हिन्दी हैं हम वतन है… हिन्दुस्तां… हमारा… हमारा !!

गुस्ताख़ी माफ़, जो मैं लिखने जा रहा हूं उससे हो सकता है तथाकथित मुसलमानों को बुरा लग जाए, और उनमें से कुछ मेरे ख़िलाफ़ भी फ़तवा जारी कर दें और मुझे इनब़क्स कर गाली भी दें, जैसा मेरी कुछ सच्ची और कड़ी बातों पर तथाकथित ”देशभक्तों और अंधभक्तों” को भी लग जाता है कि मैं पड़ोसी मुल्क का समर्थक हूं। लेकिन उनके कहने सा न मैं रुक जाता हूं और न ही लिखना छोड़ देता हूं।

हिन्दुस्तान की भाषा और हिन्दी को लेकर मैं हमेशा लिखता रहता हूं, फिर चाहे #SanjayManjrekar उसकी तौहीन करे या #ShoibAkhtar उसका मज़ाक उड़ाए, क्योंकि मुझे जितना हिन्दुस्तान से प्यार है उतना ही हिन्दी से भी। पर इसी हिन्दुस्तान में कुछ धर्म के ठेकेदार ऐसे हैं भी जिन्हें हिन्दुस्तान में रहते हुए हिन्दी से बैर है, इन ठेकेदारों का बस चले तो कुछ दिनों में कौन सी भाषा बोलें और कौन सी न बोलें इस पर भी फ़तवा जारी कर दें। जैसे कि सीधे मुहम्मद साहब ने ही उन्हें इसका अधिकार दिया है, उदाहरण के तौर पर वे चाहते हैं कि मुसलमान को ऊर्दू ही लिखना और बोलना चाहिए। वह क़ुरान-ए-पाक भी पढ़ें तो ऊर्दू या अरबी में ही हिन्दी में तर्जुमा (ट्रांसलेट) की हुई न पढ़ें।

अगर किसी का बच्चा या भाई या बेटी या बहन नौहा या मजलिस (इमाम हुसैन अ.स के साथ साथ इस्लाम को बचाने के लिए करबला में हुए 72 शहीद की याद में पढ़ी जाने वाली तक़रीर और शोकगीत) बेहतरीन लिखता और पढ़ता हो, लेकिन वह हिन्दी में इसे लिखता हो तो इस पर भी मौलाना को ऐतराज़ हो जाता है। इतना ही नहीं अगर कोई मुहम्मद साहब के उपदेशों को भी हिन्दी में पढ़े या सामने वाले को हिन्दी में लिख कर बताए और फैलाए तो भी उन्हें इस बात की ख़ुशी नहीं बल्कि इस बात का दुख होता है कि वह ऊर्दू में क्यों नहीं बोलता या लिखता।

भले ही वह बेहद धार्मिक हो और इस्लाम को फैलाने के लिए हिन्दी या क्षेत्रीय भाषा में उसका प्रचार या प्रसार करे तो भी इन मुल्लाओं और मौलवी को ये गंवारा नहीं, उन्हें लगता है कि मुसलमानों की भाषा ऊर्दू है, और उसी भाषा से अल्लाह ख़ुश होगा और उसी भाषा को वह समझ सकता है। ये लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दबाव डालने की कोशिश करते हैं कि हिन्दी की जगह उन्हें ऊर्दू सिखाओ। मैं कहीं से भी ऊर्दू के ख़िलाफ़ नहीं हूं, बल्कि मुहम्मद साहब के उपदेश का पालन करते हुए मैं भी चाहता हूं ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान हासिल करूं और हर भाषा को जानूं और समझूं।

मुझे भी हिन्दी और इंग्लिश के अलावा ऊर्दू लिखना और पढ़ना आता है लेकिन प्यार मुझे हिन्दी से है, इसका ये मतलब नहीं कि अल्लाह पाक तक मेरी दुआएं हिन्दी में नहीं पहुंचेगी। इन मुल्ललाओं से मैं बोलना चाहता हूं कि जाकर बांग्लादेश में देखो कि कैसे वहां एक ही ज़ुबान है जिन्हें उनसे प्यार है और वह है ‘बांग्ला’। तो क्या उनके ख़ुदा को ऊर्दू नहीं आती ?? इसी तरह ईरान और इराक़ में फ़ारसी, अरब में अरबी। जब बात हो रही है तो इन मुल्लाओं की जानकारी के लिए ये भी बता दूं कि दुनिया में सबसे ज़्यादा मुसलमान इंडोनेशिया में हैं जहां क़रीब 25 करोड़ आबादी में 23 करोड़ मुसलमान हैं। लेकिन उनकी भाषा भी ऊर्दू नहीं है बल्कि ‘’इंडोनेशियन और बाली’’ है।

भारत में तो फिर भी आबादी के मामले में मुसलमान दूसरे नंबर पर आते हैं (क़रीब 20 करोड़। लिखते लिखते अल्लामा इक़्बाल साहब (मुल्ला जी, आप से पूछ रहा हूं वह शायद मुसलमान ही थे न ??) के लिखे हुए सारे जहां से अच्छा की वह लाइन याद आ गई, ‘’हिन्दी हैं हम… वतन है हिन्दुस्तां हमारा… हमारा…” उनके इस गीत की तो इज़्ज्त रखो और अपनी इस भाषा से प्यार करो।

इसमें कुछ क़सूर हमारे संविधान का भी है जिसने हमें मातृभाषा तो दी लेकिन राष्ट्रभाषा की जगह ख़ाली छोड़ दी है। इसी का फ़ायदा दक्षिण भारत में रहने वाले “अंग्रेज़ भारतीय” उठाते हैं और हिन्दी और हिन्दीभाषी से नफ़रत करते हैं, और अब इतनी प्यारी भाषा को भी कुछ मुल्ला पराई बनाने पर अमादा हैं, जबकि सच पूछो तो पराई तो ऊर्दू है जो तुर्की से दक्षिण एशियाई क्षेत्रों से होते हुए भारत में आई।

मुल्लाओं को बस मुहम्मद साहब के उस उपदेश को याद दिलाते हुए अपनी बात ख़त्म करना चाहूंगा जिसमें उन्होंने कहा था कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इस्लाम को पहुंचाना उनका मक़सद है। मुल्लाओं और मौलवी की उतपत्ति भी इसलिए ही हुई कि वह लोगों को मुहम्मद साहब और इस्लाम के बारे में बता पाएं। लेकिन यहां तो उन्होंने राजनीति के लिए मुहम्मद साहब के उपदेशों को ही नज़रअंदाज़ कर दिया, उन्होंने कहा था ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इस्लाम की अच्छाई और उसके बारे में बताओ।

तो दुनिया में तो सब से ज़्यादा बोलने वाली भाषा चाइनीज़ के बाद हिन्दी ही है तो फिर हिन्दी से क्यों तौबा मौलाना साहब ??? मेरी बातें कई लोगों को ज़रूर नश्तर की तरह चुभेंगी और यहां अगर हिम्मत न हो सकी तो इनबॉक्स में गालियां पड़ेंगी लेकिन जो सच है सो सच है और हां मुझे मुसलमान का मतलब समझाने से पहले ज़रा ख़ुद के अंदर भी झांक लीजिएगा क्योंकि ‘’मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना… हिन्दी हैं हम… वतन है हिन्दुस्तां हमारा…”।

जय हिन्द… जय हिन्दी… वंदे मातरम्’’!!

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One thought on “हिन्दी हैं हम वतन है… हिन्दुस्तां… हमारा… हमारा !!

  1. सहमत हूँ आपसे
    बस यह मानता हूँ कि बहुभाषी होना अपने आप में एक उपलब्धि है इसलिए अंग्रेजी का विरोध नहीं करता। सदैव स्वागत है अंग्रेजी का बस उसका प्रचार प्रसार हिन्दी के क्षय का कारण बने तो बुरा लगता है ।

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