IPL: रिटेन और राइट टू मैच (RTM) मे क्या फ़र्क़ है, धोनी या पांड्या के लिए कौन है फ़ायदेमंद ?

आईपीएल 2018 के लिए अभी से ही फ़्रैंचाइज़ी तैयारियों में जुट चुके हैं, फ़ैन्स को भी इस 11वें सीज़न से काफ़ी उम्मीदें हैं। लोकप्रियता के मामले में फ़ैंस की नंबर-1 टीम चेन्नई सुपर किंग्स के साथ साथ राजस्थान रॉयल्स की भी वापसी इस सीज़न में देखने को मिलेगी। चेन्नई की वापसी की ख़बर उनके फ़ैंस की बेसब्री बढ़ा रही है और वह ये जानने के लिए बेताब हैं कि क्या सभी के चहेते महेंद्र सिंह धोनी एक बार होंगे सुपरकिंग्स के कप्तान ?

चेन्नई सुपरकिंग्स ने धोनी को रिटेन करने पर औपचारिक ऐलान तो नहीं किया है, लेकिन उन्हें और कुछ दूसरे खिलाड़ियों को रिटेन करने की बातों पर क़रीब क़रीब मुहर लग गई है। आईपीएल गवर्निंग काउंसिल ने इस बार रिटेन करने और राइट टू मैच (RTM) में थोड़ा बदलाव किया है। जिसे टीम फ़्रैंचाइज़ियों के पास भेजा जाएगा और फिर इसके तहत वह खिलाड़ियों को रिटेन करने का एलान कर सकते हैं।

फ़ैंस के ज़ेहन में एक सवाल ये है कि रिटेन और राइट टू मैच (RTM) में फ़र्क़ क्या है और दोनों कैसे अलग हैं ? दरअसल, रिटेन और RTM में एक बड़ा अंतर ये है कि रिटेन खिलाड़ियों की जानकारी जहां नीलामी से पहले ही फ़्रैंचाइज़ियों को देनी होती है तो नीलामी के दौरान वह RTM का फ़ायदा उठा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर चेन्नई ने महेंद्र सिंह धोनी को रिटेन कर लिया तो वह नीलामी में नहीं रहेंगे। इसी तरह अगर आर अश्विन या हार्दिक पांड्या को उनके फ़्रैंचाइज़ी रिटेन नहीं करते हैं तो फिर उनकी नीलामी होगी। पर यहां इन दोनों ही खिलाड़ियों के फ़्रैंचाइज़ी के पास राइट टू मैच का विकल्प होगा। नीलामी के दौरान अगर हार्दिक पांड्या पर चेन्नई और रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर या फिर कोई भी टीम बोली लगाती है और आख़िरी बोली 8 करोड़ पर बंद होती है तो यहां उस बोली पर मुंबई इंडियंस (क्योंकि पांड्या 2017 तक मुंबई इंडियंस का हिस्सा रहे) राइट टू मैच के विकल्प का इस्तेमाल करते हुए उन्हें उसी रक़म (जिस पर बोली नीलामी रुकी) पर अपने साथ रिटेन कर सकती है।

2018 में होने वाले आईपीएल के इस सीज़न के लिए एक फ़्रैंचाइज़ी के पास अधिकतम 3 खिलाड़ियों को रिटेन करने और 2 के लिए राइट टू मैच का इस्तेमाल करने की सीमा होगी। इस तरह वह अधिकतम 5 खिलाड़ियों को अपने पास रिटेन सकती हैं, साथ ही साथ रिटेन होने वाले खिलाड़ियों के हित में भी आईपीएल गवर्निंग काउंसिल ने सोचते हुए एक शानदार फ़ैसला किया है। जिसके तहत अगर कोई टीम 3 खिलाड़ियों को रिटेन करती है तो पहले को 15 करोड़ रुपये मिलेंगे जबकि दूसरे को 11 करोड़ और तीसरे को 7 करोड़ की रक़म मिलेगी। लेकिन अगर फ़्रैंचाइज़ी दो ही खिलाड़ियों को रिटेन करती है तो पहले को 12.5 करोड़ और दूसरे को 8.5 करोड़ रुपये मिलेंगे, ठीक इसी तरह अगर किसी फ़्रैंचाइज़ी ने सिर्फ़ एक खिलाड़ी को ही रिटेन करने का फ़ैसला किया तो फिर उस खिलाड़ी को 12.5 करोड़ रुपये मिलेंगे।

यानी टीम अब इस तरह भी सोच सकती है कि किसी 1 या 2 खिलाड़ी को ही रिटेन किया जाए और बाक़ी के खिलाड़ियों को राइट टू मैच के तहत अपने साथ रखा जाए। क्योंकि अगर तीन खिलाड़ियों को रिटेन किया तो फिर 80 में से 33 करोड़ रिटेन में ही ख़त्म हो जाएंगे। साथ ही साथ अगर किसी टीम ने एक भी खिलाड़ी नीलामी से पहले रिटेन नहीं किया तो फिर उन्हें नीलामी के दौरान 3 ही खिलाड़ियों पर राइट टू मैच का अधिकार मिल सकता है।

राइट टू मैच के तहत नीलामी के दौरान किसी खिलाड़ी पर उस फ़्रैंचाइज़ी का ऑनर कोई बोली लगाए या न लगाए इससे फ़र्क नहीं पड़ता, मान लीजिए मुंबई इंडियंस ने जसप्रीत बुमराह को रिटेन नहीं किया। और नीलामी के दौरान बुमराह पर आख़िरी बोली 5 करोड़ ही लगी, तो इस स्थिति में मुंबई राइट टू मैच कार्ड का इस्तेमाल कर बुमराह को वापस रिटेन कर सकते हैं। यहां उन्हें 2 करोड़ का फ़ायदा होगा, क्योंकि तीसरे खिलाड़ी के तौर पर भी रिटेन करने के लिए उन्हें 7 करोड़ तो ख़र्च करने ही होते। लेकिन राइट टू मैच में एक जोखिम ये भी है कि मान लीजिए आपने उस खिलाड़ी को रिटेन सिर्फ़ इसलिए नहीं किया क्योंकि उसके लिए फ़्रैंचाइज़ी को कम से कम 7 करोड़ देने होते। यहां टीम ऑनर ने ये सोचा कि इस खिलाड़ी को मैच टू कार्ड के ज़रिए इससे कम में रिटेन किया जा सकता है, लेकिन नीलामी के दौरान अगर उस खिलाड़ी की आख़िरी बोली 7 करोड़ से ज़्यादा लग गई तो आपके हाथ से वह निकल भी सकता है।

मतलब इस बार खिलाड़ियों का पूरा ध्यान रखने की कोशिश की गई है, अगर ऐसा नहीं होता तो फिर हार्दिक पांड्या या जसप्रीत बुमराह जैसे पहले बेस प्राइज़ पर बिके खिलाड़ियों के साथ नइंसाफ़ी कहलाती।

रिटेन करने के लिए भी कुछ नियम हैं, जो इस तरह हैं:

#1 अधिकतम 3 ही कैप्ड भारतीय खिलाड़ियों को एक टीम रिटेन कर सकती।

#2 अधिकतम 2 ही विदेशी खिलाड़ियों एक फ़्रैंचाइज़ी अपने साथ रोक सकती है।

#3 अधिकतम 2 अनकैप्ड भारतीय खिलाड़ियों को ही रिटेन करने का अधिकार एक फ़्रैंचाइज़ी के पास होगा।

साथ ही साथ इस बार टीम का बजट भी 66 करोड़ से बढ़ाकर 80 करोड़ कर दिया गया। और इसे 2019 में बढ़ाकर 82 और 2020 में 85 करोड़ करने का भी आईपीएल गवर्निंग काउंसिल ने घोषणा की है। आईपीएल गवर्निंग काउंसिल ने ये भी साफ़ कर दिया है कि पिछले दो सीज़न में खेलने वाली राइज़िंग पुणे सुपरजायंट्स और गुजरात लायंस इस सीज़न में नहीं होगी, यानी उन टीमों में खेलने वाले वैसे खिलाड़ियों को वापस नीलामी से गुज़रना होगा जो न कभी चेन्नई का हिस्सा थे और न ही राजस्थान के साथ थे। यानी बेन स्टोक्स और एलेक्स हेल्स पर जहां नीलामी में बोली लगना तय है तो पिछले सीज़न में पुणे के कप्तान रहे स्टीवेन स्मिथ को इस बार उनकी पुरानी टीम राजस्थान रॉयल्स रिटेन कर सकती है।

इन सब के अलावा भारतीय अनकैप्ड खिलाड़ियों के स्लैब में भी आईपीएल गवर्निंग काउंसिल ने इज़ाफ़ा किया है जो बेस प्राइज़ पहले 10, 20 और 30 लाख का स्लैब था अब उसे बढ़ाकर 20, 30 और 40 लाख कर दिया गया है। साथ ही साथ भारत के लिए कम से कम एक अंतर्राष्ट्रीय मैच खेलने वाले खिलाड़ियों का बेस प्राइज़ अब 50 लाख कर दिया गया है, जो पहले 30 लाख रुपये था।

बस अब इंतज़ार इस बात का है कि कौन सी टीमें किन खिलाड़ियों को रिटेन करती हैं और किन्हें नीलामी के लिए आज़ाद करती हैं। सबसे ज़्यादा अगर फ़ैंस की किसी चीज़ पर नज़र है तो वह ये कि चेन्नई सुपरकिंग्स, मुंबई इंडियंस और कोलकाता नाइटराइडर्स किन किन खिलाड़ियों को रिटेन करती हैं। क्योंकि अगर इन 10 सालों में किसी तीन टीमों की बात की जाए जिनकी फ़ैन फॉलोविंग दूसरों से कहीं ज़्यादा है, तो नि:संदेह वे तीनों टीमें चेन्नई, मुंबई और कोलकाता ही होंगी।

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प्रोटियाज़ के ख़िलाफ़ जसप्रीत बुमराह हो सकते हैं विराट कोहली का सरप्राइज़ ट्रंप कार्ड

28 वनडे, 30 अतंर्राष्ट्रीय टी20 और 26 प्रथम श्रेणी मुक़ाबले खेलने वाले दाएं हाथ के तेज़ गेंदबाज़ जसप्रीत बुमराह को भारतीय टेस्ट टीम में भी शामिल कर लिया गया है। अगले महीने की 5 तारीख़ से केपटाउन से शुरू हो रही दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ 3 टेस्ट मैचों की सीरीज़ के लिए बुमराह को 17 सदस्यीय दल का हिस्सा बनाया गया है। हालांकि पांचवें तेज़ गेंदबाज़ के तौर पर शामिल किए गए गुजरात के इस गेंदबाज़ को अंतिम-11 में मौक़ा मिलता है या नहीं ये देखना दिलचस्प रहेगा।

पिछले 18 महीनों में भारतीय क्रिकेट की दो सबसे बड़ी खोज (हार्दिक पांड्या और जसप्रीत बुमराह) में से एक इस दाएं हाथ के तेज़ गेंदबाज़ के आने से नि:संदेह टीम इंडिया का गेंदबाज़ी आक्रमण मज़बूत हुआ है। बुमराह ने 2017 में अब तक वनडे क्रिकेट में 35 विकेट हासिल किए हैं, और वह फ़िलहाल इस प्रारुप में सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ों की सूची में इस वर्ष चौथे नंबर पर हैं। बुमराह की ख़ासियत है उनकी रफ़्तार के साथ दाएं हाथ के बल्लेबाज़ के लिए इनस्वींग गेंद और स्लिंगिग एक्शन से फेंकी गई तेज़ यॉर्कर। नई गेंद के साथ साथ बुमराह पुरानी गेंद से अच्छी रिवर्स स्वींग भी कराने में माहिर हैं, लिहाज़ा टेस्ट क्रिकेट में भी वह पेस बैट्री में एक शानदार विकल्प हो सकते हैं। मज़ेदार बात ये है कि दक्षिण अफ़्रीकी टीम में कई बाएं हाथ के बल्लेबाज़ के हैं जिनमें इस साल टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज़्यादा रन बनाने के मामले में दूसरे नंबर पर काबिज़ डीन एल्गर (1097 रन), मध्यक्रम की रीढ़ जेपी डुमिनी और विस्फोटक विकेटकीपर बल्लेबाज़ क्विंटन डी कॉक शामिल हैं। बुमराह की इनस्वींग गेंदे बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों के लिए आउटस्वींग होगी, जिसका फ़ायदा बुमराह को मिल सकता है।

दक्षिण अफ़्रीका की पिच और उछाल भी बुमराह के लिए मददगार साबित होगी, किसी भी तेज़ गेंदबाज़ के लिए प्रोटियाज़, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड दौरे पर क्रिकेट जीवन की शुरुआत करना सपने से कम नहीं होता। इन सबके बावजूद बुमराह के लिए अंतिम-11 में सीधे प्रवेश करना आसान नहीं होगा, क्योंकि टीम इंडिया की गेंदबाज़ी अभी बिल्कुल सटीक नज़र आ रही है। भुवनेश्वर कुमार और मोहम्मद शमी के साथ साथ इशांत शर्मा ने श्रीलंका के ख़िलाफ़ शानदार प्रदर्शन किया है। लिहाज़ा टीम मैनेजमेंट इस तिकड़ी को ही केपटाउन टेस्ट में उतारने पर विचार कर सकता है, और फिर टीम में तेज़ गेंदबाज़ उमेश यादव भी मौजूद हैं। वहीं ऑलराउंडर और आईपीएल में बुमराह की ही टीम मुंबई इंडियंस के उनके जोड़ीदार हार्दिक पांड्या भी हैं, जो कोहली के लिए तीसरे या चौथे तेज़ गेंदबाज़ की भूमिका निभाएंगे। ऐसे में अंतिम-11 में जगह बनाना बुमराह के लिए मुश्किल नज़र आ रहा है।

लेकिन कैप्टेन कूल एम एस धोनी की ही तरह टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली भी अपने कुछ फ़ैसलों पर सभी को हैरान कर देते हैं। हो सकता है प्रोटियाज़ टीम को भी हैरत में डालने के लिए वह जसप्रीत बुमराह का टेस्ट डेब्यू केपटाउन में ही करा दें। भारतीय टीम अफ़्रीका के लिए 27 दिसंबर को ही यहां से रवाना होगी, और पहला टेस्ट मैच 5 जनवरी को खेला जाना है। लिहाज़ा तैयारियों का भारतीय बल्लेबाज़ों के पास कम ही मौक़ा होगा जिसकी चिंता विराट कोहली ज़ाहिर कर चुके हैं। हालांकि केपटाउन टेस्ट से पहले टीम इंडिया एक दो दिवसीय अभ्यास मैच ज़रूर खेलेगी। लिहाज़ा प्रोटियाज़ ये ज़रूर चाहेंगे कि भारत को केपटाउन में हरी पिच देकर परेशान किया जाए, जो मेज़बान टीम के इस दांव को अगर कोई उल्टा कर सकता है तो वह बुमराह ही हैं। अफ़्रीकी बल्लेबाज़ों ने जसप्रीत बुमराह को ज़्यादा नहीं खेला है, बुमराह ने दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ सिर्फ एक अंतर्राष्ट्रीय मुक़ाबला खेला है जो इसी साल चैंपियंस ट्रॉफ़ी के दौरान ओवल में हुआ था। उस मैच में बुमराह का प्रदर्शन शानदार रहा था और उन्होंने 8 ओवर में सिर्फ़ 28 रन देकर 2 विकेट हासिल किए थे। लिहाज़ा कोहली चाहेंगे कि बुमराह के असामान्य गेंदबाज़ी एक्शन का फ़ायदा उठाते हुए प्रोटियाज़ बल्लेबाज़ों को छकाया जाए।

हालांकि कुछ क्रिकेट पंडित और क्रिकेट एक्सपर्ट जसप्रीत बुमराह को टेस्ट में शामिल किए जाने के इस फ़ैसले को जल्दबाज़ी क़रार दे रहे हैं। उनका मानना है कि बुमराह ने सफ़ेद गेंदों से तो कमाल का प्रदर्शन किया है लेकिन लाल गेंदों का इस्तेमाल उन्होंने अर्से से नहीं किया है। रणजी के इस सीज़न में भी अब तक जसप्रीत बुमराह गुजरात के लिए किसी मैच में नहीं खेले हैं। सफ़ेद पोशाक और लाल गेंद से बुमराह ने अपना आख़िरी प्रथम श्रेणी मुक़ाबला इस साल की शुरुआत यानी जनवरी में झारखंड के ख़िलाफ़ खेला था, जहां उनहोंने रणजी सेमीफ़ाइनल में क़हर बरपाती गेंदबाज़ी की थी और दूसरी पारी में 29 रन देकर 6 विकेट झटकते हुए गुजरात को जीत दिलाई थी और मैन ऑफ़ द मैच भी रहे थे।

अगर उनके प्रथम श्रेणी के आंकड़ों पर नज़र डालें तो वह काफ़ी प्रभावित करने वाले हैं, बुमराह ने अब तक 26 मैचों में 25.33 की बेहतरीन गेंदबाज़ी औसत से 89 विकेट हासिल किए हैं, जिनमें 6 बार पारी में 5 विकेट शामिल हैं। भारतीय परिस्थिति में किसी भी तेज़ गेंदबाज़ के लिए ऐसा प्रदर्शन उसकी प्रतिभा की झलक दर्शाता है।

लिहाज़ा मेरी नज़र में बुमराह को टेस्ट डेब्यू कराने के लिए कोहली को इंतज़ार नहीं कराना चाहिए, बल्कि पहले ही टेस्ट में एक सरप्राइज़ वीपन के तौर पर उनका इस्तेमाल भारत को प्रोटियाज़ पर बढ़त दिला सकता है। वैसे भी जसप्रीत बुमराह जैसे इनफ़ॉर्म गेंदबाज़ को अंतिम-11 की जगह बेंच पर बैठाना कहीं से तर्कसंगत नहीं लगता।

पाकिस्तान में टी20 खेलने गई जिस टीम ने खेल भावना की मिसाल क़ायम की थी, उसी श्रीलंका ने टेस्ट क्रिकेट को कर दिया शर्मसार

2009 में पाकिस्तान दौरे पर गई जिस टीम पर आतंकवादी हमला हुआ था, वह कोई और नहीं बल्कि श्रीलंका थी। वही श्रीलंका जो कुछ महीने पहले एक बार फिर उसी देश में जाकर टी20 मैच खेल कर आई, और पाकिस्तान में क्रिकेट बहाल करने के लिए क़दम आगे बढ़ाया। श्रीलंका की इस ज़िंदादिली को हर किसी ने सराहा था, और उन्होंने दूसरे देशों को भी पाकिस्तान में खेलने के लिए प्रेरित किया था। क्रिकेट भावना क्या होती है, ये बात श्रीलंका ने तब साबित भी की थी, लेकिन दो महीनों के अंदर ही भारत का ये पड़ोसी देश खेल भावना को इस तरह तार तार कर देगा शायद ही किसी ने सोचा होगा।

श्रीलंकाई टीम इस समय भारत दौरे पर है, जहां उनके लिए परिस्थितियां बेहद कठिन हैं। कोलकाता में तो श्रीलंका को बारिश और ख़राब रोशनी ने बचा लिया, पर नागपुर में विराट कोहली के दोहरे शतक और आर अश्विन की घातक गेंदबाज़ी के सामने साढ़े तीन दिन में ही इस टीम ने बिना लड़े घुटने टेक दिए। दिल्ली में भी विराट कोहली के प्राक्रम की मार इस टीम पर फिर पड़ी, नतीजा ये हुआ कि दूसरे दिन के पहले ही सत्र में टीम इंडिया ने 500 का भी आंकड़ा छू लिया और कप्तान कोहली एक बार फिर अपना दोहरा शतक पूरा कर चुके थे और इस बार अपने पहले तिहरे शतक के लिए भी सेट लग रहे थे।

श्रीलंकाई गेंदबाज़ों की हालत दयनीय दिख रही थी, वह हताश थे और कोई भी रणनीति भारतीय बल्लेबाज़ों को ख़ास तौर से कोहली पर कारगर साबित नहीं हो रही थी। लेकिन लंच के ठीक बाद जो श्रीलंका ने किया उसने क्रिकेट जगत को न सिर्फ़ हैरान किया बल्कि टेस्ट क्रिकेट का ग़लत प्रचार भी किया और श्रीलंकाई क्रिकेट को भी शर्मसार कर दिया। दरअसल, श्रीलंकाई टीम लंच के बाद चेहरे पर मास्क लगाकर मैदान में उतरी और उन्हें देखकर सभी हैरान थे। उनका कहना था प्रदूषण की वजह से वे सहली से सांस नहीं ले पा रहे हैं, उन्होंने अंपायर से शिक़ायत की और फिर खेल क़रीब 15 मिनट के लिए रोक दिया गया। श्रीलंकाई कप्तान दिनेश चांडीमल तो मैदान से बाहर ही चले गए थे, फिर अंपायरों ने मैच रेफ़री डेविड बून से बात की, और डॉक्टरों से भी विचार विमर्श किया गया। जिसके बाद खेल को रोकने की कोई ठोस वजह न अंपायरों को लगी और न ही मैच रेफ़री को, भारतीय बल्लेबाज़ों को भी कोई परेशानी नहीं थी।

Umpire and chandimal

लिहाज़ा अंपायर ने मैच फिर शुरू किया, इस ख़लल का नतीजा ये हुआ कि आर अश्विन की एकाग्रता भंग हुई और वह कैच आउट हो गए। इसके बाद क़रीब क़रीब हर एक या दो गेंदों के बीच में श्रीलंकाई कप्तान चांडीमल अंपायर से अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते जा रहे थे और न खेलने की बात कर रहे थे। जिसका असर विराट कोहली पर भी साफ़ दिख रहा था और वह ग़ुस्से में थे, एक बार तो उन्होंने श्रीलंकाई खिलाड़ियों के इस रवैये से तंग आकर अपना बल्ला भी ज़मीन पर फेंक दिया। श्रीलंकाई खिलाड़ी एक एक कर मैदान से बाहर जा रहे थे, और हर गेंद पर अंपायर से शिक़ायत कर रहे चांडीमल को देखकर कोहली की लय भी बिगड़ गई और वह भी आउट हो गए। 243 रनों पर आउट होने वाले कोहली इससे पहले तिहरे शतक की ओर जाते दिख रहे थे, कोहली के आउट होने के बाद भी चांडीमल का ये रवैया जारी रहा।

हद तो तब हो गई जब श्रीलंकाई कप्तान दिनेश चांडीमल अंपायरों से ये कहने लगे कि अब उनके पास 11 खिलाड़ी भी नहीं हैं जो मैदान पर आना चाहें, इसलिए वह सपोर्ट स्टाफ़ को जर्सी पहनाकर मैदान में बुलाना चाह रहे थे। इस पर टीम इंडिया के कोच रवि शास्त्री भी मैदान में आकर अंपायर से बात करने लगे और श्रीलंकाई कोच निक पोथा भी सपोर्ट स्टाफ़ को मैदान में उतारने के लिए अंपायरों पर दबाव डाल रहे थे। ये सब देखकर भारतीय कप्तान को काफ़ी ग़ुस्सा आ ग्या और उन्होंने पारी घोषित कर दी, ताकि श्रीलंकाई खिलाड़ियों को मैदान में रहने की परेशानी ही न हो। इस दौरान मैदान से लौटते हुए कप्तान चांडीमल और दूसरे खिलाड़ियों के चेहरे पर हंसी साफ़ देखी जा रही थी, जो शायद अपनी इस रणनीति की सफलता को दिखाना चाह रहे थे।

HANSTE HUYE

पूरी दुनिया ने मास्क के पीछे ढकी एक ओछी रणनीति को साफ़ देखा, जिसने क्रिकेट भावना को शर्मसार किया। सवाल ये नहीं कि दिल्ली में स्मॉग था या नहीं ? सवाल ये भी नहीं कि क्या सिर्फ़ परेशानी श्रीलंकाई खिलाड़ियों को हो रही थी ? बल्कि सबसे बड़ा सवाल ये था कि सुबह के दो घंटे ज़्यादा धुंध थी, जबकि लंच के बाद 12 बजे के दौरान धूप भी खिल आई थी और धुंध भी कम होती जा रही थी। तो फिर श्रीलंकाई खिलाड़ियों ने ऐसा क्यों क्या ? और जब एक बार मैच रेफ़री या अंपायर ने हालात खेल के मुताबिक़ समझे, तो फिर इस तरह से बार बार हर गेंद पर उन्हें न खेलने की बात करना और मैदान से बाहर जाने के लिए कहना जायज़ था ?

अगर श्रीलंका ने ऐसा सिर्फ़ विराट कोहली और भारत को एक विशाल स्कोर से वंचित करन के लिए किया, तो फिर खेल भावना के साथ ये बड़ा खिलवाड़ है। मेरी नज़र में आईसीसी को इसे गंभीरता से लेना चाहिए और बीसीसीआई को भी इसकी शिक़ायत आईसीसी से करनी चाहिए। क्योंकि दिल्ली में जो हुआ वह सिर्फ़ श्रीलंकाई क्रिकेट की गिरती साख पर एक और बट्टा नहीं था बल्कि टेस्ट क्रिकेट के प्रचार पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।

हज़रत फ़ातिमा और मरियम को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शन के पीछे का असली सच !

भारत के हर शहरों में आज कोई न कोई संगठन देश के एक बड़े और प्रतिष्ठित हिन्दी मीडिया के एंकर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहा है। कोई आजतक के एंकर रोहित सरदाना के सिर की क़ीमत लगा रहा है तो कोई उन्हें सलाख़ों के पीछे डालने की मांग कर रहा है। पर क्या ऐसा करना सही है ? क्या इसके असर के बारे में किसी ने सोचा है ?

सड़कों पर जुलूस निकालना और अपनी आवाज़ बुलंद करना, इसकी इजाज़त बेशक हमारे संविधान ने दी है लेकिन एक हद तक। बॉलीवुड फ़िल्म पद्मावती को लेकर भी कुछ इसी तरह की तस्वीर नज़र आई थी जब फ़िल्म की अदाकारा दीपिका पादुकोण और निर्देशक संजय लीला भंसाली को जान से मारने के एवज़ में कर्णी सेना ने 1 करोड़ का इनाम रखा। आख़िर इस लोकतांत्रिक देश में अपनी आज़ादी का फ़ायदा क्या हम किसी की जान की क़ीमत लगाकर कर सकते हैं ? हमारी इस तरह की हरकतों को आज पूरी दुनिया देख रही है, और आप ख़ुश हैं कि ऐसा करने से चैनल्स और अख़बारों में आपकी तस्वीर आ गई।

ज़रा ये सोचिए कि तेज़ी से विकसित हो रहे हमारे देश की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्या छवि सामने आएगी। चलिए छोड़िए देश की बात से पहले हम उन कट्टरपंतियों से ही सवाल पूछते हैं कि क्या मां दुर्गा, जनाबे मरियम या हज़रत फ़ातिमा की रुसवाई इससे नहीं हो रही ? उदाहरण से समझिए जो शब्द रोहित सरदाना ने बोला था वह आज पूरी दुनिया के सामने है,  जो नहीं भी जान रहे हैं वह ये प्रोटेस्ट देख और सुनकर हज़रत फ़ातिमा के लिए कहा गया वह जुमला सुन रहे हैं। मां दुर्गा के लिए इस्तेमाल किया गया शब्द बार बार देख रहे हैं, किसकी रुसवाई हो रही है ?? क्या फ़ातिमा और मरियम की आत्मा आज ये देख कर और सुनकर ख़ुश हो रही होगी ?? जितनी निंदा करना है करिए, हर ग़लत काम की निंदा करनी भी चाहिए,लेकिन अभी इस विरोध प्रदर्शन से क्या हो रहा है ?

आपके इस विरोध प्रदर्शन का फ़ायदा राजनीतिक पार्टियां और संगठन उठा रहे हैं, रोहित सरदाना को समर्थन करते हुए अपनी सियासी रोटी आपकी ही इस आक्रोषित आंच पर सेंक रहे हैं। अब इस पूरे प्रकरण को सियासी एंगल से समझिए, राजनेताओं ने पहले पद्मावती के ज़रिए हिन्दु और मुसलमान के बीच तफ़रका फैलाने की कोशिश की थी, और जब वहां नाकाम रहे तो रोहित सरदाना को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया। सियासत के अगले पियादे जाने अनजाने में अब आप बन रहे हैं, जिसका सीधा असर गुजरात चुनाव में पड़ सकता है।

हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दूरी बनाते हुए वोट पोलाराइज़ेशन के लिए कोई न कोई मुद्दा लगातार उठाया जा रहा है। हज़रत फ़ातिमा और मरियम को लेकर रोहित सरदाना का जुमला, मां दुर्गा के नाम से पहले एक आपत्तिजनक शब्द लगाकर बनी एक दक्षिण भारतीय फ़िल्म, और हिन्दी फ़िल्म पद्मावती में इतिहास के साथ छेड़छाड़ के आरोपों को लेकर सड़कों पर उतरना और प्रोटेस्ट करने से कैसे हमें कुछ नहीं मिल रहा, बल्कि किसी चैनल की टीआरपी औपर शो हिट हो रहा है तो कोई देश का हीरो बनता जा रहा है।

विरोध प्रदर्शन के नाम पर आप सियासतदाओं के जाल में फँस रहे हैं और एक राजनीतिक पार्टी की महात्वाकांक्षा को जाने अनजाने में पूरा कर रहे हैं। कर्णी सेना हो या रोहित सरदाना ये बस एक पियादा हैं जिन्हें प्लानिंग के साथ उतारा गया और हम उस प्लानिंग को क़ामयाब कर रहे हैं। अगर सड़कों पर उतरना ही है तो मां दुर्गा, हज़रत फ़ातिमा और जनाहे मरियम के अपमान का अलग अलग नहीं बल्कि एक साथ आवाज़ उठाइए, ताकि फिर सियासत करने वाले सियासतदाओं के मुँह पर तमाचा पड़े और पूरी दुनिया में इंसानियत के साथ साथ हिंदुस्तानियत का संदेश भी जाए। क्योंकि गीता हो या कुरान या हो बाइबल, सभी धर्म ग्रंथों में भी इंसानियत और जहां आप रहते हैं उस देश को सर्वोच्च बताया गया है। सड़कों पर उतरिए, अपनी आवाज़ बुलंद करिए लेकिन इंसानियत और शांति के लिए न कि किसी दीपिका, रोहित या संजय के सिर के लिए।

क्या महेंद्र सिंह धोनी के लिए अब टेस्ट के बाद टी20 को भी अलविदा कहने का समय आ गया है ?

सचिन तेंदुलकर के बाद भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे लोकप्रिय और चर्चित महेंद्र सिंह धोनी के लिए क्रिकेट का सबसे छोटा फ़ॉर्मेट बेहद लंबा और मुश्किल भरा होता दिख रहा है। सबसे सफलतम कप्तानों में शुमार, टीम इंडिया को 2 वर्ल्डकप और 1 आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफ़ी जिताने वाले धोनी और उनके टी20 के प्रदर्शन को लेकर लगातार आवाज़ें बुलंद हैं।

भले ही धोनी के फ़ैंस बिना माही के टी20 देखने की कल्पना भी न कर सकते हों, लेकिन क्रिकेट पंडितों की नज़र में धोनी अब इस फ़ॉर्मेट को सूट नहीं करते। जी हां, सही पढ़ा आपने उस फ़ॉर्मेट के बारे में ऐसा कहा जा रहा जो कभी धोनी के लिए ही मानो बना था। टी20 से ही धोनी सुर्ख़ियों में आए थे, जब टीम इंडिया के कई बड़े सितारों ने क्रिकेट के इस फ़टाफ़ट फ़ॉर्मेट से अपना नाम वापस ले लिया था तो बस एक ही नाम सभी के ज़ेहन में था और वह थे महेंद्र सिंह धोनी। धोनी पर चयनकर्ताओं का विश्वास तब और भी खरा उतरा जब 2007 टी20 वर्ल्डकप में रांची के इस राजकुमार ने देश के सिर चैंपियन का ताज पहना दिया।

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ये तो बस शुरुआत थी, इसके बाद जो हुआ वह इतिहास के सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। लेकिन ज़रा देखिए इसे ही कहते हैं क़िस्मत का खेल, आज उसी धोनी को टी20 में फ़िट नहीं माना जा रहा, क्रिकेट पंडितों का मानना है कि 36 वर्षीय इस विकेटकीपर बल्लेबाज़ पर अब उम्र इस फ़ॉर्मेट में हावी हो रही है। टीम इंडिया के पूर्व टेस्ट बल्लेबाज़ संजय मांजरेकर ने तो यहां तक कह दिया कि ‘’धोनी पहले 1 ओवर में 4 छक्के मार लिया करते थे, लेकिन अब उनसे 1 ही लगता है’’। हालांकि मांजरेकर शायद अपने आंकड़ों को भूल गए जब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में उन्हें एक छक्का लगाने के लिए क़रीब 127 ओवर बल्लेबाज़ी करनी होती थी।

मुख्य चयनकर्ता एम एस के प्रसाद ने भी ये कहकर और भी इन बातों को बल दे दिया था कि धोनी को टीम में बने रहने के लिए प्रदर्शन करना ज़रूरी है। हालांकि वनडे क्रिकेट में आज भी धोनी फ़िनिशर के साथ साथ एक संकटोचक की भूमिका में भी मौजूद हैं। जिसका उदाहरण वेस्टइंडीज़ में भी देखने को मिला और हाल ही में श्रीलंका के ख़िलाफ़ उन्हीं के घर में हारी हुई बाज़ी धोनी ने टीम इंडिया की झोली में डाल दी। विकेट के पीछे तो धोनी की चपलता अंडर-19 के विकेटकीपरों के लिए भी हैरान करने वाली है, सेकंड के भी छोटे भाग में पलक झपकते ही धोनी बल्लेबाज़ों को पैवेलियन का रास्ता दिखाने में माहिर हैं।

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इन सबके अलावा मैदान पर जब भी भारत पर संकट आता है, और विराट कोहली परेशान दिखते हैं तो धोनी का कैप्टेन कूल वाला पुराना अंदाज़ आज भी भारत को हार के संकट से निकालते हुए जीत की मंज़िल तक पहुंचा देता है। यही वजह है कि हार्दिक पांड्या से लेकर भुवनेश्वर कुमार और जसप्रीत बुमराह जैसे नए सुपर स्टार धोनी को ही इसका श्रेय देते हैं। विराट कोहली भी धोनी के क़ायल हैं और उनकी नज़र में वह 2019 वर्ल्डकप में टीम इंडिया को चैंपियन बनाने में एक बड़ा किरदार निभाएंगे।

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यानी इसमें कोई शक नहीं है कि विकेट के पीछे से लेकर सामने तक वनडे में धोनी का कोई सानी नहीं। लेकिन टी20 में उनका प्रदर्शन आलोचकों को मौक़ा ज़रूर दे रहा है, इसकी वजह है कभी शुरुआत से नंबर-5 गियर पर पारी शुरू करने वाले धोनी आज धीरे धीरे पारी तेज़ करते हैं। वनडे में तो धोनी का ये अंदाज़ फ़िट नहीं बल्कि पर्फ़ेक्ट है, पर फ़टाफ़ट क्रिकेट में शायद वह रनों की रफ़्तार से पीछे रह जा रहे हैं। धोनी के लिए दबाव की स्थिति तब और भी बनती जा रही है जब ऋषभ पंत और संजू सैसमन जैसे विस्फोटक विकेटकीपर बल्लेबाज़ घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। क्रिकेट पंडित भी मानते हैं कि धोनी को टी20 में इन युवाओं के लिए जगह छोड़ देनी चाहिए।

हालांकि क्रिकेट और ख़ुद को धोनी से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता, टेस्ट क्रिकेट में भी माही ने अचानक संन्यास लेकर सभी को चौंका दिया था। सीमित ओवर की कप्तानी छोड़ने का फ़ैसला भी उन्होंने एक झटके में कर डाला था, ऐसे में अगर टी20 से भी धोनी जल्द ही संन्यास ले लें तो किसी को हैरानी नहीं होगी। बल्कि कई क्रिकेट पंडितों की नज़र तो नागपुर टेस्ट के दौरान टीम इंडिया के श्रीलंका के ख़िलाफ़ होने वाले सीमित ओवर सीरीज़ के चयन पर लगी थी। जहां चयनकर्ताओं को वनडे के साथ साथ टी20 और दक्षिण अफ़्रीका दौरे के लिए टेस्ट टीम का एलान करना था। लेकिन किसी कारणवश चयनकर्ताओं ने वनडे टीम का ही एलान किया, जबकि टी20 और प्रोटियाज़ दौरे के लिए टेस्ट टीम का चयन अब दिल्ली टेस्ट के दौरान किया जाएगा।

इस विलंब की वजह को लेकर तो बीसीसीआई ने कुछ नहीं कहा, लेकिन इसकी टाइमिंग भारतीय क्रिकेट के एक नए दौर की तरफ़ इशारा कर रही है। और इसे माही से बेहतर कोई नहीं समझ सकता, जिस तरह मैदान पर उनकी छठी इंद्रियां काम करती हैं वैसे ही मैदान से बाहर भी माही का दिमाग़ हर चीज़ के लिए एक या दो नहीं तीन-तीन प्लानिंग तैयार रखता है। तो बस हम और आप दिल्ली टेस्ट का इंतज़ार करते हैं, जहां इस बात पर मुहर लग जाएगी कि क्रिकेट के सबसे छोटे फ़ॉर्मेट में माही का हैलिकॉप्टर शॉट फिर दिखेगा या नहीं ? हो तो ये भी सकता है कि हैलिकॉप्टर की तरह धोनी भी मैदान में उतरे बग़ैर क्रिकेट के इस सबसे छोटे फ़ॉर्मेट से दूर चले जाएं, जैसे उन्होंने क्रिकेट के सबसे बड़े प्रारुप के साथ किया था।

हम और आप बस इंतज़ार और अंदाज़ा ही लगा सकते हैं क्योंकि जो होनी को अनहोनी और अनहोनी को होनी कर दें, वही हैं महेंद्र सिंह धोनी।

क्या अजिंक्य रहाणे का ख़राब फ़ॉर्म विराट कोहली और चयनकर्ताओं को कोई बड़ा फ़ैसला लेने पर मजबूर कर रहा है ?

वक़्त कभी किसी का एक जैसा नहीं होता, इस कथन को अजिंक्य रहाणे पूरी तरह सही साबित करते हुए नज़र आ रहे हैं। टेस्ट में टीम इंडिया के उप-कप्तान और राहुल द्रविड़ के उत्तराधिकारी के उपनाम से नवाज़े गए दाएं हाथ के बल्लेबाज़ अजिंक्य रहाणे का फ़ॉर्म पिछले कुछ समय से चिंता का सबब बना हुआ है। मुंबई के रहने वाले इस 29 वर्षीय मध्यक्रम के बल्लेबाज़ की प्रतिभा पर किसी को कोई संदेह नहीं है। आधुनिक टीम इंडिया की बैटिंग लाइन अप में रहाणे ने कई बेहतरीन पारियां खेली हैं और टीम की रीढ़ बने हैं। रहाणे की निरंतरता और संकटमोचक बनने का इनाम टीम मैनेजमेंट ने उन्हें भारतीय टेस्ट टीम का उप-कप्तान बनाकर दिया।

लेकिन ऐसा लगता है मानो रहाणे के लिए इनाम उनकी बल्लेबाज़ी और फ़ॉर्म के आड़े आ गया। पिछले एक साल से कोहली के सहायक बनने के बाद रहाणे की बल्लेबाज़ी में अचानक गिरावट देखने को मिली है। जिसकी गवाही दे रहे हैं अजिंक्य रहाणे के पिछले नवंबर से किए गए प्रदर्शन। इस एक साल में टीम इंडिया के लिए नंबर-5 पर खेलने वाले रहाणे ने 11 मैच खेले हैं जिसमें 17 पारियों में उनके बल्ले से महज़ 543 रन आए हैं। इस दौरान रहाणे की बल्लेबाज़ी औसत भी बेहद साधारण 36.20 की रही और उन्होंने केवल एक शतक और 3 अर्धशतक बनाया। रहाणे जैसे लाजवाब बल्लेबाज़ के लिए ये आंकड़े बेहद मामूली हैं।

Australia v India - 4th Test: Day 3

श्रीलंका के ख़िलाफ़ मौजूदा सीरीज़ में तो रहाणे अब तक खेली 3 पारियों में 4 रन से आगे ही नहीं जा पाए हैं, कोलकाता की हरी पिच पर उन्होंने पहली पारी में 4 रन बनाए जबकि दूसरी पारी में स्कोरर को परेशान करने की भी ज़हमत नहीं उठाई। तो वहीं नागपुर टेस्ट में जहाँ 4 बल्लेबाज़ों ने शतक लगाया, जिसमें विराट कोहली ने दोहरा शतक जड़ा तो वहीं रहाणे इस पिच पर भी 2 रन बनाकर आउट हो गए। इतना ही नहीं इस मैच में क़रीब एक साल बाद वापसी कर रहे रोहित शर्मा ने भी नाबाद 102 रनों की पारी खेलते हुए रहाणे पर एक मानसिक दबाव बना दिया।

England v India: 2nd Investec Test - Day One

 

भारत को अगले साल जनवरी में दक्षिण अफ़्रीका दौरे पर जाना है, जिसके लिए श्रीलंका के ख़िलाफ़ टेस्ट मैचों को कोहली और टीम मैनेजमेंट तैयारियों की तरह देख रही है। इस सीरीज़ में अच्छे प्रदर्शन का इनाम जहां प्रोटियाज़ दौरे के टिकट के तौर पर भी मिल सकता है, तो ख़राब प्रदर्शन टीम से पत्ता भी काट सकता है। रोहित शर्मा ने बेहतरीन पारी खेलते हुए चयनकर्ताओं पर एक दबाव ज़रूर बना दिया है कि अगर दक्षिण अफ़्रीका में टीम इंडिया 5 गेंदबाज़ों के साथ उतरी तो उस स्थिति में रोहित शर्मा या अजिंक्य रहाणे में से किसे तवज्जो दिया जाए ? वैसे भी अगर अजिंक्य रहाणे टेस्ट में कोहली के सहायक यानी उप-कप्तान हैं तो सीमित ओवर क्रिकेट में टीम इंडिया के वाइस कैप्टेन रोहित शर्मा हैं, यानी बल्लेबाज़ी से लेकर उप-कप्तानी तक में रहाणे का विकल्प रोहित के तौर पर तैयार है।

हालांकि, जो आंकड़े अभी रहाणे के ख़िलाफ़ जा रहे हैं वही आंकड़े दक्षिण अफ़्रीका दौरे में उन्हें एडवांटेज भी दे रहे हैं। एशियाई सरज़मीं से बाहर अजिंक्य रहाणे का रिकॉर्ड शानदार रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर दाएं हाथ के इस छोटे क़द के बल्लेबाज़ ने 17 मैचों की 29 पारियों में 54.66 की बेहतरीन औसत से 1312 रन बनाए हैं, जिनमें 4 शतक और 7 अर्धशतक शामिल हैं। इतना ही नहीं प्रोटियाज़ दौरे पर पिछली बार रहाणे ने कुछ अच्छी पारियां खेली थीं। दक्षिण अफ़्रीका में रहाणे ने 2 मैचों की 4 पारियों में 69.66 की बेमिसाल औसत से 209 रन बनाए हैं, जिसमें उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 96 रहा है। यानी भले ही घरेलू ज़मीन पर रहाणे का फ़ॉर्म उनके साथ न हो पर विदेशी सरज़मीं पर उनके आंकड़े और पूर्व में किया गया प्रदर्शन कोहली और चयनकर्ताओं को एक बार फिर रहाणे पर भरोसा रखने की हिदायत देता है। दक्षिण अफ़्रीका में होने वाले पहले टेस्ट में तो कम से कम अजिंक्य रहाणे टीम में बने रहेंगे इसमें शायद ही किसी को संदेह होना चाहिए।

अजिंक्य रहाणे की ख़ासियत है तेज़ और शॉर्ट पिच गेंदो के ख़िलाफ़ उनके ऑन द राइज़ ड्राइव और बैकफ़ुट कट शॉट, जो भारतीय उपमहाद्वीप की पिचों पर उन्हें रास नहीं आ रहा। कोहली भी जानते हैं कि अजिंक्य रहाणे प्रोटियाज़ दौरे पर कितनी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं, लिहाज़ा उनके फ़ॉर्म को लेकर वह ज़्यादा परेशान नहीं हैं। लेकिन रोहित शर्मा का सही समय पर टीम में वापसी करना और शतक जड़ना कोहली को ये ज़रूर सोचने पर मजबूर कर सकता है कि दक्षिण अफ़्रीका में 6 बल्लेबाज़ों के साथ उतरा जाए या 5 गेंदबाज़ों के साथ ? मेरी नज़र में नागपुर टेस्ट में रोहित के इस शतक ने रहाणे की जगह को फ़िलहाल कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया है, बल्कि 5 गेंदबाज़ों के साथ जाने के विकल्प पर सवालिया निशान लगा दिया है।

इस्लाम को समझना है तो ‘हाफ़िज़’ या ‘सैयद’ से नहीं… रसूल अल्लाह और इमाम हुसैन के किरदार से समझो !

इस्लाम और मुसलमान का नाम सुनते ही लोगों के ज़ेहन में अजीब और डरावने ख़्याल आ जाते हैं। मुसलमानों को देखकर भी आज लोग तरह तरह के क़यास लगा लेते हैं। अगर एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन या शॉपिंग मॉल में दाढ़ी रखे और सिर पर टोपी पहने शख़्स दिख जाता है तो पुलिस और सुरक्षा कर्मियों का भी ध्यान दूसरों की बनिस्बत उनपर पहले चला जाता है। आतंकवादी का नाम सुनते ही पहला ख़्याल मुसलमान का ही आता है। ऐसा क्यों है कभी आपने या हमने सोचा है ? आख़िर क्या वजह है कि मुसलमान के नाम पर उन्हें अच्छे और पॉश इलाकों में मकान मिलने में मुश्किलें होती हैं ? आख़िर क्या वजह है कि आपके (मुसलमान के) बचपन के दोस्त आपसे दूरी बनाने पर अमादा हो जाते हैं ? आख़िर क्या वजह है कि आपके पड़ोस में कोई मुसलमान परिवार आकर रहता है तो कई दिनों तक पुलिस के साथ साथ आप को भी उस पर शक़ होता है ?

ये कई ऐसे सवाल हैं जो आज के मुलमानों की ज़िंदगी में आम हो गए हैं। इसके जवाब तो कई हैं, कुछ साज़िशन राजनीतिक पार्टियां भी फैला रही हैं। सोशल मीडिया की टीम के ज़रिए बज़ापते ग़लत और इस्लाम को बदनाम करने के लिए मैसेज सर्कुलेट किए जा रहे हैं। और ये दोनों के लिए ही हो रहा है, कुछ मैसेजेज़ इस्लाम और मुसलमान के ख़िलाफ़ फैलाए जा रहे हैं तो कुछ हिन्दुओं के ख़िलाफ़, ताकि दोनों में तफ़रका हो और फिर सियासतदां अपनी कुर्सी को मज़बूत करते हुए कई सालों के लिए आराम कर सकें। लेकिन फिर सवाल ये भी है कि क्या हम तो उन्हें कहीं से मौक़ा नहीं दे रहे ? मैं इसी की तह में गया और कुछ जानकारों की बात पर भी ग़ौर किया जिसने कुछ सवाल हमारे (तथाकथित मुसलमानों) पर खड़े किए, तो कुछ सवाल दुनिया और समाज की सोच पर भी खड़े किए।

जो अब मैं लिखने जा रहा हूं उसे ज़रा ध्यान से पढ़िएगा और तवज्जो दीजिएगा, क्योंकि हम और आप जानते हैं कि जैसे इस्लाम को मानने वाला मुसलमान। क़ुरान-ए-पाक को पढ़ने वाला मुसलमान। नमाज़ पढ़ने वाला मुसलमान। रोज़ा रखने वाला मुसलमान। यानी जो मुसलमान करता है वह है इस्लाम। लिहाज़ा अगर मुसलमान ने बम फोड़ दिया तो हम सोचते हैं ऐसा इस्लाम में कहा गया होगा। अगर किसी मुसलमान ने चोरी कर ली तो हम कहेंगे इस्लाम में चोरी की छूट है। अगर कोई मुसलमान ने शराब पी लिया हो तो हम सोचेंगे इस्लाम में इजाज़त होगी। अगर कोई मुसलमान ने किसी से ज़बर्दस्ती निकाह कर लिया हो तो हम कहेंगे इस्लाम में इसकी गुंजाइश होगी। लेकिन क्या ऐसा है ? क्या एक मुसलमान अल्लाह के घर में जाकर बम फोड़े इसकी इजाज़त इस्लाम देगा ? मुसलमान होकर मुसलमान का क़त्ल करे, इसकी अनुमति इस्लाम देगा ? मुसलमान होकर बच्चों पर बम गिराए, क्या ये इस्लाम में लिखा है ?

आप चाहे इस्लाम से कितनी भी नफ़रत क्यों न करते हों इन आख़िरी तीन सवालों का जवाब न में ही होगा। तो अब आप सोच रहे होंगे, फिर ऐसा कैसे ? ऐसा इसलिए कि हमें और आपको अपना नज़रिया बदलना होगा। हम एक सैयद, सुलेमान, क़साब, अफ़ज़ल (तथाकथित मुसलमान इंसान) की हरकतों को देखकर इस्लाम को समझने और परिभाषित करने की बेवक़ूफ़ी कर जाते हैं। अगर इस्लाम या किसी भी धर्म को समझना है और जानना है तो किसी इंसान से नहीं बल्कि उनके देवताओं और पैग़म्बरों के किरदार से समझना चाहिए। क्योंकि अल्लाह ने उन्हें दूत बनाकर भेजा था, और हम या हमारे पूर्वजों ने उन्हें देखकर या समझकर ही उस धर्म का अनुपालन किया होगा।

मसलन अगर इस्लाम को समझना है तो (मुहम्मद साहब) रसूल अल्लाह के किरदार से समझो, जिन्होंने इस्लाम को ज़बर्दस्ती नहीं फैलाया था बल्कि अपने किरदार से दूसरों को इस तरह प्रेरित किया था कि दूसरे इस्लाम को मानने लगे थे। कई बार मैंने अपने लेखनी में इस वाक़्ये का उदाहरण दिया है लेकिन एक बार और समझाने के लिए दे रहा हूं। रसूल अल्लाह जब नमाज़ पढ़ने निकलते थे तो एक बूढ़ी औरत रोज़ाना उनपर कूड़ा फेक देती थी, लेकिन रुसूल अल्लाह कभी कुछ नहीं कहते और दोबारा साफ़ करते हुए और वज़ू बनाते हुए मस्जिद में जाते और नमाज़ पढ़ा करते थे। एक दिन ऐसा हुआ कि वह औरत नज़र नहीं आई और उनपर कूड़ा नहीं फेक। नमाज़ पढ़ने के बाद आस पास मौजूद लोगों से उन्होंने पूछा कि क्या बात है जो औरत मुझपर रोज़ाना कूड़ा फेकती थी आज नज़र नहीं आई। इस पर उन्हें पता चला कि उसकी तबीयत बहुत ख़राब है और वह चल नहीं पा रही इसलिए उसने कूड़ा नहीं फेका। रसूल अल्लाह ने उसका घर दरियाफ़्त किया और उसके पास जा पहुंचे, ये देखकर वह ज़ईफ़ा (बूढ़ी औरत) डर गई और सोचा कि आज जब मैं बीमार हूं तो रसूल अल्लाह बदला लेने आए ह। लेकिन रसूल अल्लाह ने कहा कि डरो मत मैं बदला लेने नहीं आया तुम्हारा ख़्याल पूछने आया हूं, कैसी हो अब तुम ? ये सुनकर उस बूढ़ी औरत के आंखों से आंसू आ गए और उसने फ़ौरन रसूल अल्लाह के किरदार को देखकर इस्लाम क़बूल लिया।

एक और उनकी ज़िंदगी से लिया हुआ उदाहरण बताता हूं आपको फिर आगे बढ़ता हूं, ज़ाहिर है काफ़ी लंबा लिखा ये लेख पढ़कर आप बोर भी हो रहे होंगे और सोच रहे होंगे कि सैयद की स्याही का रंग ख़त्म कैसे नहीं होता, बस थोड़ा और पढ़ लीजिए, और समझने की कोशिश कीजिए इस्लाम को और मुसलमान को।

हां तो दूसरा वाक़्या ये था कि एक गुमराह शख़्स मस्जिद में जा पहुंचा और वहां उसने पेशाब कर दिया। ये देखकर वहां मौजूद नमाज़ियों का ख़ून खौल गया और उसे पकड़कर मारने लगे, इतने में जब वहां रसूल पहुंचे तो उन्होंने उसे छुड़ाया और ख़ुद मस्जिद को धोने लगे। ये देखकर वहां मौजूद सारे लोगों ने और ख़ुद उस शख़्स ने भी उनसे पूछा कि आपने ऐसा क्यों किया, और जिसने पेशाब किया था वह भी अल्लाह के घर में उसे माफ़ क्यों कर दिया ? इस पर रसूल अल्लाह ने जवाब दिया, कि इस शख़्स की क्या ग़लती है, जब इसे पता ही नहीं कि अल्लाह क्या है तो उसका घर यानी मस्जिद के बारे में ये क्या समझ सकता है और जब ये नासमझ है तो फिर इसे सज़ा किस लिए ? ये सुनते ही वह शख़्स (जिसने पेशाब किया था) रसूल अल्लाह से अपनी ग़लती मांगने लगा और उनके इस किरदार को देखकर उसने भी इस्लाम क़बूल कर लिया।

अब ज़रा सोचिए अगर ये वाक़्ये हम या आप पर हों तो फिर हम क्या करेंगे या आज के मुसलमान क्या करेंगे ? यही फ़र्क़ है इस्लाम को सोचने में और समझने में, ये तो बस दो उदाहरण हैं ऐसे हज़ारों वाक़्ये हैं जिन्हें समझने वाले और जानने वाले को इस्लामिक कहते हैं, क्योंकि यही है इस्लाम। इस्लाम में कहीं ज़बर्दस्ती नहीं है, अल्लाह ने प्यार से और उसके किरदार से इस्लाम को क़बूलने की बात कही है, न कि उस तरह जैसे कई तथाकथित मुस्लिम शासकों ने इस्लाम क़बूल करवाया, वह बिल्कुल ग़लत और क्रूड़ था इसकी इजाज़त इस्लाम कतई नहीं देता। क़ुरान-ए-पाक में कहीं नहीं लिखा है क़त्ल करो, क़ुरान-ए-पाक में कहीं नहीं लिखा है कि ग़ैर मुस्लिम को मारो, क़ुरान-ए-पाक में कहीं नहीं लिखा है कि किसी से बदला लो। ये जो भी करता है और ख़ुद को मुसलमान कहता है तो वह मुसलमान नहीं जाहिल है।

अगर इस्लाम को समझना है तो रसूल अल्लाह के नवासे और इस्लाम को ज़िंदा रखने वाले इमाम हुसैन से समझो।
इमाम हुसैन के दिए संदेश को समझो जिन्होंने अपने साथ साथ 72 साथियों (महिला, जवान, बूढ़े और 6 महीने के बच्चे समेत) की शहादत सिर्फ़ इसलिए दी ताकि आने वाली दुनिया और लोग ये जान सकें कि इस्लाम क्या है ? उस वक़्त का क्रूड़ शासक यज़ीद चाहता था कि नमाज़ बंद कर दिया जाए, अल्लाह को न माना जाए, शराब की भट्टी खोली जाए, अय्याशी और रंगरेलियां मनाई जाए। चूंकि मोहम्मद साहब के परिवार की आख़िरी निशानी और इमाम-ए-वक़्त इमाम हुसैन थे और बिना उनको अपने साथ लिए उसकी मनोकामना पूरी नहीं हो सकती थी। लिहाज़ा उसने इमाम हुसैन के साथ डील तय करनी चाही और जब इमाम हुसैन ने इंकार कर दिया तो उसने जंग के लिए ललकारा।

इमाम हुसैन ने इस्लाम को बचाने के लिए हां तो कर दी लेकिन उन्हें पता था कि जंग से इस्लाम को नहीं बचाया जा सकता, वरना आने वाली दुनिया यही कहेगी ये दो राजाओं की लड़ाई थी, अल्लाह या इस्लाम की नहीं। लिहाज़ा सुपर पॉवर होते हुए भी इमाम हुसैन ने अपनी और 72 साथियों की क़ुर्बानी देते हुए ये साबित किया इस्लाम में बदला या ख़ून ख़राबा नहीं बल्कि बलिदान और इंसानियत के लिए जगह है।

अगर आप क़ुरान-ए-पाक सिर्फ़ पढ़ें नहीं समझें तो आपको ये पता चल जाएगा कि वतन की मुहब्बत और हिफ़ाज़त करने की अहमियत कितनी ज़्यादा है, अगर आपको वतन और वहां के लोगों से प्यार है तो आधा ईमान आपका ऐसे ही हो गया और बचा हुआ आधा आपको सच और शांति की राह से मिल जाएगा। और तब आप हो जाएंगे मुसल्लम इमान वाले यानी मुसलमान।

बम फोड़ने वाले, चोरी करने वाले, शराब पीने वाले मुसलमानों से आप इस्लाम नहीं सीख सकते, क्योंकि जो आंतक फैलाए वह काफ़िर है। जो क़त्ल करे वह काफ़िर है। और काफ़िर को अगर आप सज़ा दें तो वह जायज़ है, लेकिन आज के क़ाबिल लोग काफ़िर का मतलब ग़ैर मुस्लिम क़रार दे देते हैं और कहते हैं कि मुसलमान, हिन्दुओं (काफ़िरों) के दुश्मन हैं। अरे बेवक़ूफ़ों जिस तरह मुसल्लम+ईमान=मुसलमान होता है, यानी जिसके पास पूरा ईमान हो वही मुसलमान कहलाता है। ठीक वैसे ही क़ुफ्र करने वाला काफ़िर कहलाता है। कुफ़्र का मतलब होता है कोई भी ऐसा काम जिससे अल्लाह ख़ुश न हो, जैसे किसी को रोलाना, किसी का माल हड़प लेना, किसी का क़त्ल कर देना, किसी को डराना-धमकाना। तो ज़रा सोचिए कोई भी मुस्ललम ईमान वाला कुफ़्र करने वाले को ग़लत भी कहेगा और सज़ा भी देगा।

जिस तरह अगर यज़ीद काफ़िर था तो ज़बर्दस्ती इस्लाम क़बूल करवाने वाला शासक और मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाने वाले औरंगज़ेब जैसे शासक भी इस्लाम में काफ़िर ही कहलाएंगे। ठीक वैसे ही जैसे मौजूदा दौर में आतंकवादी, फिर चाहे वह अपने नाम के आगे इस्लामिक स्टेट लगा ले, या ख़ुद हाफ़िज़, बुरहानवानी या अफ़ज़ल कहलवाए। नाम जो भी हो ‘काफ़िर’ ही कहलाएग।

तो चलिए आज से हम और आप आतंकवादियों के धर्म को परिभाषित करने की बजाए उन्हें काफ़िर कहें, और वही उनकी पहचान बनाएं। क्योंकि इस्लाम को अगर समझना है तो इंसानों से नहीं बल्कि उसके किरदारों से समझें, इस्लाम एक धर्म का नाम बाद में है पहले एक किरदार का नाम है।

अंत में एक और बात, चूंकि मैं एक पत्रकार कहलाता हूं, तो इस लेख को अपने पेशे के उदाहरण के साथ ही क्यों न ख़त्म किया जाए। जैसे आज ख़ुद को पत्रकार कहने वाले बड़े बड़े चैनलों और अख़बारों में काम करने वाले पत्रकार भी अपने मक़सद से भटक कर किसी की पैरोकारिता कर रहे हैं, कोई उसे मजबूरी का नाम दे दे रहा है (एक बेहद क़रीबी बिल्कुल छोटे भाई जैसे तथाकथित पत्रकार ने मुझसे कहा कि जानते हुए भी कि मैं ग़लत कर रहा हूं, करना पड़ रहा है) तो कोई उसे अपने विचारों से जोड़ रहा है।

ठीक उसी तरह मुसलमान भी भटक गए हैं, लेकिन उन भटके हुए मुसलमानों से आप इस्लाम को परिभाषित मत कीजिए अगर इस्लाम को परिभाषित करना है तो क़ुरान-ए-पाक से कीजिए या रसूल अल्लाह या इमाम हुसैन जैसे किरदारों से कीजिए।

आख़िर में भटके हुए उन पत्रकारों को भी मेरा एक छोटा सा संदेश है कि अपनी क़लम की धार को देश को जोड़ने और शांति स्थापित करने में इस्तेमाल कीजिए। पैसों या मजबूरी का नाम देकर आपस में भाई को भाई से मत लड़ाइए, सियासतदाओं की नफ़रत की सियासत को अपने क़लम की स्याही से मत सींचिए।

वरना आप उस मुर्दे की तरह तो हो जाएंगे जो पानी में डूबता नहीं ऊपर की तरफ़ पानी की धार के साथ बहता हुआ चला जाता है, आप वह ज़िंदा इंसान बनिए जो तैरते हुए पानी की तेज़ धारओं को भी काटते हुए आगे बढ़ता है।

वंदे मातरम्… जय हिन्द… जय इस्लाम… या रसूल अल्लाह… या हुसैन…
#सैयदकीस्याहीसे