तस्वीर इसलिए अलग है क्योंकि कोच विदेशी नहीं बल्कि भारतीय ही हैं, वह भी ऐसे जो क्रिकेट इतिहास के सबसे सफल और बड़े गेंदबाज़ के साथ साथ शानदार कप्तान भी रह चुके हैं।

तस्वीर का एक पहलू तो देखकर ऐसा ही प्रतीत होता है कि कप्तान कोहली क़सूरवार हैं। लेकिन क्या हम और आप ये बातें तब कर सकते थे जब कुंबले ने पत्र नहीं लिखा होता, जवाब न में ही आएगा। यानी अगर कोहली क़सूरवार हैं और उनका इगो इतना ज़्यादा है कि कोच की दख़लअंदाज़ी उन्हें पसंद नहीं, तो ग़लती कोच साहब से भी हो गई।

अगर अनिल कुंबले ने चिट्ठी के ज़रिए कप्तान और अपने बीच की तनातनी की बात न बताई होती तो शायद ही आज हर किसी को इस बात का इल्म होता और टीम इंडिया इस संकट के दौर से न गुज़र रही होती। ऐसी कोई बात नहीं और ऐसा कोई मतभेद नहीं होता जो बैठ कर सुलझाया न जा सके, तो फिर कुंबले अपने जज़्बात पर क़ाबू क्यों नहीं रख पाए ? राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और महेंद्र सिंह धोनी के अचानक टेस्ट से संन्यास लेने के पीछे भी कुछ कारण हो सकते हैं लेकिन इन दिग्गजों ने कभी भी इस बात का ज़िक्र नहीं किया।

हालांकि, हर कोई न कुंबले हो सकते हैं और न ही धोनी या द्रविड़। लेग स्पिन के बीच में तेज़ी से सीधी फ़्लिपर डालते हुए सैंकड़ो विकेट लेने वाले कुंबले का स्वभाव भी फ़्लिपर की ही तरह है यानी वह हमेशा साफ़ और सीधी बात के लिए जाने जाते हैं। और यही वजह है कि इस बार भी जैसे ही उन्हें कोहली के रवैये की भनक लगी उनके साथ और कोच पद पर रहना मुनासिब नहीं समझा और सीधी बात करने वाले कुंबले ने फोड़ डाला लेटर बॉम्ब।

इसमें कोई शक नहीं है कि कुंबले की ये बात उनकी गेंदो की ही तरह सटीक और सीधे निशाने पर है। लेकिन इसका परिणाम भारतीय क्रिकेट के लिए कम से कम मौजूदा वक़्त में तो मुश्किलों से भरा दिख रहा है। कुंबले के इस ख़ुलासे के बाद टीम इंडिया और कप्तान कोहली के लिए आने वाला समय बेहद कठिन है। पाकिस्तान से फ़ाइनल में मिली हार से अभी कोहली एंड कंपनी के ऊपर दोबारा जीत की पटरी पर लौटने का दबाव भी है। और इस बीच इस घटना ने उनपर एक सवालिया निशान भी लगा दिए हैं।

#1 क्या कोहली को किसी कोच की दख़लअंदाज़ी पसंद नहीं ?

#2 नए कोच के साथ भी कोहली का रवैया ऐसा ही रहेगा ?

#3 टीम इंडिया के अगले कोच पर पहले से ही कोहली के साथ मिलकर काम करने का दबाव रहेगा ?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो विराट कोहली के साथ साथ टीम इंडिया के नए कोच के ज़ेहन में भी चल रहे होंगे। जो न तो भारतीय क्रिकेट के लिए अच्छा है और न ही किसी भी कोच या कप्तान के लिए। शायद यही वजह है कि महेंद्र सिंह धोनी को कैप्टेन कूल और अब तक का सबसे सफल कप्तान माना जाता है, क्योंकि 10 साल की कप्तानी के दौरान धोनी की किसी भी कोच के साथ कोई मतभेद की ख़बर नहीं आई थी। धोनी और गैरी कर्स्टन की दोस्ती की तो आज भी मिसाल दी जाती है, साथ ही आईपीएल में धोनी और चेन्नई सुपर किंग्स के कोच स्टीफ़ेन फ़्लेमिंग की भी जोड़ी किसी से छिपी नहीं है।

बहरहाल, कोहली को जिस तरह एक योद्धा के तौर पर जाना जाता है और जिस तरह उन्होंने ख़ुद को बदलते हुए और मेहनत करते हुए अपनी क्रिकेट और बल्लेबाज़ी को बुलंदियों पर ले गए हैं। ठीक उसी तरह वह इन मुश्किलों से भी सबक़ लेते हुए एक अच्छे कप्तान के साथ साथ अपने इगो को भी ख़त्म कर एक अच्छे इंसान बनते हुए भारतीय क्रिकेट को भी सुनहरे भविष्य की ओर ले जाएंगे।

लेकिन इन सब के बीच हमने जो खोया वह है अनिल कुंबले जैसा हार न मानने वाला खिलाड़ी, जिसने एक साल के छोटे से वक़्त में भारत को टेस्ट से लेकर वनडे तक में कई यादगार जीत दिलाई। कुंबले और कोहली का ये सफ़र अगर लंबा चलता रहता तो ज़रा सोचिए टीम इंडिया की रफ़्तार आज कितनी तेज़ होती और मंज़िल कितने पास।

पाकिस्तान के ‘महेंद्र सिंह धोनी’ बन सकते हैं सरफ़राज़ अहमद !

18 जून 2017, रविवार का ये दिन पाकिस्तान के क्रिकेट इतिहास के सबसे सुनहरे दिनों में से एक में शुमार हो गया। 65 साल के पाकिस्तान क्रिकेट इतिहास में ये पहला मौक़ा था जब भारत को हराकर पाकिस्तान ने किसी आईसीसी टूर्नामेंट पर कब्ज़ा जमाया हो।

शायद ही किसी ने सपने में भी सोचा हो कि जिस टीम को आख़िरी लम्हों में वेस्टइंडीज़ की जगह इंग्लैंड में होने वाली चैंपियंस ट्रॉफ़ी का टिकट मिला वही विजेता बन जाएगी। आईसीसी की वनडे रैंकिंग में नंबर-8 पर रहते हुए पाकिस्तान ने चैंपियंस ट्रॉफ़ी के लिए क्वालीफ़ाई किया लेकिन इसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया।
पाकिस्तान के लिए ये जीत सिर्फ़ एक उलटफेर नहीं बल्कि पाकिस्तान के लड़ाकू जज़्बे को एक बार फिर क्रिकेट मैप पर ला चुकी है। चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीतना पाकिस्तान के लिए इसलिए भी बेहद मायने रखती है क्योंकि इस टीम का प्रदर्शन पिछले कुछ सालों में बेहद निराशाजनक रहा था।

पाकिस्तान में हुए घरेलू टी20 लीग में शारजील ख़ान और मोहम्मद इरफ़ान जैसे खिलाड़ियों के स्पॉट फ़िक्सिंग में फंसने के बाद तो एक बार फिर पाकिस्तान ग़लत चीज़ों के लिए चर्चा में आ चुका था। क्रिकेट पंडितों और आलोचकों ने तो इस टीम का बहिष्कार तक करने की वक़ालत कर दी थी।

लेकिन जिस तरह अंधेरे के बाद उजाला आता है ठीक वैसे ही पाकिस्तान क्रिकेट में भी मानो करवट बदलने की स्क्रिप्ट तैयार की जा रही थी। जिसके लिए चैंपियंस ट्रॉफ़ी से अच्छा कोई लॉन्चिंग पैड हो ही नहीं सकता था और इस स्क्रिप्ट में नायक तो कई थे लेकिन पोस्टर बॉय बनकर सामने आए पाकिस्तान के कप्तान सरफ़राज़ अहमद।

भारत के ख़िलाफ़ पहले मैच में करारी हार झेलने के बाद सरफ़राज़ ने कड़ा फ़ैसला लेते हुए अहमद शहज़ाद को बाहर का रास्ता दिखाया और उनकी जगह टीम में युवा फ़ख़र ज़मान को प्रोटियाज़ के ख़िलाफ़ पहली बार मैदान में उतारा। सरफ़राज़ अहमद और पाकिस्तान के लिए ज़मान लकी चार्म बन कर आए और फ़ाइनल में फ़ख़र ने शतक लगाते हुए पूरे पाकिस्तान को फ़क्र करने का मौक़ा दे दिया।

ज़मान के अलावा पाकिस्तान की जीत के हीरो तो कई रहे जिसमें मोहम्मद आमिर, गोल्डेन बॉल के विजेता एक और युवा गेंदबाज़ हसन अली और लेग स्पिनर शदाब ख़ान। लेकिन इनकी प्रतिभाओं को किसी ने पहचाना और तराशा तो वह थे विकेट के पीछे रहते हुए भविष्य की रणनीति बनाने वाले कप्तान सरफ़राज़ अहमद। सरफ़राज़ ने इस युवा टीम में एक जोश भर दिया, और ख़ुद भी श्रीलंका के ख़िलाफ़ हारी बाज़ी जीतते हुए टीम और साथियों का हौसला बुलंद कर दिया था।

ये हौसला ही था जिसने सेमीफ़ाइनल में मेज़बान इंग्लैंड के विजय रथ को भी रोक डाला और शान से फ़ाइनल में जगह बनाई। इस युवा टीम को चैंपियंस ट्रॉफ़ी दिलाने के साथ साथ सरफ़राज़ ठीक वैसे ही खिलाड़ियों में जीत की आदत डाल रहे हैं जो 2007 टी वर्ल्डकप में भारतीय कप्तान मेहंद्र सिंह धोनी ने किया था।

सरफ़राज़ भी पाकिस्तान के धोनी बनने की राह पर नज़र आ रहे हैं, वह भी धोनी ही की तरह विकेटकीपर हैं और एक शानदार फ़िनिशर। जिसका नमूना उन्होंने चैंपियंस ट्रॉफ़ी में एक बार दिखा दिया। पाकिस्तान क्रिकेट को भी अर्से से एक धोनी जैसे कप्तान की तलाश थी, जो युवा खिलाड़ियों को तराश सकें और उनपर भरोसा करने के साथ साथ विपरित हालातों में समर्थन कर सकें। सरफ़राज़ बिल्कुल ऐसा ही कर रहे हैं और भविष्य में भी पाकिस्तान को उनसे यही उम्मीद है।

जिस तरह 2007 टी20 वर्ल्डकप के बाद धोनी की कप्तानी में टीम इंडिया ने नई ऊंचाइयों को छुआ, अब कुछ ऐसी ही ज़िम्मेदारी सरफ़राज़ अहमद के कंधों पर भी है। देखना यही है कि धोनी ने जिस तरह कभी जीत को अपने ऊपर और टीम पर हावी नहीं होने देते थे क्या उसी तरह सरफ़राज़ भी ख़ुद को शांत रख पाएंगे। अगर माही की तरह सरफ़राज़ भी कैप्टेन कूल बन गए तो फिर पाकिस्तान क्रिकेट को भी इस तरह के मैजिक की आदत डाल लेनी होगी।

फ़ाइनल में कोहली एंड कंपनी से हो गईं ये 5 ग़लतियां…

चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में भारत को 180 रनों से हराकर पाकिस्तान ने पहली बार ICC चैंपियंस ट्रॉफ़ी पर कब्ज़ा जमा लिया। पाकिस्तान की ये जीत उनके साथ साथ क्रिकेट के लिए भी शानदार है। तो वहीं टूर्नामेंट की सबसे बड़ी दावेदार और चैंपियंस ट्रॉफ़ी के ख़िताब को पहली बार रक्षा करने के बेहद क़रीब पहुंचने वाली टीम इंडिया की इस हार ने सभी को हैरान भी कर दिया।

फ़ाइनल में नंबर-8 रैंकिंग की टीम पाकिस्तान के हाथों कोहली एंड कपंनी को मिली इस हार के बाद पूरा देश सन्न है। हालांकि, टीम इंडिया ने पूरे चैंपियंस ट्रॉफ़ी में कमाल का प्रदर्शन किया बस आख़िरी पड़ाव पार करने में चूक गई। आख़िर इस चूक की वजह क्या थी ? अचानक ऐसा क्या हो गया कि पाकिस्तान के सामने भारत पस्त पड़ गया ?

टीम इंडिया की हार के पांच बड़े कारण आपके सामने रख रहे हैं, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि पाकिस्तान से उनकी जीत का श्रेय छीना जाए। उन्होंने अच्छी क्रिकेट खेलते हुए न सिर्फ़ चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीती है बल्कि दिल भी जीत गए सरफ़राज़ और उनके साथी।

#1 टॉस हारकर पहले गेंदबाज़ी करना पड़ गया भारी

विराट कोहली को रनों का पीछा करना पसंद है और इसमें वह सफल भी रहे हैं। लेकिन कल परिस्थ्तियां अलग थीं, एक तो क्रिकेट का सबसे बड़ा टूर्नामेंट और दूसरा सामने पाकिस्तान जिनके गेंदबाज़ हैं उनकी ताक़त। कोहली का टॉस जीतकर पाकिस्तान को बल्लेबाज़ी का आमंत्रण देना, भारत पर भारी पड़ गया। बड़े मैच में रनों का पीछा करना बल्लेबाज़ी करने वाली टीम पर दबाव बनाता है। और वही हुआ भी 338 रनों का पहाड़ जैसा स्कोर भारतीय बल्लेबाज़ों पर दबाव बनकर ऐसा टूटा कि टीम इंडिया 200 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई। पाकिस्तान के लिए टॉस हारना वरदान साबित हुआ क्योंकि उन्हें चेज़ के मामले में फिसड्डी ही माना जाता है, अगर एक बार 280 से ऊपर का लक्ष्य उन्हें मिल जाए तो वह उसमें बिखर जाती हैं। अगर भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी की होती तो शायद तस्वीर कुछ और होती।

#2 जसप्रीत बुमराह की ‘नो बॉल’ ने लगाई पाकिस्तान की नैया पार

पहले गेंदबाज़ी करते हुए कोहली एंड कंपनी की नज़र थी एक शानदार शुरुआत पर, जो जसप्रीत बुमराह ने दिलाई भी थी लेकिन जिस गेंद पर फ़ख़र ज़मान का कैच विकेट के पीछे लपका गया वह नो बॉल निकल गई। ये पहला मौक़ा नहीं था जब बुमराह ने इस तरह की ग़लती की हो, वर्ल्ड टी20 2016 के सेमीफ़ाइनल में भी बुमराह ने यही किया था और तब लेंडल सिमंस ने मैच भारत के हाथ से छीन लिया था। इस मैच में फ़ख़र ज़मान सिर्फ़ 3 रन पर थे जब उन्हें इस तरह जीवनदान मिला और फिर उन्होंने इसका फ़ायदा उठाते हुए 114 रन बना डाला और पाकिस्तान की नैया पार लगा दी।

#3 अश्विन को प्लेइंग-XI में रखना हुई ग़लती

भारत ने लीग मैच में जब पाकिस्तान को शिकस्त दी थी तो उस मैच में तेज़ गेंदबाज़ उमेश यादव ने शानदार गेंदबाज़ी की थी। लेकिन अगले मैच में श्रीलंका से मिली हार के बाद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया और प्रोटियाज़ के ख़िलाफ़ ऑफ़ स्पिनर आर अश्विन को प्लेइंग-XI में शामिल किया गया जिसके बाद से उन्होंने लगातार मैच खेले। पर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ उन्हें टीम में रखना सही फ़ैसला इसलिए नहीं कहा जा सकता। क्योंकि एक तो पाकिस्तानी बल्लेबाज़ स्पिन को अच्छा खेलने के लिए जाने जाते हैं और दूसरा ये कि भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर ख़ास तौर से सीमित ओवर में अश्विन बिल्कुल साधारण गेंदबाज़ ही रह जाते हैं। इस मैच में भी अश्विन पाकिस्तानी बल्लेबाज़ों पर दबाव नहीं बना पाए, नतीजा ये हुआ कि उन्होंने अपने कोटे के 10 ओवर में बिना कोई विकेट लिए 70 रन लुटा डाले। अश्विन की जगह अगर उमेश यादव या मोहम्मद शमी को इस मैच में जगह मिली होती तो कुछ फ़र्क़ ज़रूर पड़ सकता था।

#4 रोहित शर्मा और विराट कोहली का 16 गेंदो के अंदर पैवेलियन लौट जाना

भारत के सामने जीत के लिए 339 रनों का विशाल लक्ष्य था, और इसके लिए ज़रूरत थी एक बेहतरीन और विस्फोटक आग़ाज़ की। रोहित शर्मा और शिखर धवन से कुछ उसी प्रदर्शन की उम्मीद थी जो उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पहले मैच में किया था। इसके बाद विराट कोहली जिन्हें चेज़ मास्टर के तौर पर जाना जाता है, उनपर चैंपियंस ट्रॉफ़ी पर फिर से कब्ज़ा जमाने का दारोमदार था। लेकिन मोहम्मद आमिर की क़ातिलाना गेंदबाज़ी ने इन सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया, आमिर ने पहले रोहित शर्मा को पहले ही ओवर में LBW आउट किया। फिर अगले ही ओवर में विराट कोहली को भी आमिर ने अपना शिकार बना लिया था। टीम इंडिया की जीत की उम्मीदों को इन दो झटकों ने झकझोर दिया था जिसके बाद फिर भारतीय बल्लेबाज़ उबर नहीं पाए।

#5 रविंद्र जडेजा और हार्दिक पांड्या के बीच मिक्स अप

भारत के 6 विकेट 72 रनों पर गिर चुके थे और यहां से जीत असंभव के क़रीब लग रही थी। लेकिन ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या ने हार नहीं मानी थी और 32 गेंदो पर अर्धशतक लगा डाला था, जो किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट के फ़ाइनल का सबसे तेज़ अर्धशतक था। 43 गेंदो पर 6 छक्कों के साथ 76 रन बनाकर खेल रहे हार्दिक पांड्या अचानक से भारत की जीत के आख़िरी उम्मीद बन गए थे। लेकिन तभी रविंद्र जडेजा ने कवर की तरफ़ शॉट खेला जिसपर रन लेने के लिए पांड्या भाग निकले और जडेजा की छोर के क़रीब पहुंच गए थे। पर जडेजा ने रन लेने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं दिखाई और इस मिक्स अप में पांड्या अपनी विकेट गंवा गए। भारत की आख़िरी उम्मीद भी पांड्या के आउट होते ही ख़त्म हो गई, इस मैच की हार का पांचवां और आख़िरी बड़ा कारण पांड्या का आउट होना बन गया।

24 अप्रैल: ‘क्रिकेट धर्म’ के ‘भगवान’ का जन्म, सचिन जो अब सोच हैं !

सचिन रमेश तेंदुलकर, एक ऐसी शख़्सियत जिसने भारत में क्रिकेट की सोच बदल डाली। अगर 1983 में कपिल देव की कप्तानी में वर्ल्ड कप जीतने के बाद भारतीय क्रिकेट टीम ने देशवासियों का क्रिकेट के खेल में जुनून बढ़ाया, तो 1989 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ डेब्यू करने वाले 16 साल के लड़के ने क्रिकेट के इस खेल को धर्म में तब्दील कर दिया।

24 अप्रैल 1973 में एक साधारण से परिवार में जन्में सचिन का नाम मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन पर पड़ा। शायद इस नाम का ही असर था कि जैसे एस डी बर्मन के संगीत पर लोग झूम उठते थे, कुछ उसी तरह सचिन तेंदुलकर के बल्ले से निकले शॉट भी क्रिकेट प्रेमियों की आंखों को सुकून देते थे और ऐसा लगता था मानो किसी मधुर संगीत की तान पर बल्लेबाज़ी हो रही हो।

दशक पर दशक बदलते गए, भारतीय क्रिकेट ने कई ऊंचाईयों को छुआ तो मैच फ़िक्सिंग के साए ने भी देशवासियों से लेकर खिलाड़ियों तक को मायूस कर दिया। लेकिन जिस तरह एक धर्म को बचाने के लिए मसीहा आगे आता है, कुछ वैसे ही क्रिकेट के इस धर्म को सचिन का साथ मिला और उन्होंने 3 दशकों तक भारतीय क्रिकेट की उम्मीदों के बोझ को अपने कंधों पर उठाया। विश्वास और उम्मीद का दूसरा नाम ही बन गए ”सचिन तेंदुलकर”।

फिर वह वक़्त भी आया जब सचिन को विश्वविजेता भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों ने कंधों पर उठाया और उनके उस सपने को साकार किया जिसके लिए सचिन ने क्रिकट खेलना शुरू किया था।
आलोचक ये भी कहते हैं कि सचिन तेंदुलकर का ज़रूरत से ज़्यादा महिमामंडन किया गया। कुछ तो ये भी कहते हैं कि सचिन मैच विनर नहीं थे, लेकिन शायद वह ये भूल जाते हैं कि 24 सालों तक जिस अंदाज़ में सचिन ने सरहदों की दूरियों को अपने स्ट्रेट ड्राइव और अपर कट से एक कर दिया था, वह मैच ही नहीं दिल जीतने में भी माहिर थे।

सचिन को भगवान का दर्जा मिलना कोई महिमामंडन नहीं, इस्लाम मुझे सचिन को ख़ुदा कहने का हक़ भले ही न दे, लेकिन “क्रिकेट” अगर धर्म है तो सचिन ज़रूर उसके भगवान, क्योंकि जैसे जब सबकुछ भगवान ठीक कर देते हैं, वैसे ही क्रिकेट के हर बुरे दौर और वक़्त को ठीक कर देने का विश्वास ही “सचिन” हैं।

वह भी एक ऐसा विश्वास, जो एक सोच बन गई और क्रिकेट का दूसरा नाम ही सचिन तेंदुलकर कहलाने लगा। हाथ में बल्ला और पैरों में पैड पहनने वाला हर क्रिकेटर आज भी यही सोचकर मैदान में उतरता है कि वह सचिन बनेगा।

क्रिकेट की सोच, सपने, और सदी के सबसे बड़े शहंशाह-ए-क्रिकेट को उनके 44वें जन्मदिन पर तहे दिल से मुबारकबाद…

#सैयदकीस्याहीसे…

रोजर फ़ेडरर अब सिर्फ़ नामी शख़्सियत नहीं बल्कि सोच बन गए हैं !

क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर, तो F1 में माइकल शुमाकर, फ़ुटबॉल में अगर लियोनेल मेसी तो टेनिस में रोजर फ़ेडरर ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने सिर्फ़ शोहरत नहीं कमाई बल्कि उस खेल का ही पर्यायवाची शब्द बन गए। हो सकता है इनमें से कुछ नामों में आप में से कुछ लोग शायद मुझसे इत्तेफ़ाक न रखें या कहें कि ये नहीं वह होना चाहिए था। लेकिन मैंने उन दौर के खिलाड़ियों का नाम लिया है जब मेरी रगों में भी एक खिलाड़ी दौड़ता था और खेल और खिलाड़ियों को चाहने का नया नया जोश उफ़ान पर था।

भारत में पैदा होने की वजह से क्रिकेट मेरा भी पहला प्यार था और सचिन तेंदुलकर भी आप और कईयों की तरह मेरे सबकुछ थे। 2003 क्रिकेट वर्ल्डकप में सचिन का लाजवाब फ़ॉर्म भी याद है तो फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों धुनाई ने कुछ दिन के लिए मेरे सिर से क्रिकेट का भूत उतार दिया था। तब टेनिस मेरा दूसरा प्यार हो चुका था, और उस वक़्त स्विटज़रलैंड के युवा टेनिस खिलाड़ी का ख़ूब नाम हो रहा था। नाम था रोजर फ़ेडरर, मैं भी फ़ेडरर का जल्द ही फ़ैन हो गया था, रोजर ने पहली बार विंबलडन का ख़िताब अपने नाम किया था और तब ख़ूब सुर्ख़ियां बनी थीं कि ”ग्रांड स्लैम जीतने वाले पहले स्विस खिलाड़ी बने रोजर फ़ेडरर।” तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अपने देश को पहली बार कोई ग्रैंड स्लैम ख़िताब दिलाने वाला ये खिलाड़ी आने वाले कुछ सालों में टेनिस के सारे रिकॉर्ड्स अपने नाम करते हुए इस खेल पर राज करने लगेगा।

1998 में जूनियर टेनिस में क़दम रखने के साथ ही विंबलडन चैंपियन बन तहलका मचाने वाले रोजर फ़ेडरर के लिए ये तो बस एक शुरुआत थी। अगले 4 सालों तक यानी 2004, 2005, 2006 और 2007 में लगातार वह विंबलडन चैंपियन रहे। 5 सालों तक चैंपियन रहने के बाद छठे साल यानी 2008 में वह रनर अप रहे फिर 2009 में दोबारा ताज अपने सिर पर पहन लिया।

इन सालों में सिर्फ़ विंबलडन ही नहीं बल्कि सभी ग्रांड स्लैम (ऑस्ट्रेलियन ओपन, फ़्रेंच ओपन और यूएस ओपन) पर भी फ़ेडरर का राज होता गया। इस दौरान रोजर फ़ेडरर ने पुरुष टेनिस के सिंगल्स मुक़ाबलों में पीट संप्रास के सबसे ज़्यादा 13 ग्रैंड स्लैम को भी पीछे छोड़ दिया था। हालांकि फ़ेडरर ने बुरा दौर भी देखा 2012 में विंबलडन जीतने के बाद फ़ेडरर फिर कोई भी ग्रैंड स्लैम नहीं जीत पा रहे थे। कहा तो ये भी जाने लगा था कि अब फ़ेडरर का करियर ख़त्म होने के कगार पर है उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। कोई ये कहने लगा कि उनकी उम्र अब उनका साथ नहीं दे रही उनको अब टेनिस कोर्ट को अलविदा कह देना चाहिए।

आलोचकों की इन बातों ने जितना फ़ेडेरर को परेशान नहीं किया, उससे कहीं ज़्यादा चोट ने उन्हें परेशान किया। हार के बाद कई बार उनकी आंखों से निकले आंसू भी शायद यही कहते थे कि अब बहुत हुआ। 2002 से लेकर 2016 तक जिस खिलाड़ी की रैंकिंग कभी टॉप-10 के नीचे नहीं आई थी, जिस खिलाड़ी ने 302 हफ़्तों तक लगातार नंबर-1 की कुर्सी पर रहते हुए वर्ल्ड रिकॉर्ड बना डाला था। वह 2016 आते आते टॉप-10 से भी बाहर ह चुका था, हर तरफ़ से फ़ेडरर पर संन्यास का दबाव बढ़ता जा रहा था।

लेकिन फ़ेडरर ने भी मानो ठान लिया था कि अपने करियर का वह इस तरह अंत नहीं करेंगे, जज़्बा तो था पर बढ़ती उम्र और चोटिल शरीर उनका साथ नहीं दे रहे थे। पर बड़ा खिलाड़ी वही होता है जो विपरित परिस्थितियों में न सिर्फ़ वापसी करे बल्कि अपने खेल से दोबारा सभी का दिल जीत ले।

हार न मानने का फ़ैसला करने के बाद फ़ेडरर ने ख़ुद को टेनिस से कुछ समय के लिए दूर किया और अपनी फ़िट्नेस पर ध्यान देने लगे। कई टूर्नामेंट से बाहर रहना भी फ़ेडरर के संन्यास की अटकलों को बढ़ावा दे रहा था। लेकिन फ़ेडरर ने किसी मक़सद के साथ अपने आप को टेनिस कोर्ट से दूर रखा था, ये उसी उदाहरण की तरह था जैसे शेर शिकार करने से पहले कुछ क़दम पीछे जाता है और फिर वहां से अपने शिकार पर पूरी रफ़्तार और ताक़त के साथ झपट्टा मारता है।

फ़ेडरर भी कोर्ट से तो दूर थे लेकिन कोर्ट पर शानदार वापसी के लिए वह अपने आप को तैयार कर रहे थे। 2017 में फ़ेडरर ने कोर्ट पर वापसी का ऐलान करते हुए सभी को चौंका दिया, अब बारी थी साल के पहले ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट की जहां फ़ेडरर अपने करियर की सबसे ख़राब रैंकिंग के साथ 17वीं सीडेड खिलाड़ी के तौर पर शिरकत कर रहे थे। लेकिन रैंकिंग और सीड को फ़ेडेरर ने ठीक उसी तरह एक नंबर साबित कर दिया जैसे उनके लिए उम्र भी बस एक नंबर थी। फ़ेडरर ने एक के बाद एक शानदार जीत दर्ज करते हुए फ़ाइनल में एंट्री ले ली और वहां अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी राफ़ेल नडाल को हराकर 5 साल बाद किसी ग्रैंड स्लैम पर कब्ज़ा जमाया और साबित कर दिया था कि टेनिस और रोजर फ़ेडरर अभी भी साथ साथ हैं।

रोजर फ़ेडरर ने इसके बाद इसी साल इंडियन वेल्स और मियामी ओपन के भी चैंपियन बने और इस बात का सभी को अहसास करा दिया कि ऑस्ट्रेलियन ओपन में जीत कोई तुक्का नहीं थी। इसके बाद अपने शरीर और चोट को देखते हुए फ़ेडरर ने फ़्रेंच ओपन से अपना नाम वापस ले लिया था और कहा कि वह ग्रास और हार्ड कोर्ट पर ही खेलेंगे।

सभी की नज़रें अब विंबलडन पर थीं, जहां फ़ेडरर एक अलग अंदाज़ में खेलते हुए नज़र आए। लग रहा था मानो ये वही नौजवान है जिसने पहली बार 2003 में विंबलडन अपने नाम किया था। उनके सामने कोई भी विपक्षी हो फ़ेडरर के लिए जीत महज़ औपचारिकता बनती जा रही थी। अगले महीने की 8 तारीख़ को अपना 36वां बसंत पूरा करने वाले फ़ेडरर ने विंबलडन में वह कर दिया जो आज तक सिर्फ़ एक ही खिलाड़ी ने किया था और वह थे बजोर्न बोर्ग जिन्होंने 1976 में पूरे टूर्नामेंट में बिना कोई सेट गंवाए ख़िताब जीता था।

रोजर फ़ेडरर ने भी विंबलडन 2017 में एक भी सेट नहीं गंवाते हुए ख़िताबी मुक़ाबले में पहुंचे और फ़ाइनल में भी मैरिन सिलिक को सीधे सेटों में हराते हुए अपना 8वां विंबलडन और करियर का 19वां ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीत लिया। इस जीत के साथ ही फेडरर ने न सिर्फ़ अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया बल्कि उन्हें भी अपने खेल का दीवाना बना लिया। जीत के बाद फ़ेडरर ने जो कहा वह इस बात की तरफ़ इशारा कर रहा है कि उनमें अभी भी टेनिस बाक़ी है और वह खेलते रहेंगे। उन्होंने कहा, ‘’अगर मैं इसी तरह वापसी करते रहा तो फिर 6 महीने का ब्रेक ले लूंगा…।“

रोजर फ़ेडरर की इस वापसी को आप शानदार कहें, या ड्रीम कमबैक कहें या फिर उनका दूसरा जन्म कहा जाए। लेकिन मेरी नज़र में ये खिलाड़ी या फिर कोई शख़्सियत नहीं बल्कि टेनिस के पर्यायवाची बन चुके हैं जो अब सभी के लिए प्रेरणास्रोत से बढ़कर एक सोच हैं।