युवराज को बाहर करते हुए शास्त्री और कोहली ने धोनी को भी दे दिया है इशारा !

श्रीलंकाई दौरे पर गई विराट कोहली की कप्तानी में टीम इंडिया टेस्ट में कमाल का प्रदर्शन करते हुए मेज़बानों का क्लीन स्वीप करने में क़ामयाब रही। 3 टेस्ट मैचों में से दो में पारी की जीत दर्ज करने वाली भारतीय क्रिकेट टीम का ये घर से बाहर ये चौथा क्लीन स्वीप था और श्रीलंका के ख़िलाफ़ उन्हीं के घर में पहला।

टेस्ट के बाद भारत को 5 वनडे और एकमात्र टी20 खेलना है, 20 अगस्त से शुरू होने वाली इस सीमित ओवर की सीरीज़ के लिए टीम इंडिया का ऐलान कर दिया गया। जिसकी कमान विराट कोहली के ही कंधों पर है लेकिन आर अश्विन, रविंद्र जडेजा और मोहम्मद शमी को सीमित ओवर की सीरीज़ से आराम दिया गया है। जबकि वनडे से युवराज सिंह का पत्ता काट दिया गया है और सुरेश रैना की भी वापसी की उम्मीदें ख़त्म हो गईं, लेकिन महेंद्र सिंह धोनी विकेटकीपर के तौर पर टीम में बरक़रार हैं।

ऐसा माना जा रहा है कि चयनकर्ताओं ने कोच रवि शास्त्री और कप्तान विराट कोहली से सलाह-मशवराह करते हुए मिशन वर्ल्डकप 2019 के मद्देनज़र टीम का चयन किया है। यही वजह है कि इंग्लैंड के ख़िलाफ़ वनडे क्रिकेट में वापसी करने वाले बाएं हाथ के विस्फोटक बल्लेबाज़ युवराज सिंह को टीम में शामिल नहीं किया गया है, चयनकर्ताओं के मुताबिक़ युवराज की फ़ॉर्म से ज़्यादा चिंता का विषय उनकी फ़िट्नेस है।

चैंपियंस ट्रॉफ़ी से लेकर वेस्टइंडीज़ दौरे में भी युवराज की फ़िट्नेस और मैदान पर लचर फ़िल्डींग उन्हें बाहर बैठने का सबसे बड़ा कारण बनी है। दिसंबर में 36 वर्ष के होने वाले युवराज की जगह टीम में दाएं हाथ के मध्यक्रम बल्लेबाज़ मनीष पांडे को शामिल किया गया है जो योग्य भी हैं। तो वहीं आर अश्विन, रविंद्र जडेजा और मोहम्मद शमी को आराम देकर बेंच स्ट्रेंथ को मौक़ा देना और रोटेशन पॉलिसी के तहत हर एक खिलाड़ी को मैच फ़िट रखने पर भी ज़ोर दिया गया है।

जडेजा की जगह जहां टीम में अक्षर पटेल को एक बार फिर मौक़ा मिला है तो अश्विन की जगह युजवेंद्र चहल को लाया गया है जबकि शमी के स्थान पर शार्दुल ठाकुर के रूप में इकलौता नया चेहरा है। शार्दुल सीधे दक्षिण अफ़्रीका दौरे से टीम के साथ जुड़ेंगे, ठाकुर भारत-ए के साथ प्रोटियाज़ दौरे पर थे जहां उन्होंने त्रिकोणीय सीरीज़ में भारत-ए को चैंपियन बनाने में अहम योगदान दिया था और फ़ाइनल में 3 विकेट भी झटके थे।

लग तो ऐसा रहा है कि चयनकर्ताओं ने एक संतुलित और भविष्य को ध्यान में रखते हुए टीम चुनी है। लेकिन दिनेश कार्तिक के शानदार फ़ॉर्म में होते हुए एक बार फिर उन्हें टीम से बाहर करना सभी को हैरान भी कर रहा है। कार्तिक ने चैंपियंस ट्रॉफ़ी में जितने भी मौक़े मिले थे, उसे बख़ूबी भुनाया था और फिर वेस्टइंडीज़ में भी कार्तिक का प्रदर्शन अच्छा ही रहा था। उसके बावजूद कार्तिक पर गाज क्यों गिरी इसका जवाब चयनकर्ताओं के पास नहीं है।

# इसलिए कार्तिक पर गिरी गाज ?

इस टीम को अगर ध्यान से देखा जाए तो आप भी समझ जाएंगे कि इसमें भूत से लेकर भविष्य तक का ध्यान इस तरह रखा गया है कि बदला भी पूरा हो जाए और संतुलन भी नज़र आए। ज़रा सोचिए और याद कीजिए दिनेश कार्तिक को टीम में वापस लेकर कौन आया था ? जवाब है अनिल कुंबले, और फिर पूर्व कोच अनिल कुंबले और विराट कोहली की अनबन की वजह सभी के सामने है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसी अनबन का ख़ामियाज़ा कार्तिक को उठाना पड़ गया।

# तो फिर कुलदीप कैसे बच गए ?

आप सोच रहे होंगे कि अगर ऐसा होता तो फिर कुलदीप यादव कैसे ? क्योंकि कुंबले और कोहली के बीच के विवाद की शुरुआत तो धर्मशाला में कुलदीप यादव को टीम में शामिल करने से हुई थी, कोहली नहीं चाहते थे कि कुलदीप खेलें और जब उनकी ग़ैरमौजूदगी में कमान अजिंक्य रहाणे ने संभाली तो कुंबले ने कुलदीप को टेस्ट कैप दिलवा दी। और उसी मैच में 4 विकेट लेते हुए कुलदीप ने अपने चयन को सिद्ध करते हुए कोहली को उनके ख़िलाफ़ बोलने का मौक़ा तो नहीं दिया लेकिन कुंबले के साथ उनकी लड़ाई की शुरुआत यहीं से हो चुकी थी।

अगर आप ध्यान दें तो मौजूदा श्रीलंकाई सीरीज़ में भी कुलदीप यादव पहले दो टेस्ट बाहर ही बैठे थे और उन्हें मौक़ा तब मिला जब जडेजा पर एक मैच का बैन लगा और उस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए कुलदीप ने फिर विकेट का चौका लगा दिया। शायद यही कारण था कि उसी शाम हुए सेलेक्शन में कुलदीप को 15 खिलाड़ियों में शामिल कर लिया गया।

# क्या युवराज सिंह के करियर पर लग गया विराम ?

अब बात युवराज सिंह की, जिन्हें बाहर करते हुए शास्त्री, कोहली और चयनकर्ताओं ने एक बड़े और बोल्ड फ़ैसले के साथ साथ बड़े बदले की नींव भी तैयार कर ली है। इसमें कोई शक नहीं है कि युवराज की फ़िट्नेस और उम्र फ़टाफ़ट क्रिकेट में उनके आड़े आ रही थी और युवराज की यही कमज़ोरी रवि शास्त्री और विराट कोहली के बड़े बदले की बड़ी ताक़त बन गई। अभी युवराज को ये कहकर आराम से बाहर कर दिया गया कि युवी की फ़िट्नेस और उम्र टीम इंडिया के मिशन 2019 के बीच आड़े आ रही है और वह वहां फ़िट नहीं बैठ पा रहे।

# युवराज को बाहर करना धोनी के लिए इशारा है !

तो उम्र तो महेंद्र सिंह धोनी की भी 36 के पार हो गई है और वर्ल्डकप तक वह भी 37 साल के हो जाएंगे। यानी कोहली और शास्त्री ने एक संकेत दे दिया है कि युवराज के बाद अगला नंबर कैप्टेन कूल का ही होगा, एक साथ अगर दो बड़े खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता अभी दिखा दिया जाता तो उन्हें भी पता था कि वह फ़ैसला बोल्ड नहीं कहलाता बल्कि उन्हें ही क्लीन बोल्ड कर सकता था।

मतलब साफ़ है चयनकर्ताओं ने मिशन 2019 वर्ल्डकप को ध्यान में रखते हुए टीम इंडिया का चयन किया है तो शास्त्री और उनके साथी एक ऐसी चाल चल गए जहां न तो उन पर शक होगा और न ही सवाल। अगर कुछ होगा तो बड़ी ही आसानी से उनका ‘मिशन बदला’ क़ामयाब होगा, जिसके लिए उन्होंने युवराज का पत्ता और करियर साफ़ करते हुए धोनी की संन्यास की सड़क भी तैयार कर दी है।

क्या 304 रनों की इस विशाल जीत से टीम इंडिया के फ़ैंस ख़ुश नहीं ?

भारतीय क्रिकेट टीम ने एक नए कोच के साथ श्रीलंकाई दौरे का आग़ाज़ जीत के साथ किया और वह भी 304 रनों की विशाल और रिकॉर्ड जीत। विदेशी सरज़मीं पर रनों के मामले में टीम इंडिया की ये अब तक की सबसे बड़ी जीत है।

विराट कोहली ने भी टेस्ट क्रिकेट में अपना 17वां शतक और भारत को अपनी कप्तानी में 17वीं टेस्ट जीत दिलाई। कोहली के अलावा शिखर धवन भी शानदार वापसी करते हुए टेस्ट करियर की सबसे बड़ी पारी (190 रन) खेल गए, तो चेतेश्वर पुजारा ने भी एक और शतक लगाते हुए मिस्टर कंसिस्टेंट के तमग़े को बरक़रार रखा।

अभिनव मुकुंद और हार्दिक पांड्या ने भी मिले इस मौक़े को शानदार तौर पर भुनाया, कुल मिलाकर टीम इंडिया के लिए ये जीत यादगार रही। वह भी तब जब दौरे से ठीक पहले मुरली विजय चोट की वजह से साथ नहीं जा पाए और मैच शुरू होने के एक दिन पहले के एल राहुल बीमार पड़ गए। पर कोहली एंड कंपनी ने रवि शास्त्री की कोचिंग में किसी तरह की कोई कमी नहीं खलने दी।

इतनी शानदार और यादगार जीत के बाद तो स्वाभाविक है कि भारतीय क्रिकेट फ़ैंस को बेहद ख़ुश होना चाहिए और इस जीत को अपने दिल के बेहद क़रीब मानना चाहिए। मेरे साथ आपका भी जवाब हां में ही होगा, लेकिन सच कहें तो ऐसा कुछ दिखा नहीं या फिर इस ख़ुशी को फ़ैंस ने ज़ाहिर नहीं किया।

क्या आपने भी ऐसा महसूस किया या फिर ये मेरी व्यक्तिगत सोच है ? न सोशल मीडिया पर ख़ुशी की वह लहर देखने को मिली, जो आमूमन भारत की जीत को लेकर दिखती है, और न ही मीडिया ने इसे बहुत ज़्यादा तवज्जो दिया। क्या बिहार में नीतीश कुमार का लालू यादव का साथ छोड़ दोबारा बीजेपी में शामिल हो जाना इस जीत से ज़्यादा बड़ा और हैरान करने वाला था ?

मेरा जवाब न में होगा, क्योंकि धर्म की तरह क्रिकेट को पूजने वाले प्रशंसकों के लिए क्रिकेट और टीम इंडिया की जीत से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। कम से कम क्रिकेट प्रशंसकों के लिए तो हरगीज़ नहीं। तो फिर ऐसी क्या वजह है कि इस विशाल और रिकॉर्डतोड़ जीत ने उन्हें वह ख़ुशी नहीं दी ?

इसको जानने से पहले इस उदाहरण को समझिए, मान लीजिए आप जिससे सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं फिर चाहे वह आपकी बीवी, बेटी, बेटा, माता, पिता, बहन, दोस्त या कोई भी हो अगर उससे आप किसी बात को लेकर नाराज़ हैं तो उसकी ख़ुशी में आपको भी बेहद ख़ुशी तो होती है लेकिन आप उसको ज़ाहिर करने के बजाए चुप रहते हैं ताकि उसे इस बात का अहसास हो कि आप उससे नाराज़ हैं।

बस यहां भी यही हाल है, विराट कोहली और अनिल कुंबले प्रकरण ने भारतीय क्रिकेट फ़ैंस को नाराज़ कर दिया था। फिर आग में घी डालने का काम दूसरे कोच (रवि शास्त्री) की नियुक्ति से लेकर ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ को टीम इंडिया के साथ फ़िलहाल न जोड़ने के शास्त्री के फ़ैसले ने कर दिया। कुंबले-कोहली प्रकरण के बाद जब द्रविड़-ज़हीर के टीम से जुड़ने की ख़बर आई तो एक बार फिर भारतीय फ़ैंस ख़ुशी से झूम उठे थे। लेकिन अचानक ही उन्हें शास्त्री द्वारा दरकिनार करते हुए भरत अरुण को गेंदबाज़ी कोच बनाने के फ़ैसले ने झकझोर दिया।

भारतीय क्रिकेट को क़रीब से देखने वाले और समझने वाले ये जानते हैं कि राहुल द्रविड़ और ज़हीर ख़ान जैसी शख़्सियत टीम इंडिया को किस सुनहरे भविष्य की ओर ले जा सकती थी। ऐसा नहीं है कि उन्हें या हमें रवि शास्त्री और विराट कोहली या टीम इंडिया के खिलाड़ियों पर भरोसा नहीं या उनकी प्रतिभाओं की क़द्र नहीं लेकिन पिछले कुछ महीनों में भारतीय क्रिकेट के साथ जो चीज़ें चल रही हैं उससे वह निराश और उदास हैं।

इस बीच मिताली राज की कप्तानी में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने जिस तरह कमाल करते हुए विमेंस वर्ल्डकप के फ़ाइनल तक जा पहुंची थी, उसने भी भारतीय फ़ैंस की नाराज़गी को थोड़ा कम करते हुए उन्हें एक और विकल्प दे दिया है। जो महिला क्रिकेट के साथ साथ भारतीय क्रिकेट के लिए भी सुखद है।

हालांकि क्रिकेट फ़ैंस की नाराज़गी ज़्यादा दिनों तक रहने वाली नहीं, लेकिन कुछ तस्वीरें जो कैमरे के ज़रिए हम तक और क्रिकेट फ़ैंस तक पहुंच रही हैं वह इस उदासी और अंदर अंदर पल रहे ग़ुस्से को भड़का ज़रूर सकती हैं। गाले टेस्ट के दौरान रवि शास्त्री का हाव भाव और उनका रियेक्शन क़ाबिल-ए-तारीफ़ नहीं था उसमें घमंड की झलक साफ देखी जा सकती थी।

इन चीज़ों से आने वाले वक़्त में रवि शास्त्री और विराट कोहली को बचना होगा, क्योंकि ये तो बस परिवर्तन काल से गुज़र रही श्रीलंका पर जीत है। टीम इंडिया की राहों में असली चुनौतियां तो दक्षिण अफ़्रीका और इंग्लैंड दौरे से होते हुए 2019 क्रिकेट वर्ल्डकप में आएंगी जो रवि शास्त्री और कोहली का इम्तिहान तो लेंगी और इससे उन्होंने सबक़ नहीं लिया तो ये क्रिकेट फ़ैंस की दिलों की दुरियों को पाटने की बजाए बढ़ाने का काम भी कर सकती हैं।

देशभक्त और देशद्रोही का सर्टिफ़िकेट बांटने का हक़ किसके पास है ?

आज कल फिर भारत माता की जय और वंदेमातरम् चर्चा में है, इसे बोलने वाले को देशभक्त और न बोलने वाले को देशद्रोही की सर्टिफ़िकेट ज़ोंरो से बँट रही है। और तो और इसे इस्लाम और धर्म से भी फटाक से जोड़ दिया जाता है बिना समझे और जाने।

मैं ये कहता हूँ कि आख़िर हम ओवैसी, आज़म, साध्वी या इन जैसों की बातों को तवज्जो देकर देश को बाँटने के इनके मक़सद को सही करने में मदद क्यों करते हैं ?? क्या देश में आज चीन, पाकिस्तान, ग़रीबी महँगाई जैसी समस्याएँ ख़त्म हो गईं हैं ?? या उनका हल ढूँढ लिया गया है ??

इन समस्याओं के लिए आप सवाल न पूछें इसलिए ये सियासतदां ऐसी हरकत और ऐसे बयां देकर मुद्दों को भटकाते हैं और हम और आप इसी में उलझ कर रह जाते हैं। और रही बात किसी को कोई चीज़ मानने की या न मानने की तो उसके अंदर हम जाएंगे तो और भी हैरान हो जाएंगे, क्योंकि वंदे मातरम् और भारत माता की जय कहना तो छोड़ दीजिये कुछ तो ऐसे भी मुसलमान और हिन्दू हैं जो एक दूसरे के हाथों का खाना और पानी तक नहीं पीते।

तो क्या वह सभी के सभी हिन्दू धर्म या मुसलमान धर्म के ब्रांड ऐबेंसडर बन गए ?? अरे ऐसे जाहिलों को दरकिनार ही कर देना उनके लिए बड़ी सज़ा है, फिर चाहे वह हिन्दू हों या मुसलमान या फिर उनका हो कोई भी धर्म। अगर किसी का धर्म देखते हुए ही ब्रांड एंबेसेडर बनाना है तो उसके सकारात्मक और अच्छी चीज़ों को चुनकर बनाना चाहिए न कि नकारात्मक और ग़लत।

उदाहरण के तौर पर क्रिकेट को अगर धर्म मान लिया जाए तो उसके ब्रांड एंबेसडर सचिन तेंदुलकर या राहुल द्रविड़ हैं न कि मैच फ़िक्सर एस श्रीसंथ या मोहम्मद आसिफ़। इसलिए दोस्तों इन बकवास चीज़ों पर अपनी मेहनत ज़ाया न करें।

हाँ आख़िर में मैं ये भी बताता चलूँ कि मैं भारत माता की जय भी कहता हूँ और वंदे मातरम् भी मुझमें जोश भर देता है, और मैं पहले हिन्दुस्तानी हूँ फिर धर्म से मुसलमान।

जय हिन्द… भारत माता की जय… वंदे मातरम्

सियासत का मतलब ही है… स्वार्थ !

अगर किसी भी पार्टी का समर्थन न किया जाए और एक सच्चे क़लम को औज़ार बनाकर लिखा जाए तो स्याही से कुछ ऐसे हुर्फ़ निकलेंगे 👇

सियासत संभावनाओं के साथ साथ स्वार्थों का भी खेल है, इसपर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर मुहर तो लगा दी। लेकिन क्या ये उन्होंने या किसी भी राजनेता ने पहली बार किया है ?? लालू प्रसाद यादव ने 17 साल तक इन्ही सुशासन बाबु को क्या क्या नहीं कहा था कभी लालू को नीतीश के पेट में दांत दिखा था तो कभी आस्तीन का सांप थे नीतीश, लेकिन उसके बाद भी 17 साल की दुश्मनी को दरकिनार करते हुए दोनों एक साथ हो गए।

लालू यादव का वह बयान आज भी याद है जब नीतीश के साथ होने पर उन्होंने मंच से कहा था कि ”सांप्रदायिकता नाम के सांप का फन कुचलने (#BJP) के लिए मैं ज़हर का घोंट (नीतीश के साथ समझौता) पीने को तैयार हूं”। यानी उन्हें पता था कि डूबती हुई सियासत बचानी है तो नीतीश की नौका पर सवार हो जाओ। तो उधर NDA के साथ सालों पुराना रिश्ता ये कहते हुए नीतीश बाबु ने तोड़ डाला था कि ”मिट्टी में मिल जाउंगा लेकिन दोबारा भाजपा से दोस्ती नहीं करूंगा”।

पर देखिए सुशासन बाबु को शासन के लिए कीचड़ में मिलना ही पड़ गया जहां फिर कमल खिला, वाह रे कुर्सी और सियासत तेरे लिए क्या क्या न करना पड़ा। तो लालू जी भी ग़ज़ब कर गए, सियासत बचाने के लिए पूरे बिहार को अपना कहते हुए ज़हर का घोंट तो पी लिया, लेकिन अपने बच्चों की कुर्सी खिसक ना जाए इसकी पीड़ा बर्दाशस्त से बाहर थी लिहाज़ा उन्हें बचाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा गए। वाह रे लालू चचा… कमाल हैं आप।

अब ज़रा सियासत के तीसरे खंबे को देखिए, जो मौक़े की तलाश में इस क़दर बैठा हुआ था कि वह भूल ही गया कि ये वही नीतीश बाबु हैं जिनके जीतने पर पाकिस्तान में पटाखा छोड़ा गया था, ये वही सुशासन बाबु हैं जिनका DNA तो ख़राब है ही साथ ही साथ इशरत जहाँ के अब्बू भी हैं। लेकिन छोड़िए जनाब, कुर्सी का ख़्याल और कांग्रेस मुक्त राज्य बनाने के लिए इशरत जहां के अब्बू को अपना चचा बना लिया जाए तो क्या जाता है। वैसे भी वह कहावत तो है ही है वक़्त पर ”गधे” को भी बाप बनाना पड़ता है।

लेकिन इन सब के बीच अगर किसी की सबसे ज़्यादा दयनीय स्थिति हो गई है और देखकर तरस आ रहा है तो वह है देश की सबसे पुरानी और विलुप्त होने के कगार पर आ चुकी कांग्रेस की हालत। उसके सामने से तो लग रहा है कि किसी ने शाही पकवान छीन लिया हो, मानो तलाक़ पति और पत्नि के बीच हुआ हो लेकिन विधवा कांग्रेस हो गई।

बहरहाल इन सब चीज़ों को देखने के बाद मैं बेहद ख़ुश हूं क्योंकि मुझे किसी भी सियासी चेहरे और पार्टी को समर्थन न करने के फ़ैसले को सही साबित करने के लिए एक और उदाहरण मिल गया। ये राजनेता और पार्टियां न किसी की हुईं और न होंगी, बस अपने फ़ायदे और नुक़सान के लिए फ़ैसले बदलती और करती रहती हैं।

किसी के पास मौक़ा आए तो कोई आतंकवादियों की बेटी और अब अब्बू के साथ मिलकर सरकार बना ले, तो कोई पेट में दांत और आस्तीन के सांप को भी कुर्सी के लिए गले लगा लेता है। इसलिए कहता हूं भाईयों और बहनों ज़्यादा भक्तगिरी मत दिखाइए, वरना आप तो हरे और भगवा रंग के भक्तों के बीच दीवार बना देंगे और उसी दीवार के सहारे हरे और भगवा रंग का चोला ओढ़े राजनेता एक दूसरे के घर में जाकर ख़ूब अय्याशी करेंगे और बेवक़ूफ़ आप बनेंगे।

अभी भी वक़्त है नींद से जागिए और इनलोगों के चक्कर में अपने आस पास और भाईयों और बहनों के साथ हंसी और ख़ुशी के पल को बरबाद मत करिए। खुशी मनाइए और मिलकर रहिए, क्योंकि हम सभी अलग अलग रंगों में रंगे ज़रूर है लेकिन अंदर एक ही रंग का ख़ून है और वही सांस लेते हैं जो सभी रंग वाले लेते हैं। उसके अंदर भी हिन्दुस्तानी ख़ून है और हमारे अंदर भी भारतीय ख़ून है।

जय हिन्द… जब बिहार… वंदे मातरम्…

41 साल बाद भारतीय महिला क्रिकेट को मिली पहचान और 125 करोड़ देशवासियों के दिल में मुक़ाम

23 जुलाई 2017 का दिन भारतीय महिला क्रिकेट के लिए किसी सपने से कम नहीं था। भले ही वर्ल्डकप के फ़ाइनल में मेज़बान इंग्लैंड के हाथों मिताली राज की कप्तानी वाली भारतीय क्रिकेट टीम वर्ल्डकप की ट्रॉफ़ी उठाने से चूक गई हो, लेकिन उससे बड़ी जीत उन्हें हासिल हो गई।

एक ऐसी जीत जिसके सामने ट्रॉफ़ी और ख़िताब की कोई बिसात नहीं, जी हां जिस देश में क्रिकेट का मतलब कपिल देव, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर से लेकर महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली होता हो उस देश में जब सवा सौ करोड़ लोग अचानक मिताली…मिताली करने लगें जिस देश में हर मन की प्रीत बन जाएं हरमनप्रीत कौर, और जहां दिप्ती के एक एक रन पर सारे हिन्दुस्तानी की धड़कने बढ़ने लगें, उससे बड़ी जीत और क्या हो सकती है ?

वर्ल्डकप इंग्लैंड में खेला जा रहा था, और उसका फ़ाइनल हुआ क्रिकेट के मक्का कहे जाने वाले लॉर्ड्स पर जहां खेलना ही किसी सपने से कम नहीं होता। मिताली की इस टीम इंडिया ने न सिर्फ़ उस सपने को सच किया बल्कि ऐसा न धोनी ने किया था न अज़हर ने और न ही दादा या कोहली को ये मौक़ा मिला। कपिल देव की कप्तानी के बाद ये पहली टीम इंडिया थी जो वर्ल्डकप का फ़ाइनल लॉर्ड्स पर खेल रही थी।

फ़ाइनल लॉर्ड्स पर हो रहा था और उम्मीदों भरी नज़रें पूरे हिन्दुस्तान में टीवी और मोबाइल पर लगी हुई थी। जैसे जैसे मैच बढ़ रहा था दुआओं के हाथ आसमान की ओर उठ रहे थे, ऊपर वाले ने भी ये सब देखकर सोचा होगा कि इस ब्लू ब्रिगेड की तो जीत ऐसे ही हो चुकी है तो फिर अंग्रोज़ों को भी ट्रॉफ़ी के साथ ख़ुश कर दिया जाए।

स्कोरकार्ड पर भले ही कुछ और लिखा हो, आंकड़े ज़रूर कुछ और ही गवाही दे रहे हों लेकिन सभी देशवासियों के लिए वर्ल्ड चैंपियन मिताली राज की शेरनियां ही हैं। दूसरों का तो नहीं पता लेकिन मेरे लिए तो वर्ल्ड कप जीत लिया इन भारतीय शेरनियों ने। इनकी बदौलत आज भारतीय महिला क्रिकेट ने भी सभी को दीवाना बना दिया और अपनी अहमियत भी बता दी, वह मुक़ाम जिसके इंतज़ार में ये पिछले 4 दशकों से थीं।

विराट कोहली और बीसीसीआई को भी इन शेरनियों से प्रेरणा लेनी चाहिए, मुझे नाज़ है देश की इन लाडलियों पर, जिन्होंने बेहद कम संसाधन और कम मदद मिलने के बावजूद तिरंगे का मान बढ़ाया। यही वजह है कि इस हार में भी जीत छुपी है और वह भी इतनी बड़ी जिसने पूरे देश को एक नया विकल्प दे दिया है, अब तक जिस देश में क्रिकेट का मतलब लड़कों वाली टीम इंडिया होती थी। आज क्रिकेट फ़ैंस और देशवासियों के दिलों में इन महिलाओं ने भी अपना मुक़ाम बना लिया है। कल तक जो एक महिला खिलाड़ी का नाम नहीं जानते थे, आज वह सभी के नाम भी जानते हैं और उन्हें किसी दूसरे से नहीं बल्कि उन्हें उनके खेल के लिए पहचानने लगे हैं।

लेकिन विडंबना ये भी है कि इतना सब होने और समझने में तथाकथित क्रिकेट फ़ैंस और धर्म की तरह पूजे जाने वाले इस देश के लोगों को 41 साल से भी ज़्यादा लग गए। महिला क्रिकेट का इतिहास भी कम सुनहरा और प्रेरणादायक नहीं है, 1973 में विमेंस क्रिकेट ऑफ़ एसोशिएन की स्थापना हुई थी और 1976 में पहली बार भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने डायना एडुलजी (मौजूदा CoA सदस्य) की कप्तानी में अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में दस्तक दी थी। ये मुक़ाबला बैंगलोर के चिन्नास्वामी स्टेडियम में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ खेला गया था, जहां टीम इंडिया को हार मिली थी।

2 साल बाद महिला क्रिकेट टीम ने शांता रंगास्वामी की कप्तानी में वेस्टइंडीज़ से बदला लिया और भारतीय महिला क्रिकेट टीम को पहली अंतर्राष्ट्रीय जीत दिलाई। ये जीत टेस्ट मैचों में आई थी और इस ऐतिहासिक जीत का गवाह बना था पटना का मोइन-उल-हक़ स्टेडियम, जो फ़िलहाल अपनी पहचान खो रहा है।

वनडे में टीम इंडिया पहली बार 1978 में मैदान में उतरी थी, जो विश्वकप का मुक़ाबला था और खेला गया था ऐतिहासिक इडेन गार्डेन्स पर। इंग्लैंड के ख़िलाफ़ इस मुक़ाबले में भी भारतीय महिला क्रिकेट टीम को हार मिली और फिर पटना में ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड ने भी भारत को शिकस्त दी थी।

वनडे की पहली जीत महिला टीम इंडिया को न्यूज़ीलैंड के नेपियर में 4 साल बाद यानी 1982 में हासिल हुई थी। हालांकि इसके बाद से महिला क्रिकेट टीम लगातार खेलती रही जहां अब 13 कप्तानों ने इस टीम को कई सुनहरी जीत और यादगार पल दिए हैं। मिताली राज की कप्तानी में ही इस टीम ने 2005 में भी विश्वकप के फ़ाइनल में जगह बनाई थी, तब कंगारुओं के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी थी।

12 साल बाद एक बार फिर मिताली चैंपियन बनने की दहलीज़ तक ले पहुंची थी लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। हालांकि, इस हार में भी जीत है और वह भी ऐसी जो शायद जीत से भी बड़ी है। भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए रविवार की रात एक ऐसा ट्रेलर लेकर आई है जिसके भविष्य में कई ऐसी तस्वीरें छुपी हैं जिसे आने वाले वक़्त में मिताली की ये शेरनियां अपने बच्चों को दिखाती हुई कहेंगी कि वे हम ही थे जिन्होंने काली सुरंग में से निकलते हुए सुनहरी धूप दिखाई।

मिताली एंड कंपनी के मैजिक से आज महक उठेगा हिन्दुस्तान…

महिला क्रिकेट को आज तक भारतीय मीडिया ने भले ही वह तवज्जो न दिया हो, जिसकी वह हक़दार हैं। लेकिन आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि महिला क्रिकेट वर्ल्डकप की शुरुआत पुरुष क्रिकेट वर्ल्डकप के 2 साल पहले ही हो गई थी।

जी हां, 1975 में पहली बार पुरुष क्रिकेट वर्ल्डकप खेला गया था जिसे वेस्टइंडीज़ ने अपने नाम किया था, ये तो सभी को याद होगा लेकिन शायह ही किसी क्रिकेट फ़ैन को ये पता होगा कि पहला महिला क्रिकेट वर्ल्डकप 1973 में खेला गया था और उसे इंग्लैंड ने प्वाइंट्स के आधार पर अपने नाम किया था।
हालांकि पहले विश्वकप में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने शिरकत नहीं की थी, लेकिन दूसरे यानी 1978 वर्ल्डकप में टीम इंडिया ने पहली बार हिस्सा लिया और चौथे स्थान पर रही थी। तब और अब में काफ़ी फ़र्क आ चुका है, पहले जहां दबदबा इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया का रहता था तो अब भारतीय महिला क्रिकेट टीम की तूती बोलने लगी है।

टीम इंडिया की कप्तान मिताली राज तो वनडे क्रिकेट इतिहास की सबसे ज़्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बन गईं हैं, वनडे में उन्होंने इसी विश्वकप के दौरान 6000 रन पूरे करने वाली पहली महिला क्रिकेटर भी बन गईं। टीम इंडिया ने इस टूर्नामेंट में कमाल का प्रदर्शन करते हुए फ़ाइनल तक का सफ़र तय किया है।

सेमीफ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया और उससे पहले वर्चुअल क्वार्टरफ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड को जिस अंदाज में मिताली एंड कंपनी ने हर विभाग में चारो ख़ाने चित किया है वह ये दर्शाता है कि इस टीम की नज़र सिर्फ़ और सिर्फ़ कप पर है। क्रिकेट के मक्का पर होने वाला आज का ख़िताबी मुक़ाबला भारतीय महिलाओं के लिए और पूरे देश के लिए किसी सपने से कम नहीं है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की ये लड़ाई न सिर्फ़ लॉर्ड्स में वर्ल्डकप के जीतकर दुनिया पर राज करने के लिए है। बल्कि मिताली की कप्तानी वाली इस टीम को अपने उन आलोचकों के साथ साथ क्रिकेट बोर्ड को भी जवाब देना है जो उनमें और पुरुष टीम में फ़र्क समझता है। आज भी विराट कोहली की टीम इंडिया और उनके खिलाड़ियों को मिलने वाला मेहनताना मिताली की महिला टीम और उनकी साथी खिलाड़ियों से कहीं ज़्यादा है।

क्रिकेट को धर्म की तरह पूजे जाने वाले इस देश में पुरुष क्रिकेटरों को तो भगवान का दर्जा हासिल है लेकिन इसी खेल में देश का नाम रोशन करने वाली महिला खिलाड़ियों के तो नाम भी शायद ही किसी को पता हों। तो क्या क्रिकेट के तथाकथित दीवानों को सिर्फ़ पुरुष क्रिकेट से प्यार है ? भारतीय मीडिया और स्पोन्सर भी इसके लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं जितना कि क्रिकेट बोर्ड।

फ़र्ज़ कीजिए अगर विराट कोहली वाली टीम इंडिया वर्ल्डकप का फ़ाइनल तो छोड़ ही दीजिए किसी तीन या चार देशों वाले टूर्नामेंट के फ़ाइनल में भी पहुंची होती तो हर अख़बार और टीवी चैनलों में उनके जयकारे लग रहे होते, कहीं यज्ञ हो रहा होता तो कोई हवन कर रहा होता। लेकिन मिताली की कप्तानी वाली ये टीम जब इतिहास रचने और विश्व चैंपियन बनने के इतने क़रीब खड़ी है तब भी न वह हल्ला है न ही वह पागलपन और जुनून।

मिताली एंड कंपनी भी इस बात को जानती है और उन्होंने भी ये संकल्प कर रखा है कि इस बार कुछ ऐसा कर दिखाना है कि लोग उन्हें विराट कोहली या कपिल देव या महेंद्र सिंह धोनी जैसा न कहें, बल्कि कोहली और धोनी को मिताली और हरमनप्रीत जैसा कहने पर मजबूर हो जाएं।

भारतीय क्रिकेट इतिहास के लिए 23 जुलाई 2018 का दिन कितना सुनहरा और बड़ा है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये सिर्फ़ दूसरा मौक़ा है जब कोई भारतीय क्रिकेट टीम क्रिकेट के मक्का यानी लॉर्ड्स पर वर्ल्डकप का फ़ाइनल खेल रही है। इससे पहले 1983 में कपिल देव की कप्तानी में टीम इंडिया ने इसी मैदान पर वेस्टइंडीज़ को हराकर ख़िताब अपने नाम किया था और अब 34 साल बाद मिताली राज लॉर्ड्स पर टीम इंडिया की वर्ल्डकप के फ़ाइनल में अगुवाई कर रही हैं।

मिताली के साथ साथ पूरा हिन्दुस्तान भी दुआ कर रहा है कि कपिल की ही तरह मिताली भी इस टीम को जीत दिलाते हुए न सिर्फ़ पहली बार विश्व चैंपियन बनाएं, बल्कि भारतीय महिला क्रिकेट की पूरी तस्वीर बदल डालें। मिताली जानती हैं कि ये तभी मुमकिन है जब ट्रॉफ़ी पर कब्ज़ा किया जाए, क्योंकि रनर अप तो टीम इंडिया 2005 में भी रही थी।

रविवार की रात सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानी के लिए सात समंदर पार से ख़ुशी की ऐसी महक ला सकती है जिसका असर सालों तक नहीं बल्कि दशकों तक रहेगा। मिताली को भी इस जीत के मायने और हार के टीस के बीच का फ़र्क अच्छे से मालूम है। क्योंकि लोगों की फ़ितरत और दुनिया का दस्तूर भी यही है कि पहली बार की जीत तक़यामत सभी को याद रह जाती है, लेकिन दूसरी बार कौन जीता था इसे ज़माना भूल जाता है।

रोजर फ़ेडरर अब सिर्फ़ नामी शख़्सियत नहीं बल्कि सोच बन गए हैं !

क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर, तो F1 में माइकल शुमाकर, फ़ुटबॉल में अगर लियोनेल मेसी तो टेनिस में रोजर फ़ेडरर ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने सिर्फ़ शोहरत नहीं कमाई बल्कि उस खेल का ही पर्यायवाची शब्द बन गए। हो सकता है इनमें से कुछ नामों में आप में से कुछ लोग शायद मुझसे इत्तेफ़ाक न रखें या कहें कि ये नहीं वह होना चाहिए था। लेकिन मैंने उन दौर के खिलाड़ियों का नाम लिया है जब मेरी रगों में भी एक खिलाड़ी दौड़ता था और खेल और खिलाड़ियों को चाहने का नया नया जोश उफ़ान पर था।

भारत में पैदा होने की वजह से क्रिकेट मेरा भी पहला प्यार था और सचिन तेंदुलकर भी आप और कईयों की तरह मेरे सबकुछ थे। 2003 क्रिकेट वर्ल्डकप में सचिन का लाजवाब फ़ॉर्म भी याद है तो फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों धुनाई ने कुछ दिन के लिए मेरे सिर से क्रिकेट का भूत उतार दिया था। तब टेनिस मेरा दूसरा प्यार हो चुका था, और उस वक़्त स्विटज़रलैंड के युवा टेनिस खिलाड़ी का ख़ूब नाम हो रहा था। नाम था रोजर फ़ेडरर, मैं भी फ़ेडरर का जल्द ही फ़ैन हो गया था, रोजर ने पहली बार विंबलडन का ख़िताब अपने नाम किया था और तब ख़ूब सुर्ख़ियां बनी थीं कि ”ग्रांड स्लैम जीतने वाले पहले स्विस खिलाड़ी बने रोजर फ़ेडरर।” तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अपने देश को पहली बार कोई ग्रैंड स्लैम ख़िताब दिलाने वाला ये खिलाड़ी आने वाले कुछ सालों में टेनिस के सारे रिकॉर्ड्स अपने नाम करते हुए इस खेल पर राज करने लगेगा।

1998 में जूनियर टेनिस में क़दम रखने के साथ ही विंबलडन चैंपियन बन तहलका मचाने वाले रोजर फ़ेडरर के लिए ये तो बस एक शुरुआत थी। अगले 4 सालों तक यानी 2004, 2005, 2006 और 2007 में लगातार वह विंबलडन चैंपियन रहे। 5 सालों तक चैंपियन रहने के बाद छठे साल यानी 2008 में वह रनर अप रहे फिर 2009 में दोबारा ताज अपने सिर पर पहन लिया।

इन सालों में सिर्फ़ विंबलडन ही नहीं बल्कि सभी ग्रांड स्लैम (ऑस्ट्रेलियन ओपन, फ़्रेंच ओपन और यूएस ओपन) पर भी फ़ेडरर का राज होता गया। इस दौरान रोजर फ़ेडरर ने पुरुष टेनिस के सिंगल्स मुक़ाबलों में पीट संप्रास के सबसे ज़्यादा 13 ग्रैंड स्लैम को भी पीछे छोड़ दिया था। हालांकि फ़ेडरर ने बुरा दौर भी देखा 2012 में विंबलडन जीतने के बाद फ़ेडरर फिर कोई भी ग्रैंड स्लैम नहीं जीत पा रहे थे। कहा तो ये भी जाने लगा था कि अब फ़ेडरर का करियर ख़त्म होने के कगार पर है उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। कोई ये कहने लगा कि उनकी उम्र अब उनका साथ नहीं दे रही उनको अब टेनिस कोर्ट को अलविदा कह देना चाहिए।

आलोचकों की इन बातों ने जितना फ़ेडेरर को परेशान नहीं किया, उससे कहीं ज़्यादा चोट ने उन्हें परेशान किया। हार के बाद कई बार उनकी आंखों से निकले आंसू भी शायद यही कहते थे कि अब बहुत हुआ। 2002 से लेकर 2016 तक जिस खिलाड़ी की रैंकिंग कभी टॉप-10 के नीचे नहीं आई थी, जिस खिलाड़ी ने 302 हफ़्तों तक लगातार नंबर-1 की कुर्सी पर रहते हुए वर्ल्ड रिकॉर्ड बना डाला था। वह 2016 आते आते टॉप-10 से भी बाहर ह चुका था, हर तरफ़ से फ़ेडरर पर संन्यास का दबाव बढ़ता जा रहा था।

लेकिन फ़ेडरर ने भी मानो ठान लिया था कि अपने करियर का वह इस तरह अंत नहीं करेंगे, जज़्बा तो था पर बढ़ती उम्र और चोटिल शरीर उनका साथ नहीं दे रहे थे। पर बड़ा खिलाड़ी वही होता है जो विपरित परिस्थितियों में न सिर्फ़ वापसी करे बल्कि अपने खेल से दोबारा सभी का दिल जीत ले।

हार न मानने का फ़ैसला करने के बाद फ़ेडरर ने ख़ुद को टेनिस से कुछ समय के लिए दूर किया और अपनी फ़िट्नेस पर ध्यान देने लगे। कई टूर्नामेंट से बाहर रहना भी फ़ेडरर के संन्यास की अटकलों को बढ़ावा दे रहा था। लेकिन फ़ेडरर ने किसी मक़सद के साथ अपने आप को टेनिस कोर्ट से दूर रखा था, ये उसी उदाहरण की तरह था जैसे शेर शिकार करने से पहले कुछ क़दम पीछे जाता है और फिर वहां से अपने शिकार पर पूरी रफ़्तार और ताक़त के साथ झपट्टा मारता है।

फ़ेडरर भी कोर्ट से तो दूर थे लेकिन कोर्ट पर शानदार वापसी के लिए वह अपने आप को तैयार कर रहे थे। 2017 में फ़ेडरर ने कोर्ट पर वापसी का ऐलान करते हुए सभी को चौंका दिया, अब बारी थी साल के पहले ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट की जहां फ़ेडरर अपने करियर की सबसे ख़राब रैंकिंग के साथ 17वीं सीडेड खिलाड़ी के तौर पर शिरकत कर रहे थे। लेकिन रैंकिंग और सीड को फ़ेडेरर ने ठीक उसी तरह एक नंबर साबित कर दिया जैसे उनके लिए उम्र भी बस एक नंबर थी। फ़ेडरर ने एक के बाद एक शानदार जीत दर्ज करते हुए फ़ाइनल में एंट्री ले ली और वहां अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी राफ़ेल नडाल को हराकर 5 साल बाद किसी ग्रैंड स्लैम पर कब्ज़ा जमाया और साबित कर दिया था कि टेनिस और रोजर फ़ेडरर अभी भी साथ साथ हैं।

रोजर फ़ेडरर ने इसके बाद इसी साल इंडियन वेल्स और मियामी ओपन के भी चैंपियन बने और इस बात का सभी को अहसास करा दिया कि ऑस्ट्रेलियन ओपन में जीत कोई तुक्का नहीं थी। इसके बाद अपने शरीर और चोट को देखते हुए फ़ेडरर ने फ़्रेंच ओपन से अपना नाम वापस ले लिया था और कहा कि वह ग्रास और हार्ड कोर्ट पर ही खेलेंगे।

सभी की नज़रें अब विंबलडन पर थीं, जहां फ़ेडरर एक अलग अंदाज़ में खेलते हुए नज़र आए। लग रहा था मानो ये वही नौजवान है जिसने पहली बार 2003 में विंबलडन अपने नाम किया था। उनके सामने कोई भी विपक्षी हो फ़ेडरर के लिए जीत महज़ औपचारिकता बनती जा रही थी। अगले महीने की 8 तारीख़ को अपना 36वां बसंत पूरा करने वाले फ़ेडरर ने विंबलडन में वह कर दिया जो आज तक सिर्फ़ एक ही खिलाड़ी ने किया था और वह थे बजोर्न बोर्ग जिन्होंने 1976 में पूरे टूर्नामेंट में बिना कोई सेट गंवाए ख़िताब जीता था।

रोजर फ़ेडरर ने भी विंबलडन 2017 में एक भी सेट नहीं गंवाते हुए ख़िताबी मुक़ाबले में पहुंचे और फ़ाइनल में भी मैरिन सिलिक को सीधे सेटों में हराते हुए अपना 8वां विंबलडन और करियर का 19वां ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीत लिया। इस जीत के साथ ही फेडरर ने न सिर्फ़ अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया बल्कि उन्हें भी अपने खेल का दीवाना बना लिया। जीत के बाद फ़ेडरर ने जो कहा वह इस बात की तरफ़ इशारा कर रहा है कि उनमें अभी भी टेनिस बाक़ी है और वह खेलते रहेंगे। उन्होंने कहा, ‘’अगर मैं इसी तरह वापसी करते रहा तो फिर 6 महीने का ब्रेक ले लूंगा…।“

रोजर फ़ेडरर की इस वापसी को आप शानदार कहें, या ड्रीम कमबैक कहें या फिर उनका दूसरा जन्म कहा जाए। लेकिन मेरी नज़र में ये खिलाड़ी या फिर कोई शख़्सियत नहीं बल्कि टेनिस के पर्यायवाची बन चुके हैं जो अब सभी के लिए प्रेरणास्रोत से बढ़कर एक सोच हैं।