सचिन तेंदुलकर के जन्मदिन के मौक़े पर मेरी यादों के झरोखे से उन्हें ये ख़ास भेंट

सचिन रमेश तेंदुलकर, इस नाम के साथ शायद ही कोई भारतीय क्रिकेट प्रेमी हो जिसका नाता न हो… और फिर 80 से 90 के बीच में जन्म लेने वालों के लिए तो सचिन का रुत्बा कुछ अलग ही है… अप्रैल में जन्में या उसी 24 अप्रैल को जन्म लेने वाले क्रिकेट प्रेमियों के लिए मानों कोई सपना ही है जो सचिन के साथ अपना जन्मदिन साझा करें… इस मामले में मैं एक दिन का अभागा हो गया… हमेशा मम्मी से इस बात से लड़ता था कि एक दिन पहले मैं क्यों नहीं आया ?

होश संभालते ही सचिन तेंदुलकर नाम ने अपना बना लिया था… क्रिकेट क्या होता है, कैसे खेला जाता है, ये सब सचिन को ही टीवी पर देखते हुए सीखा… जब भी टीम इंडिया मैदान में होती तो कितना रन बनाना है जीत के लिए, विपक्षी टीम की कितनी विकेट लेनी है… ये कुछ नहीं समझ आता था, बस इस बात की बेचैनी रहती थी कि सचिन तेंदुलकर कब बल्लेबाज़ी करने आएंगे ? कितने रन बनाए सचिन ने ? पक्का तो याद नहीं लेकिन शायद वह 1994 का हीरो कप था जब पहली बार क्रिकेट समझ में आने लगा था… फिर ये भी पता चला कि सचिन बल्ले से ही नहीं गेंद से भी मैच जिता सकते हैं…

1996 विश्वकप के सेमीफ़ाइनल में आंखों से विनोद कांबली के आंसू तो सभी को याद हैं, लेकिन मेरे घर वालों को मेरी आंखों के आंसू उससे ज़्यादा याद हैं… आज भी ज़िक्र होता है तो मम्मी यही कहती हैं कि कांबली तो चुप हो गया होगा लेकिन तुम्हारा रोना कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था… चेन्नई में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पीठ में दर्द के साथ खेली हुई शतकीय पारी हो यो कोलकाता में विवादित तरीक़े से सचिन का रन आउट होना हो, बात बात पर सचिन रुला जाते थे…

2003 तक क्रिकेटर बनने का भूत तो घर वालों ने दूर कर दिया था, लेकिन विश्वकप फ़ाइनल में पहली बार भारत को पहुंचता देखते हुए एक अलग सा अहसास था… उससे पहले पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सचिन की पारी और प्वाइंट के ऊपर से शोएब अख़्तर की गेंद पर सचिन के बल्ले से लगा छक्का मानो विश्वकप जीतने के बराबर ही था… लेकिन फ़ाइनल में सचिन ने बड़ी पारी नहीं खेली जिसकी टीस 2011 तक रही…

अब वक़्त बदल चुका था, बचपन से जवानी के बीच सैयद भी ज़िम्मेदारियों की तरफ़ मुड़ गया था… अब टीम इंडिया भी जीतने लगी थी और आंखों में आंसू भी कम हो गए थे… मैं भी अब सचिन के शहर मुंबई में ही था और इस खेल के भगवान ने मुझे भी टेलिकॉम इंजीनियरिंग से खेल पत्रकारिता की ओर मोड़ दिया था… लेकिन मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि इतना जल्दी और इसी धरती पर भगवान के दर्शन हो जाएंगे…

19 अप्रैल 2008, ये तारीख़ मैं ज़िंदगी में कभी नहीं भूल सकता जब पहली बार मुझे भगवान के साक्षात दर्शन ही नहीं हुए थे बल्कि उनसे बातचीत करने का मौक़ा भी मिल गया था… मौक़ा था आईपीएल के पहले सीज़न का, मैं उस समय बीसीसीआई के लिए आधिकारिक तौर पर रिपोर्टिंग कर रहा था इसलिए एक अलग स्वैग था… और तब मुंबई इंडियंस ने अपने पहले मैच से पहले एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस रखी थी और उसमें सचिन तेंदुलकर भी थे… सचिन को क़रीब से देखना और उनसे बात करने के मौक़े ने मानो मुझे सुन्न कर दिया था, कुछ देर तक मुझे ख़ुद पर यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि क्या ये हक़ीक़त है या फिर सपना या फिर ये कोई और दुनिया ही है…

क्योंकि अब तक तो यही सुनता आया था कि ख़ुदा को न देखा जा सकता है और न ही सुना जा सकता है… पर आज तो मैं क्रिकेट के भगवान को महसूस भी कर रहा था, सुन भी रहा था और देख भी रहा था… दिली तमन्ना थी कि छू भी लूं, और वह भी हो गया जब मैंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद उनसे हाथ मिलाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया और इस भगवान ने सिर्फ़ हाथ मिलाया बल्कि शायद मेरी हालत समझ गए थे और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा ऑल द बेस्ट नहीं बोलेगे मुंबई को ? हालांकि उस सीज़न के शुरुआती कई मैचों में सचिन चोट की वजह से नहीं खेल पाए थे…

इसके बाद वक़्त बदलता गया, और फिर मैं भी हार्ड कोर क्रिकेट प्रेमी से हार्ड कोर पत्रकार हो चला था… लेकिन 2011 में एक बार फिर वह मौक़ा आया जब मेरी पत्रकारिता पर क्रिकेट प्रेमी होना भारी पड़ा और आंखों से आंसू ही नहीं निकले थे, बल्कि ज़ोर ज़ोर से रो रहा था मैं… और इस बार ये ग़म के आंसू नहीं, ख़ुशी के थे… 1996, 1999, 2003 और 2007 में जो न हो सका था वह 2011 में महेंद्र सिंह धोनी ने कर दिखाया था और सचिन तेंदुलकर के ज़िंदगी के सबसे बड़े सपने विश्वकप ट्रॉफ़ी उठाने को सच कर दिखाया था… जब पूरी टीम सचिन को कंधे पर बैठाकर जश्न मना रही थी, तो मैं इसलिए रो रहा था कि जिस भगवान ने दशकों से सवा सौ करोड़ देशवासियों की उम्मीदों को अपने कंधों पर उठा रखा था… उसे ख़ुद अपने सपने को पूरा होने में 5 विश्वकप का इंतज़ार करना पड़ा…

लगा कि अब सबकुछ शानदार हो गया और शाहरुख़ ख़ान की फ़िल्म की तरह हैप्पी एंडिंग हो जाएगी… लेकिन अभी क्लाइमैक्स बाक़ी था, और वह आया 2013 में जब सचिन अपने ही मंदिर यानी वानखेड़े में आख़िरी बार मैदान पर उतरे थे… पूरी दुनिया मास्टर को आख़िरी बार देखने के लिए बेताब थी, और मैं सवा सौ करोड़ में से कुछ गिनती के लोगो में से था जिसने आख़िरी बार भी सचिन को खेलते देखा और फिर उनसे बातचीत भी की, इस बार देश के एक बड़े संस्थान के लिए मैंने उनका इंटरव्यू लिया था, जो आज तक मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि में से एक है और रहेगी…

उस इंटरव्यू की ख़ास बात ये थी कि मैंने बाद में सचिन से जब कहा था कि मैंने 2008 में पहली बार आपसे मिला था प्रेस कॉन्फ़्रेंस में और फिर कई बार मिला लेकिन कभी इतना नर्वस मैं नहीं था जिनता आज हूं… उस पर सचिन ने हंसते हुए कहा था कि वह इसलिए कि क्योंकि अब मैं खिलाड़ी नहीं भूतपूर्व खिलाड़ी होने जा रहा हूं… ये बात ने सचिन के सामने मेरी आंखों में आंसू ला दिए थे… काश मेरा मज़हब मुझे किसी इंसान को ख़ुदा कहने की इजाज़त देता तो क़सम से मेरे लिए वह मुक़ाम सचिन के लिए होता…

क्रिकेट के इस भगवान को सालगिराह बहुत बहुत मुबारक…

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‘बॉल टैंपरिंग’ से कैसे मिलती है मदद और ‘रिवर्स स्विंग’ के लिए क्यों किया जाता है गेंद से छेड़छाड़ ?

दक्षिण अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले गए केपटाउन टेस्ट के दौरान कैमरे पर कैमरन बैनक्रॉफ़्ट सैंडपेपर के साथ तब पकड़े गए जब वह उससे गेंद को रगड़ रहे थे। इस घटना के बाद तो मानो क्रिकेट की दुनिया में हड़कंप मच गया, हालांकि ये कोई पहला मौक़ा नहीं था जब किसी क्रिकेटर ने गेंद के साथ छेड़छाड़ की हो और पकड़ाया हो। लेकिन जिस तरह से इस बार कंगारुओं ने इसे एक गेम प्लान के तहत इस्तेमाल किया, वह चौंकाने वाला था। कप्तान स्टीव स्मिथ ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ये माना कि बैनक्रॉफ़्ट से ग़लती हुई है और साथ ही ये कहते हुए सभी को और भी हैरान कर दिया कि ये ‘लीडरशप ग्रुप’ के तहत हुआ था। बाद में ये भी बात सामने आई कि इसकी शुरुआत उप-कप्तान डेविड वॉर्नर ने की थी और उन्होंने ही इसके लिए पहले स्टीव स्मिथ और फिर कैमरन बैनक्रॉफ़्ट को इस साज़िश का हिस्सा बनाया।

तेज़ गेंदबाज़ को कैसे मिलती है पारंपरिक स्विंग ?

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एक तेज़ गेंदबाज़ हमेशा चाहता है कि उसके हाथों में नई लाल, सफ़ेद या गुलाबी गेंद मिले ताकि उससे वह बल्लेबाज़ों को अपनी स्विंग से परेशान कर सके। नई गेंद की चमक से जो स्विंग मिलती है उसे पारंपरिक स्विंग कहा जाता है जो क़रीब 10-15 ओवर तक आराम से मिलती है। इसके लिए गेंदबाज़ सीम और चमक का इस्तेमाल बेहतरीन ढंग से करता है, मसलन एक इनस्विंग गेंद डालने के लिए गेंदबाज़ दो उंगलियों के बीच में सीम रखता है और सीम की दिशा लेग स्लिप की तरफ़ रहती है और ठीक इसके उलट आउटस्विंगर के लिए सीम की दिशा पहली स्लिप की तरफ़ होती है। आमूमन बल्लेबाज़ गेंदबाज़ के हाथों में सीम को देखकर अंदाज़ा लगाने की कोशिश करता है कि गेंद इनस्विंग होगी या आउटस्विंग। स्विंग इसपर भी निर्भर करती है कि आख़िरी वक़्त में गेंदबाज़ ने सीम कितनी सटीक रखी है, अगर पिच पर गेंद बिल्कुल सीम पर टकराती है तो गेंदबाज़ को अच्छी स्विंग मिलती है और बल्लेबाज़ चकमा खा सकता है।

रिवर्स स्विंग क्या और कैसे होती है ?

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पांरपरिक स्विंग तो हमने समझाने की कोशिश की, अब अहम ये है कि जब गेंद पुरानी हो जाती है तो फिर तेज़ गेंदबाज़ के लिए कितनी मुश्किल होती है। गेंद जल्दी पुरानी न हो, इसके लिए खिलाड़ी बार बार गेंद को चमकाने की कोशिश करते रहते हैं कोई पसीना लगाता है तो कोई मुंह के सलीवा से भी गेंद को चमकाता रहता है।

लेकिन आमूमन 25-30 ओवर के बाद गेंद खुरदुरी होना शुरू हो जाती है, और तब रिवर्स स्विंग अपना कमाल दिखाती है। रिवर्स स्विंग के बारे पूरी जानकारी देने से पहले आपको ये भी जानना ज़रूरी है कि इसका इजाद पाकिस्तान के पूर्व दिग्गज तेज़ गेंदबाज़ सरफ़राज़ नवाज़ ने किया था, और उन्होंने इसे अपने बाद इमरान ख़ान को बताया। इमरान ने वसीम अकरम और वक़ार युनिस को समझाया, जिसका इस्तेमाल इन दोनों ने शानदार अंदाज़ में किया था।

रिवर्स स्विंग की शुरुआत तब होती है जब गेंद पुरानी हो जाती है, तब तेज़ गेंदबाज़ एक हिस्से को पुराना ही रखता है और उसे खुरदुरा छोड़ देता है जबकि दूसरे हिस्से को चमकाता रहता है। जब गेंद का एक हिस्सा खुरदुरा और दूसरा हिस्सा चमकदार होता है तो असर ये होता है कि जब तेज़ गेंदबाज़ के हाथ से गेंद छूठती है तो पारंपरिक जो गेंद चमक के साथ स्विंग होना चाहिए उसपर हवा के दबाव से खुरदुरा वाला हिस्सा ब्रेक लगाने का काम करता है।

लिहाज़ा होता ये है कि गेंद जिधर खुरदुरी होती है स्विंग उसके उलटी ओर होती है। इसलिए इसे रिवर्स स्विंग कहा जाता है, उदाहरण के तौर पर मान लीजिए खुरदुरा वाला हिस्सा और सीम पहली स्लिप की ओर है तो तेज़ गेंदबाज़ की ये गेंद आउटस्विंग की जगह इनस्विंग हो जाएगी। इसी तरह अगर खुरदुरा वाला हिस्सा फ़ाइन लेग या लेग स्लिप की तरफ़ है तो गेंद इनस्विंग की जगह आउटस्विंग हो जाती है। यही वजह है कि अक्सर रिवर्स स्विंग के दौरान तेज़ गेंदबाज़ अपने हाथों से गेंद को छुपाए रहते हैं ताकि बल्लेबाज़ ये न देख पाए कि खुरदुरा हिस्सा किधर है और चमकीला हिस्सा किधर है।

बॉल टैंपरिंग से क्या होता है फ़ायदा ?

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उम्मीद है अब तक आप ये तो समझ गए होंगे कि पारंपरिक स्विंग और रिवर्स स्विंग में क्या अंतर है। अब अहम ये है कि गेंदबाज़ मैदान पर बॉल टैंपरिंग यानी गेंद के साथ छेड़छाड़ करता क्यों है। हालांकि एक अंदाज़ा तो आपने लगा ही लिया होगा, दरअसल रिवर्स स्विंग तभी होती है जब गेंद पुरानी हो जाए और खुरदुरी हो जाए। लिहाज़ा कई बार ऐसा देखा गया है कि जब नई गेंद से तेज़ गेंदबाज़ों को ख़ास मदद नहीं मिल रही होती है तो इसे पुरानी करने के लिए आउटफ़िल्ड से खिलाड़ी विकेटकीपर के पास बार बार टप्पा खिलाते हुए गेंद फेंकते हैं ताकि गेंद जल्द घिस जाए। पर कभी कभी मैदान पर कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो हाल ही में कैमरन बैनक्रॉफ़्ट ने किया, खिलाड़ी गेंद को ख़राब करने के लिए सैंड पेपर या कोल्ड ड्रिंक का ढक्कन या फिर अपने नाख़ून या दातों का इस्तेमाल करते हुए पकड़ाए गए हैं। ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा ये रहती है कि वह गेंद को ख़राब कर दें ताकि तेज़ गेंदबाज़ को इसका फ़ायदा मिल सके, कभी कभी सीम के धागे को भी निकाल देने से गेंदबाज़ों को फ़ायदा पहुंचता है। आईसीसी ने इस तरह की किसी भी चीज़ों को प्रतिबंधित क़रार दिया है और ऐसा करते हुए गेंद के साथ छेड़छाड़ करते हुए पाए जाने पर सज़ा का भी प्रावधान है जो अभी अभी स्टीव स्मिथ, डेविड वॉर्नर और कैमरन बैनक्रॉफ़्ट पर लगा भी।

आख़िर में ये भी बताते चलें कि सिर्फ़ गेंद को ख़राब करना ही प्रतिबंधित नहीं है बल्कि पसीने और सलीवा की जगह किसी भी तरह की क्रीम, जेली बीन्स या च्विंगम के ज़रिए उसे ज़्यादा चमकाना भी नियम के ख़िलाफ़ है। यही वजह है इस खेल को जेंटलमेन गेम कहा जाता है लेकिन गाहे बगाहे ऐसी हरकतें भी होती रहती हैं जो इस खेल के साथ खिलवाड़ है।

 

आईसीसी के ग़लत फ़ैसलों का शिकार हो रहा क्रिकेट, कई देशों में नहीं बढ़ रही लोकप्रियता

इंग्लैंड को क्रिकेट का जन्मदाता कहा जाता है, ऐसा माना जाता है कि जेंटलमेन के इस खेल की शुरुआत इंग्लैंड में ही हुई और वहीं से फिर पूरी दुनिया में क्रिकेट लोकप्रिय हुआ। कई देशों ने इस खेल को बढ़चढ़ कर अपनाया। इंग्लैंड के अलावा भारत, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और विंडीज़ जैसे देशों में इस खेल ने सभी को अपना दीवाना बना लिया। बात अगर मौजूदा समय की करें तो भारत का इस खेल के अंदर और बाहर दोनों ही जगह ज़बर्दस्त वर्चस्व देखा जा रहा है। हालांकि ये भी सच है कि पिछले कुछ दशकों से बांग्लादेश, आयरलैंड और अफ़ग़ानिस्तान को छोड़ दिया जाए तो किसी नए देश ने अपने खेल से कुछ ख़ास प्रभावित नहीं किया है।

आईसीसी ने यूनाइटेड स्टेट्स से लेकर नामिबिया, पापुआ न्यू गिनी, नेपाल, कनाडा और चीन तक में इसे लोकप्रिय बनाने की कोशिशें तो काफ़ी की हैं पर अब तक कुछ बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी है। अमेरिका के फ़्लोरिडा में क्रिकेट के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए आईसीसी ने भारत और विंडीज़ के बीच टी20 सीरीज़ भी कराई थी, इसके अलावा टी20 ट्राई सीरीज़ का भी फ़्लोरिडा में आयोजन कराया गया। इन सबके बावजूद आईसीसी के हाथ सफलता न लगने के पीछे उनका ख़ुद का ही फ़ैसला है। किसी भी खेल का सबसे बड़ा महाकुंभ होता है विश्वकप, फिर चाहे फ़ुटबॉल विश्वकप हो या हॉकी विश्वकप। विश्वकप में जो देश खेलते हैं, उस देश के नागरिक उस खेल का दिल खोल कर समर्थन करते हैं और यही चीज़ किसी भी खेल को लोकप्रिय बनाती है।

आईसीसी की कोशिश क्यों हो रही है नाकाम ?

ICC - Vanuatu Cricket Development Program

भारत में भी क्रिकेट में बड़ा बदलाव 1983 विश्वकप के बाद ही आया था, जब पहली बार टीम इंडिया ने वेस्टइंडीज़ को हराकर वर्ल्डकप जीता था और सभी को चौंका दिया था। वर्ल्डकप में इसी तरह जितने ज़्यादा देश खेलते हैं इस खेल की लोकप्रियता उतनी ही बढ़ती है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल ने इस बार कुछ ऐसा फ़ैसला कर डाला कि सभी हैरान रह गए। आईसीसी ने 2019 में होने वाले वर्ल्डकप में सिर्फ़ 10 देशों के ही बीच प्रतिस्पर्धा कराने का फ़ैसला किया ताकि सभी मुक़ाबले रोमांचक हों। आईसीसी का ये फ़ैसला बड़ी टीमों के लिए तो अच्छा कहा जा सकता है और क्रिकेट के स्तर के लिए भी कुछ हद तक जायज़ ठहराया जा सकता है। पर इसकी दूसरी तस्वीर ये है कि 12 टेस्ट स्टेटस हासिल करने वालों में से 2 देश और 16 वनडे स्टेटस वाली टीमों में से 6 टीम इस विश्वकप की दौड़ से बाहर हो गईं।

जिसमें 36 साल से हर वर्ल्डकप में खेलती आ रही ज़िम्बाब्वे जैसी टीम भी शामिल है, इतना ही नहीं आईसीसी के इस फ़ैसले से 2 बार की वर्ल्ड चैंपियन विंडीज़ को भी आईसीसी वर्ल्डकप क्वालिफ़ायर से गुज़रना पड़ा। अगर स्कॉटलैंड के ख़िलाफ़ हुए उनके मैच में बारिश नहीं आती और अंपायर का एक फ़ैसला उनके पक्ष में न गया होता तो वेस्टइंडीज़ भी 2019 वर्ल्डकप की दौड़ से ख़ुद को बाहर पाती, जो कहीं से भी क्रिकेट के लिए सही नहीं कहा जा सकता।

12 देशों को टेस्ट स्टेटस, 16 राष्ट्र को वनडे स्टेटस और 18 देशों को टी20 अंतर्राष्ट्रीय स्टेटस देने के मायने क्या हैं ?

Titanic Launch of ICC World Twenty20 Qualifier 2015

जब एक तरफ़ आईसीसी दुनिया के 16 देशों को वनडे खेलने का स्टेटस देता है तो फिर उन सभी 16 देशों को वर्ल्डकप में क्यों नहीं शामिल कर सकता ? ज़रा सोचिए टेस्ट स्टेटस हासिल रखने वाले ज़िम्बाब्वे और आयरलैंड के आलावा वनडे स्टेटस वाले नेपाल, स्कॉटलैंड, नीदरलैंड्स, यूएई जैसे देश भी अगर वर्ल्डकप में खेल रहे होते तो वहां के देशवासियों में अपनी टीम को वर्ल्डकप में खेलता देख कैसा महसूस होता और वह उनके लिए किस क़दर समर्थन करते।

ऐसा करने से न सिर्फ़ क्रिकेट का खेल लोकप्रिय हो सकता है बल्कि बड़ी टीमों के साथ खेलते हुए इन देशों का स्तर भी सुधर सकता है। जिसका बड़ा उदाहरण हैं अफ़ग़ानिस्तान और आयरलैंड जैसे देश, जिनमें इस बार आयरलैंड तो वर्ल्डकप में खेल भी नहीं पाएगा। अब आईसीसी के एक और ग़लत फ़ैसले पर नज़र डालिए, 4 सालों पर वनडे वर्ल्डकप के अलावा आईसीसी हर दो सालों में चैंपियंस ट्रॉफ़ी भी कराता है। चैंपियंस ट्रॉफ़ी का फ़ॉर्मेट अब आईसीसी ने ऐसा बनाया है जिसमें टॉप-8 टीमों के ही बीच प्रतिस्पर्धा होती है, जिसे तब जायज़ ठहराया जा सकता था जब वर्ल्डकप में 10 की जगह सभी वनडे स्टेटस वाले देश यानी 16 टीम खेलती। जब हर दो सालों में 8 बड़ी टीमों के बीच चैंपियंस ट्रॉफ़ी हो ही रही है तो फिर 4 सालों में 10 देशों के बीच वर्ल्डकप का क्या मायने रह जाता है।

एसोसिएट देशों में से अच्छा प्रदर्शन करने वाले देशों को आईसीसी इनाम के तौर पर वनडे और फिर वनडे में अच्छा प्रदर्शन करने वालों को टेस्ट का दर्जा तो दे देती है। लेकिन क्या सच में इसका कोई फ़ायदा है ? अभी नेपाल और इससे पहले पापुआ न्यू गिनी को भी आईसीसी ने वनडे स्टेटस दिया था पर उसका फ़ायदा कुछ हुआ ? क्या पापुआ न्यू गिनी ने वनडे स्टेटस मिलने के बाद किसी बड़ी टीम के ख़िलाफ़ मैच खेला ? क्या आने वाले समय में नेपाल से भी पापुआ न्यू गिनी की ही तरह वनडे स्टेटस छीन कर किसी और देश को दे दिया जाएगा ? आईसीसी को आने वाले वक़्त में गंभीरता से इन विषयों पर सोचने की ज़रूरत है, सिर्फ़ एसोसिएट सदस्यों के बीच लिस्ट ए क्रिकेट करा देने से न तो क्रिकेट का स्तर बढ़ पाएगा और न ही क्रिकेट का खेल लोकप्रिय हो पाएगा।

12 देशों को टेस्ट स्टेटस, 16 देशों को वनडे स्टेटस और 18 देशों को टी20 अंतर्राष्ट्रीय स्टेटस दे देने भर से ये खेल नहीं बढ़ पाएगा। क्योंकि किसी भी देश में किसी खेल को लोकप्रियता तभी मिलती है जब उस के देश खिलाड़ी दिल और जज़्बे के साथ उस खेल को खेलें और वहां के लोग और प्रशंसक भी अपने इन खिलाड़ियों और टीमों के प्रति उसी जज़्बे के साथ दिलचस्पी लें। और ये तभी संभव है जब वर्ल्डकप और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा से ज़्यादा देशों के बीच क्रिकेट की प्रतिस्पर्धा हो।

3 देश जो आईसीसी वर्ल्डकप 2019 में खेलने के हक़दार थे

क्रिकेट की सबसे बड़ी जंग यानी आईसीसी क्रिकेट वर्ल्डकप अगले साल इंग्लैंड में खेला जाना है। 1975 से शुरू हुए वनडे क्रिकेट वर्ल्डकप का ये 12वां संस्करण कुल 10 टीमों के बीच खेला जाएगा। जिनमें शामिल होने वाली सभी टीमों के नामों पर अब मुहर लग गई है, आईसीसी रैंकिंग में टॉप-8 टीमों के अलावा 2 और देशों को आईसीसी वर्ल्डकप क्वालिफ़ायर से क्रिकेट के इस सबसे बड़े महाकुंभ में आने का अवसर हासिल हुआ है।

2 बार की वर्ल्ड चैंपियन विंडीज़ को भी इस बार आईसीसी वर्ल्डकप क्वालिफ़ायर से गुज़रना पड़ा, जहां वह फ़ाइनल में पहुंचकर वर्ल्डकप 2019 का टिकट हासिल कर चुके हैं। विंडीज़ के अलावा अफ़ग़ानिस्तान भी नाटकिय अंदाज़ में इस टूर्नामेंट के फ़ाइनल में पहुंच गई और लगातार दूसरी बार वर्ल्डकप का टिकट हासिल करने में क़ामयाब रही। विंडीज़ और अफ़ग़ानिस्तान का वर्ल्डकप के लिए क्वालिफ़ाई न करने सही में सभी के लिए हैरानी होती लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं जो इस बार 2019 वर्ल्डकप में नहीं दिखेंगे।

एक नज़र डाल लेते हैं उन्हीं में से 3 ऐसे देशों पर जो सही मायनों में 2019 वर्ल्डकप में जाने के हक़दार थे।

#3 स्कॉटलैंड

1999 से 2015 तक 3 विश्वकप में हुए शामिल

Scotland v Nepal - ICC Cricket World Cup Qualifier

स्कॉटलैंड के लिए आईसीसी क्वालिफ़ायर काफ़ी शानदार रहा था और सभी को लग रहा था कि ये टीम एक बार फिर वर्ल्डकप में जगह बनाएगी। क्वालिफ़ायर में स्कॉटलैंड ने लीग स्टेज में एक भी मैच नहीं हारा था, इस स्कॉटिश टीम ने 4 लीग मुक़ाबलों में से 3 जीते और 1 मैच टाई रहा। जिसकी बदौलत स्कॉटलैंड सुपरसिक्स में पहुंची, लेकिन दूसरे दौर में स्कॉटिश टीम के हाथ केवल एक जीत लगी जो उन्होंने UAE पर दर्ज की। उसके अलावा आयरलैंड और विंडीज़ के हाथों उनका हारना उनसे वर्ल्डकप 2019 की टिकट छीन ले गया।

वर्ल्डकप में स्कॉटलैंड पहली बार 1999 में शामिल हुई थी, हालांकि उसके बाद 2003 वर्ल्डकप में भी वह जगह नहीं बना पाईं थीं। फिर 2007 में स्कॉटलैंड को दूसरी बार विश्वकप खेलने का मौक़ा मिला, लेकिन जीत का खाता उनका इस बार भी नहीं खुल पाया। 2011 में एक बार फिर स्कॉटलैंड वर्ल्डकप के लिए क्वालिफ़ाई नहीं कर पाई थी, उन्हें 2015 में तीसरी बार मौक़ा मिला और उन्होंने इस बार भी कोई जीत दर्ज नहीं की थी।

वर्ल्डकप में स्कॉटलैंड: 14 मैच, 14 हार

 

#2 आयरलैंड

2007 से 2015 तक हर विश्वकप में हुए शामिल

West Indies v Ireland - ICC Cricket World Cup Qualifier

आयरलंड ने आईसीसी वर्ल्डकप क्वालिफ़ायर में लीग स्टेज में 4 में से 3 जीत के साथ सुपरसिक्स में जगह बनाई थी। जहां उन्हें UAE पर जीत हासिल हुई लेकिन विंडीज़ और अफ़ग़ानिस्तान से मिली हार ने उनके वर्ल्डकप में खेलने के अरमानों पर पानी फेर दिया।

आयरलैंड को पहली बार 2007 विश्वकप में खेलने का मौक़ा मिला था, और उन्होंने अपना आग़ाज़ ज़ोरदार अंदाज़ में किया था। विश्वकप इतिहास के पहले मैच में उन्होंने ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ टाई खेलकर सभी को हैरान कर दिया था। अगले ही मैच में इस आयरिश टीम ने मज़बूत पाकिस्तान को भी 3 विकेट से हरा दिया था, विश्वकप इतिहास में आयरलैंड की ये पहली जीत थी। इस टूर्नामेंट में आयरलैंड ने बांग्लादेश को भी शिकस्त दी थी, इसके बाद 2011 विश्वकप में भी आयरलैंड ने इंग्लैंड को हराते हुए सभी को अपना दीवाना बना लिया था। 2015 वर्ल्डकप आयरलैंड के लिए सबसे शानदार रहा था, जब उन्होंने विंडीज़, UAE और ज़िम्बाब्वे को हराते हुए सबसे ज़्यादा 3 जीत दर्ज की थी।

हाल ही आयरलैंड को अफ़ग़ानिस्तान के साथ टेस्ट का भी स्टेटस हासिल हुआ है, और उसके बाद 2019 वर्ल्डकप के लिए क्वालिफ़ाई न कर पाना ज़ाहिर तौर पर सभी के लिए हैरान करने वाला है।

वर्ल्डकप में आयरलैंड: 20 मैच, 7 जीत, 13 हार, 1 टाई

 

#1 ज़िम्बाब्वे

1983 से 2015 तक हर विश्वकप में हुए शामिल

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ज़िम्बाब्वे का 2019 आईसीसी वर्ल्डकप में न पहुंच पाना क्रिकेट जगत के लिए किसी झटके से कम नहीं। एक ऐसी टीम जो 36 सालों से लगातार वर्ल्डकप का हिस्सा थी, वह इस बार 12वें विश्वकप में नदारद रहेगी। ज़िम्बाब्वे ने आईसीसी वर्ल्डकप क्वालिफ़ायर में शुरुआत तो शानदार तरीक़े से की थी जब 4 मैचों में 3 जीत और स्कॉटलैंड से एक टाई खेलकर अनबिटेन सुपरसिक्स में पहुंची थी। जहां उन्हें आयरलैंड पर तो जीत मिली, लेकिन विंडीज़ से हार नसीब हुई थी। हालांकि अभी भी ज़िम्बाब्वे के पास UAE को शिकस्त देकर वर्ल्डकप की टिकट हासिल करने का आसान सा मौक़ा था। पर 3 रनों से UAE के हाथों हार ने ज़िम्बाब्वे की उम्मीदों को ख़त्म कर दिया और अफ़ग़ानिस्तान ने इस मौक़े को भुना लिया।

बात अगर विश्वकप की करें तो 1983 में पहली बार ज़िम्बाब्वे ने विश्वकप में शिरकत की थी और अपने पहले ही मैच में इतिहास रच डाला था। टीम इंडिया के पूर्व कप्तान डंकन फ़्लेचर की कप्तानी में इस टीम ने ऑस्ट्रेलिया जैसी मज़बूत टीम को हरा दिया था, और आगे आने वाले मैच में टीम इंडिया को भी हार की दहलीज़ पर खड़ा कर दिया था। जब कपिल देव ने 175* रनों की पारी खेलते हुए भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। हालांकि इसके बाद 1987 में ज़िम्बाब्वे को एक भी जीत नहीं मिली, लेकिन 1992 वर्ल्डकप में इस टीम ने इंग्लैंड को हराते हुए सभी को दंग कर दिया था वह भी तब जब ज़िम्बाब्वे 134 रनों पर ऑलआउट हुई थी और इंग्लिश टीम को 125 रनों पर ही ढेर कर दिया था। 1996 में ज़िम्बाब्वे ने पटना में खेले गए मुक़ाबले में केन्या को मात दी थी जो उनकी 1996 विश्वकप में एकमात्र जीत थी। ज़िम्बाब्वे के लिए सबसे यादगार रहा था 1999 वर्ल्डकप , जहां उन्होंने केन्या, भारत और दक्षिण अफ़्रीका को हराते हुए सुपरसिक्स में जगह बनाई थी। 2003 वर्ल्डकप में भी ज़िम्बाब्वे को 3 जीत मिली थी जिसमें से एक इंग्लैंड के ऊपर वॉकओवर के तौर पर आई थी। 1987 के बाद 2007 ही ऐसा विश्वकप था जहां ज़िम्बाब्वे को एक मैच में भी जीत नहीं मिली थी, हालांकि 2007 में आयरलैंड के ख़िलाफ़ उन्होंने एक टाई ज़रूर खेला था। 2011 में 2 जबकि 2015 में इस टीम ने एक जीत हासिल की थी, लेकिन 36 साल बाद अब 2019 वर्ल्डकप में ज़िम्बाब्वे क्रिकेट टीम शामिल नहीं होगी।

वर्ल्डकप में ज़िम्बाब्वे: 57 मैच, 11 जीत, 42 हार, 1 टाई, 3 में कोई नतीजा नहीं

5 बल्लेबाज़ जिन्होंने आख़िरी गेंद पर छक्के से दिलाई करिश्माई जीत

भारत ने श्रीलंका में खेली गई ट्राई सीरीज़ के फ़ाइनल मुक़ाबले में बांग्लादेश पर करिश्माई जीत दर्ज करते हुए चैंपियनशिप का ताज हासिल कर लिया। एक वक़्त जीत टीम इंडिया से दूर दिखाई दे रही थी जब 12 गेंदों में 34 रनों की दरकार थी, हालांकि दिनेश कार्तिक ने आतिशी बल्लेबाज़ी करते हुए इस फ़ासले को आख़िरी ओवर में 12 और फिर अंतिम गेंद पर 5 रन तक ले आए थे। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में ऐसा बेहद कम ही देखा गया कि कोई टीम अंतिम गेंद पर छक्का मारते हुए जीते और वह भी तब जब जीत के लिए 1 गेंद पर 4, 5 या 6 रन चाहिए।

टी20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में रविवार से पहले कभी भी आख़िरी गेंद पर 3 रन से ज़्यादा के लक्ष्य पर छक्का मारते हुए जीत दर्ज नहीं देखी गई थी। लेकिन क्रिकेट को इसलिए तो अनिश्चित्ताओं का खेल कहा जाता है, जब भारत को आख़िरी गेंद पर 5 रन चाहिए थे तो दिनेश कार्तिक ने छक्का लगाते हुए जीत भारत की झोली में डाल दी और वह ऐसा करने वाले टी20 अंतर्राष्ट्रीय में पहले बल्लेबाज़ बन गए।

लेकिन अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में ये पहला मौक़ा नहीं था, भारत की तरफ़ से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में ऐसा करने वाले कार्तिक भले ही पहले बल्लेबाज़ हैं। पर वनडे में उनसे पहले 2 और खिलाड़ियों ने इस कारनामे को अंजाम दिया है।

एक नज़र डाल लेते हैं 5 खिलाड़ियों पर जिन्होंने आख़िरी गेंद पर छक्का लगाते हुए अपनी टीम को करिश्माई जीत दिलाई हो।

#5 जावेद मियांदाद vs चेतन शर्मा, 1986

MIANDAD

इस फ़ेहरिस्त में जावेद मियांदाद का नाम पहला है, और वह दुनिया के ऐसे पहले बल्लेबाज़ भी थे जिन्होंने आख़िरी गेंद पर छक्का लगाते हुए जीत दिलाई थी। बदक़िस्मती से ये जीत भारत के ख़िलाफ़ आई थी, 1986 में शारजाह में खेले गए इस मैच में टीम इंडिया क़रीब क़रीब मैच जीत चुकी थी। पाकिस्तान को आख़िरी गेंद पर 4 रनों की दरकार थी और भारत की ओर से चेतन शर्मा गेंदबाज़ी कर रहे थे, लेकिन अनहोनी और मियांदाद को कुछ और मंज़ूर था। मियांदाद ने चेतन शर्मा की लो फ़ुलटॉस को डीप मिडविकेट के ऊपर से सीमा रेखा के बाहर पहुंचा दिया और पाकिस्तान को एक करिश्माई जीत दिला दी। इस जीत की टीस चेतन शर्मा और भारतीय फ़ैंस को आजतक है।

 

#4 लांस क्लूज़नर vs डियोन नैश, 1999

LANCE KLUSNER

1986 में चेतन शर्मा के बल्ले से निकला वह छक्का दशकों तक उदाहरण की ही तरह देखा जाता था। 1999 में एक बार फिर कुछ ऐसी ही घटना दोबारा देखने को मिली, इस बार सामने थे विस्फोटक बल्लेबाज़ लांस क्लूज़नर। दक्षिण अफ़्रीका और न्यूज़ीलैंड के बीच ये मुक़ाबला नेपियर में खेला जा रहा था, जहां अंतिम गेंद पर प्रोटियाज़ को जीत के लिए 4 रनों की दरकार थी और स्ट्राइक पर थे लांस क्लूज़नर। गेंदबाज़ी आक्रमण पर तेज़ गेंदबाज़ डियोन नैश थे, लेकिन नैश अपनी टीम को जीत नहीं दिला पाए, क्योंकि क्लूज़नर का झन्नाटेदार शॉट दर्शक दीर्घा में जा पहुंचा और एक अद्भुत जीत दक्षिण अफ़्रीका की झोली में गई।

 

#3 ब्रेंडन टेलर vs मशरफ़े मुर्तज़ा, 2006

BRENDON TAYLOR

क्रिकेट इतिहास ने अबतक दो बार आख़िरी गेंद पर जब 4 रनों की दरकार थी तो छक्के के साथ जीत देखी थी। लेकिन 2006 में कुछ ऐसा हुआ जो आज तक कभी न देखा गया और न ही सुना गया था। ज़िम्बाब्वे और बांग्लादेश के बीच हरारे में वनडे मैच खेला जा रहा था, जहां मेज़बान टीम 237 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए आख़िरी गेंद पर पिछड़ गई थी। अब 1 गेंद पर जीत के लिए 5 रन चाहिए थे और गेंदबाज़ थे मशरफ़े मुर्तज़ा, जबकि स्ट्राइक पर थे ब्रेंडन टेलर। मैच को अगर जीतना था तो छक्के की दरकार थी और चौका मैच टाई करा सकता था। लेकिन टेलर को जीत से नीचे गंवारा नहीं था, और उन्होंने मुर्तज़ा की गेंद पर ज़ोरदार शॉट लगाया और गेंद स्टैंड्स में जा गिरी, नाटकीय अंदाज़ में ज़िम्बाब्वे ने जीत दर्ज की।

 

#2 दिनेश कार्तिक vs सौम्य सरकार, 2018

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भारत और बांग्लादेश के बीच कोलंबो के प्रेमदासा में हुए इस टी20 ट्राई सीरीज़ के फ़ाइनल में भारत 167 रनों का पीछा कर रहा था। आख़िरी ओवर में भारत को जीत के लिए 12 रन और फिर आख़िरी गेंद पर 5 रनों की दरकार थी। स्ट्राइक पर थे टीम इंडिया के विकेटकीपर बल्लेबाज़ दिनेश कार्तिक जिनके पास चौका लगाते हुए मैच को सुपर ओवर में पहुंचाने का भी मौक़ा था। लेकिन कार्तिक ने सुपर ओवर का इंतज़ार नहीं कराया क्योंकि ऑफ़ स्टंप पर सौम्य सरकार की धीमी गुड लेंथ गेंद को उन्होंने स्वीपर कवर के ऊपर से दर्शक दीर्घा में पहुंचाया और भारतीय फ़ैंस को एक यादगार जीत दिला दी। कार्तिक ने कुछ हदतक 1986 में मियांदाद के उस छक्के की टीस भी कम कर दी, जो चेतन शर्मा की गेंद पर पड़ा था।

 

#1 शिव नारायण चंद्रपॉल vs चमिंडा वास, 2008

S CHANDARPAUL

कहते हैं क्रिकेट में छक्का मारना किसी भी बल्लेबाज़ के लिए सबसे मुश्किल काम होता है, और जब किसी टीम को एक गेंद पर जीत के लिए 6 रन चाहिए होता है तो फिर ये नमुमकिन से कम नहीं। क्योंकि गेंदबाज़ के दिमाग़ में छक्के से कैसे बचा जाए इसके लिए कई विकल्प होते हैं पर बल्लेबाज़ के पास सिवाए छक्के के कोई चारा नहीं। लेकिन क्रिकेट इतिहास में इस नमुमकिन को भी मुमकिन होते देखा गया है। साल 2008 में विंडीज़ अपने घर में श्रीलंका के ख़िलाफॉ पोर्ट ऑफ़ स्पेन में मुक़ाबला खेल रही थी। जहां जीत उनसे दूर जा चुकी थी और समीकरण था 1 गेंद पर जीत के लिए 6 रन, क्रीज़ पर मौजूद थे शिव नारायण चंद्रपॉल जिन्हें सीमित ओवर क्रिकेट में वह पहचान नहीं मिल पाई जो दर्जा उन्हें टेस्ट में हासिल है। उनके सामने थे श्रीलंकाई क्रिकेट के दिग्गज और वनडे में एक पारी में 8 विकेट लेने वाले गेंदबाज़ चमिंडा वास, उम्मीद थी कि वास छक्का नहीं देंगे और श्रीलंका मुक़ाबला जीत जाएगा। पर हुआ इसका ठीक उल्टा जब चंद्रपॉल ने वास की गेंद को दर्शकों के पास पहुंचा दिया और विंडीज़ को दिला दी एक असंभव जीत।

क्या मनीष पांडे ने विराट कोहली की ‘मिशन 2019’ के लिए नंबर-5 समस्या का समाधान कर दिया ?

श्रीलंका में जारी 3 देशों की टी20 ट्राई सीरीज़ में टीम इंडिया ने कई सीनियर खिलाड़ियों को आराम देते हुए बेंच स्ट्रेंथ परखने की कोशिश कर रही है। जिसका शानदार फल भारतीय क्रिकेट टीम को मिलता हुआ नज़र आ रहा है, इनमें से कुछ नतीजे 2019 वर्ल्डकप की टीम चुनने में भी काम आ सकते हैं। यही वजह है कि टीम मैनेजमेंट ने इस सीरीज़ में सुरेश रैना, मनीष पांडे, दिनेश कार्तिक, वॉशिंगटन सुंदर और शार्दुल ठाकुर जैसे खिलाड़ियों को पूरा मौक़ा दे रही है। इन मौकों का फ़ायदा उठाते हुए खिलाड़ी भी टीम इंडिया में अपनी दावेदारी मज़बूत कर रहे हैं।

इन खिलाड़ियों में अगर किसी ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है तो वह हैं दाएं हाथ के मध्यक्रम बल्लेबाज़ मनीष पांडे। जिनकी प्रतिभा पर किसी को कभी शक़ नहीं हुआ है, फिर चाहे डेब्यू वनडे में 71 रनों की शानदार पारी हो या सिडनी में मेज़बान ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ 104 नाबाद रनों की दिलकश पारी। हालांकि इसके बाद भी मनीष ख़ुद को बदक़िस्मत ही कहेंगे कि आज तक वह टीम इंडिया का नियमित हिस्सा नहीं बन पाए हैं, और दल में रहते हुए भी उन्हें प्लेइंग-XI में अपनी बारी के लिए काफ़ी इंतज़ार करना पड़ता है। दक्षिण अफ़्रीकी दौरे पर भी मनीष पांडे सीमित ओवर टीम का हिस्सा थे, लेकिन उन्हें वनडे में अंतिम एकादश में शामिल होने का मौक़ा नहीं मिल पाया। जिसकी कसक उन्हें ज़रूर थी, और यही वजह थी कि जैसे ही टी20 में उन्हें जोहांसबर्ग में शामिल किया गया तो उनपर दबाव साफ़ झलक रहा था। जहां उन्हें 29 रनों के लिए 27 गेंदों का सामना करना पड़ा, इस पारी के बाद पांडे की काफ़ी आलोचना हुई थी लेकिन उन्होंने अगली ही पारी में सभी का मुंह बंद कर दिया, जब केपटाउन टी20 में मनीष पांडे ने 48 गेंदों पर आतिशी 79 नाबाद रन बनाए और 28 गेंदों पर 52 नाबाद रन बनाने वाले महेंद्र सिंह धोनी का शानदार साथ दिया।

इस पारी ने मनीष पांडे के आत्मविश्वास में काफ़ी इज़ाफ़ा किया, और इसकी झलक ट्राई सीरीज़ में भी देखने को मिल रही है। जहां टीम इंडिया को उन्होंने पिछले दो मैचों में नाज़ुक मौक़ों पर जीत दिलाई है और दोनों ही बार नाबाद लौटे हैं। मनीष पांडे की पिछली 6 अंतर्राष्ट्रीय पारी पर नज़र डालें तो उन्होंने 42*, 27*, 37, 13, 79* और 29* रन बनाए हैं। यानी 6 पारियों में 4 बार नॉट आउट रहते हुए 113.5 की बेमिसाल औसत से 227 रन। इतना ही नहीं जिन दो पारियों में मनीष आउट हुए थे वह उन्होंने नंबर-4 पर खेली थी, नंबर-5 पर तो वह पिछली 4 पारियों में लगातार नॉट आउट रहे हैं और टीम इंडिया के लिए एक शानदार मैच फ़िनिशर साबित हुए हैं। मनीष पांडे के इस लाजवाब लय ने कोच रवि शास्त्री और कप्तान विराट कोहली के लिए भी एक उम्मीद की किरण जगा दी है।

दरअसल, सीमित ओवर क्रिकेट में ख़ास तौर से वनडे में भारत की नंबर-4 और नंबर-5 की समस्या का अब तक कोई ठोस हल नहीं निकल पाया है। नंबर-4 पर अंजिक्य रहाणे और दिनेश कार्तिक के तौर पर तो टीम इंडिया लगातार प्रयोग कर रही है, और अब इस क्रम पर वापसी कर रहे सुरेश रैना भी अपनी दावेदारी धीरे धीरे मज़बूत करते जा रहे हैं। लेकिन नंबर-5 पर केदार जाधव का ख़राब फ़ॉर्म निरंतरता की कमी भारत को हमेशा परेशान करती है। ऐसे में मनीष पांडे इस जगह को भरने के बड़े दावेदार मालूम पड़ते हैं, पांडे के लिए ये कोई नई भूमिका भी नहीं है। मनीष पांडे ने अब तक 22 वनडे मैचों की 17 पारियों में 39.27 की प्रभावशाली औसत के साथ 432 रन बनाए हैं, जिनमें 2 अर्धशतक और एक शतक शामिल है।

लिहाज़ा विराट कोहली के ‘मिशन 2019’ में दाएं हाथ का ये बल्लेबाज़ नंबर-5 पर खेलते हुए टीम इंडिया को तीसरा विश्वकप दिलाने में अहम योगदान दे सकता है। ज़िम्बाब्वे, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ़्रीका में अपनी लाजवाब बल्लेबाज़ी से उन्होंने ये भी साबित किया है कि वह विपरित परिस्थितियों में भी टीम को संकट से निकालने की क़ाबिलियत रखते हैं।

 

 

बारिश के साए के बीच दूसरे दौर में श्रीलंका के ख़िलाफ़ बदले के इरादे से उतरेगा भारत

श्रीलंका में खेली जा रही टी20 ट्राई सीरीज़ का पहला दौर बेहद रोमांचक अंदाज़ में ख़त्म हुआ। जहां बांग्लादेश ने 215 रनों का पीछा करते हुए मेज़बान टीम पर रिकॉर्ड जीत दर्ज की। अब सभी टीमें एक जीत और एक हार के साथ बराबरी पर खड़ी हैं, यानी आज से शुरू हो रहा दूसरा दौर बेहद रोमांचक हो गया है। कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम में रोहित शर्मा की टीम इंडिया का सामना मेज़बान टीम के साथ होगा, जहां भारत की नज़र श्रीलंका के हाथों मिली पहले मैच की हार का बदल लेने पर होगा।

मैच से पहले ही मेज़बान टीम को लगा बड़ा झटका

बांग्लादेश के ख़िलाफ़ पिछले मुक़ाबले में धीमे ओवर रेट की वजह से श्रीलंकाई कप्तान दिनेश चांडीमल पर दो मैचों का बैन लग गया है। यानी भारत के ख़िलाफ़ आज और अगले मुक़ाबले में बांग्लादेश के ख़िलाफ़ श्रीलंका की कमान थिसारा परेरा के कंधों पर होगी। मेज़बान टीम के लिए ये किसी झटके से कम नहीं, हालांकि परेरा को कप्तानी का अनुभव तो है लेकिन उनके आंकड़े बेहद निराशाजनक हैं, परेरा ने श्रीलंका के लिए अब तक 6 टी20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों में कप्तानी की है और सभी में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है। इसमें तीन भारत के ही ख़िलाफ़ आई है और इत्तेफ़ाक़ से वह भी तब जब परेरा के सामने विपक्षी कप्तान रोहित शर्मा थे।

 

रोहित शर्मा पर रहेंगी सभी की नज़रें

टीम इंडिया के कप्तान रोहित शर्मा के लिए हालिया फ़ॉर्म बेहद निराशाजनक रहा है, इस सीरीज़ में भी दो पारियों में रोहित का बल्ला शांत ही रहा है। इतना ही नहीं पिछले 10 टी20 अंतर्राष्ट्रीय पारियों में रोहित सिर्फ़ एक बार 30 का आंकड़ा पार कर पाए हैं, और इस दौरान दो बार रोहित ने स्कोरर को परेशान करने की भी ज़हमत नहीं उठाई है। वनडे क्रिकेट में तीन दोहरे शतक और टी20 अंतर्राष्ट्रीय में दो शतक लगाने वाले रोहित शर्मा के ये आंकड़े हैरान करने वाले हैं। लिहाज़ा इन आंकड़ों को टीम इंडिया की ये रन मशीन पीछे छोड़ने के लिए बेताब होगी। रोहित भी चाहेंगे कि इस मैच में एक बड़ी पारी खेलते हुए टीम इंडिया को जीत भी दिलाई जाए और साथ ही फ़ाइनल में जगह बनाने की ओर मज़बूत क़दम बढ़ाया जाए। और इसके लिए श्रीलंकाई टीम से बेहतर कुछ नहीं हो सकता क्योंकि मेज़बान टीम के गेंदबाज़ रोहित को कितने पसंद हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वनडे में तीन में दो दोहरे शतक और टी20 अंतर्राष्ट्रीय में दो में से एक शतक उन्होंने इसी गेंदबाज़ी आक्रमण के ख़िलाफ़ लगाए हैं। हालांकि कोलंबो में आख़िरी बार रोहित ने टी20 में 30 या उससे ज़्यादा रनों की पारी 2012 वर्ल्ड टी20 में लगाई थी, लेकिन आंकडों को दुरुस्त करना भी रोहित बख़ूबी जानते हैं।

पिच का पेंच और मौसम का मिज़ाज

कोलंबो में इस ट्राई सीरीज़ में खेले गए सभी मुक़ाबलों में रनों का पीछा करती हुई टीम को जीत हासिल हुई है। और उसमें भी दो बार रिकॉर्ड चेज़ को अंजाम दिया गया है, श्रीलंका ने जहां पहले मैच में 175 रनों का सफल पीछा करते हुए प्रेमदासा में सबसे बड़े चेज़ को अंजाम दिया था, तो पिछले मैच में 215 रनों का पीछा करते हुए बांग्लादेश ने उस रिकॉर्ड को अपने नाम कर लिया। लिहाज़ा एक बार फिर बल्लेबाज़ों के लिए जन्नत इस पिच पर टॉस जीतने वाली टीम पहले गेंदबाज़ी करना ही बेहतर समझेगी। पर मैच का मज़ा बारिश किरकिरा कर सकती है, अगर मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो शाम में कोलंबो में तेज़ बारिश हो सकती है और इसकी संभावना 50 फ़ीसदी तक है। अगर ऐसा हुआ तो दर्शकों के लिए एक शानदार मैच का आनंद फीका पड़ सकता है।

क्या टीम इंडिया बेंच पर बैठे खिलाड़ियों को देगी आज मौक़ा ?

अगर सीरीज़ के समीकरण पर नज़र डालें तो सभी टीमें 2-2 अंकों के साथ बराबरी पर हैं, लिहाज़ा कोई भी टीम ये नहीं चाहेगी कि किसी तरह का कोई प्रयोग उन्हें भारी पड़े। उस लिहाज़ से ऐसा ही लगता है कि रोहित शर्मा आज प्लेइंग-XI में कोई परिवर्तन न करते हुए वही टीम खिलाएं जो पिछले दो मैचों में दिखी है। लेकिन प्रैक्टिस के दौरान कोलंबो में जो नज़ारा देखने को मिला है, उससे ये गुंजाइश भी है कि शायद इस मैच में एक या दो बदलाव हो सकते हैं। दरअसल, नेट्स पर टीम इंडिया के कोच रवि शास्त्री ऑलराउंडर दीपक हुड्डा और तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद सिराज को काफ़ी प्रैक्टिस करवा रहे थे और दोनों से ही प्रभावित दिखे। इसलिए ऐसा माना जा रहा है कि श्रीलंका के ख़िलाफ़ इन दोनों को या फिर दोनों में किसी एक को मौक़ा दिया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो फिर शार्दुल ठाकुर की जगह मोहम्मद सिराज और वाशिंगटन सुंदर की जगह दीपक हुड्डा को आख़िरी ग्याराह में शामिल किया जा सकता है, लेकिन सुंदर ने अब तक दोनों ही मैचों में प्रभावित किया है।

दूसरी तरफ़ श्रीलंकाई टीम के पास दिनेश चांडीमल के बैन की वजह से धनंजय डी सिल्वा को प्लेइंग-XI में शामिल करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। विकेटकीपिंग की ज़िम्मेदारी कुसल परेरा पर रहेगी, जबकि चमीरा दुशमंता की जगह सुरंगला लकमल को इस मैच में मौक़ा दिया जा सकता है।

भारत संभावित-XI: रोहित शर्मा, शिखर धवन, सुरेश रैना, मनीष पांडे, ऋषभ पंत, दिनेश कार्तिक, विजय शंकर, वॉशिंगटन सुंदर/दीपक हुड्डा, युज़वेंद्र चहल, जयदेव उनादकट और शार्दुल ठाकुर/मोहम्मद सिराज

श्रीलंका संभावित-XI: कुसल मेंडिस, कुसल परेरा, धनंजय डी सिल्वा, उपल थंरगा, दनुष्का गुणाथिलाका, दसुन शनाका, थिसारा परेरा, जीवन मेंडिस, अकीला धनंजय, दुशमंता चमीरा/सुरंगा लकमल और नुवान प्रदीप