रोजर फ़ेडरर अब सिर्फ़ नामी शख़्सियत नहीं बल्कि सोच बन गए हैं !

क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर, तो F1 में माइकल शुमाकर, फ़ुटबॉल में अगर लियोनेल मेसी तो टेनिस में रोजर फ़ेडरर ये कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने सिर्फ़ शोहरत नहीं कमाई बल्कि उस खेल का ही पर्यायवाची शब्द बन गए। हो सकता है इनमें से कुछ नामों में आप में से कुछ लोग शायद मुझसे इत्तेफ़ाक न रखें या कहें कि ये नहीं वह होना चाहिए था। लेकिन मैंने उन दौर के खिलाड़ियों का नाम लिया है जब मेरी रगों में भी एक खिलाड़ी दौड़ता था और खेल और खिलाड़ियों को चाहने का नया नया जोश उफ़ान पर था।

भारत में पैदा होने की वजह से क्रिकेट मेरा भी पहला प्यार था और सचिन तेंदुलकर भी आप और कईयों की तरह मेरे सबकुछ थे। 2003 क्रिकेट वर्ल्डकप में सचिन का लाजवाब फ़ॉर्म भी याद है तो फ़ाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों धुनाई ने कुछ दिन के लिए मेरे सिर से क्रिकेट का भूत उतार दिया था। तब टेनिस मेरा दूसरा प्यार हो चुका था, और उस वक़्त स्विटज़रलैंड के युवा टेनिस खिलाड़ी का ख़ूब नाम हो रहा था। नाम था रोजर फ़ेडरर, मैं भी फ़ेडरर का जल्द ही फ़ैन हो गया था, रोजर ने पहली बार विंबलडन का ख़िताब अपने नाम किया था और तब ख़ूब सुर्ख़ियां बनी थीं कि ”ग्रांड स्लैम जीतने वाले पहले स्विस खिलाड़ी बने रोजर फ़ेडरर।” तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अपने देश को पहली बार कोई ग्रैंड स्लैम ख़िताब दिलाने वाला ये खिलाड़ी आने वाले कुछ सालों में टेनिस के सारे रिकॉर्ड्स अपने नाम करते हुए इस खेल पर राज करने लगेगा।

1998 में जूनियर टेनिस में क़दम रखने के साथ ही विंबलडन चैंपियन बन तहलका मचाने वाले रोजर फ़ेडरर के लिए ये तो बस एक शुरुआत थी। अगले 4 सालों तक यानी 2004, 2005, 2006 और 2007 में लगातार वह विंबलडन चैंपियन रहे। 5 सालों तक चैंपियन रहने के बाद छठे साल यानी 2008 में वह रनर अप रहे फिर 2009 में दोबारा ताज अपने सिर पर पहन लिया।

इन सालों में सिर्फ़ विंबलडन ही नहीं बल्कि सभी ग्रांड स्लैम (ऑस्ट्रेलियन ओपन, फ़्रेंच ओपन और यूएस ओपन) पर भी फ़ेडरर का राज होता गया। इस दौरान रोजर फ़ेडरर ने पुरुष टेनिस के सिंगल्स मुक़ाबलों में पीट संप्रास के सबसे ज़्यादा 13 ग्रैंड स्लैम को भी पीछे छोड़ दिया था। हालांकि फ़ेडरर ने बुरा दौर भी देखा 2012 में विंबलडन जीतने के बाद फ़ेडरर फिर कोई भी ग्रैंड स्लैम नहीं जीत पा रहे थे। कहा तो ये भी जाने लगा था कि अब फ़ेडरर का करियर ख़त्म होने के कगार पर है उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। कोई ये कहने लगा कि उनकी उम्र अब उनका साथ नहीं दे रही उनको अब टेनिस कोर्ट को अलविदा कह देना चाहिए।

आलोचकों की इन बातों ने जितना फ़ेडेरर को परेशान नहीं किया, उससे कहीं ज़्यादा चोट ने उन्हें परेशान किया। हार के बाद कई बार उनकी आंखों से निकले आंसू भी शायद यही कहते थे कि अब बहुत हुआ। 2002 से लेकर 2016 तक जिस खिलाड़ी की रैंकिंग कभी टॉप-10 के नीचे नहीं आई थी, जिस खिलाड़ी ने 302 हफ़्तों तक लगातार नंबर-1 की कुर्सी पर रहते हुए वर्ल्ड रिकॉर्ड बना डाला था। वह 2016 आते आते टॉप-10 से भी बाहर ह चुका था, हर तरफ़ से फ़ेडरर पर संन्यास का दबाव बढ़ता जा रहा था।

लेकिन फ़ेडरर ने भी मानो ठान लिया था कि अपने करियर का वह इस तरह अंत नहीं करेंगे, जज़्बा तो था पर बढ़ती उम्र और चोटिल शरीर उनका साथ नहीं दे रहे थे। पर बड़ा खिलाड़ी वही होता है जो विपरित परिस्थितियों में न सिर्फ़ वापसी करे बल्कि अपने खेल से दोबारा सभी का दिल जीत ले।

हार न मानने का फ़ैसला करने के बाद फ़ेडरर ने ख़ुद को टेनिस से कुछ समय के लिए दूर किया और अपनी फ़िट्नेस पर ध्यान देने लगे। कई टूर्नामेंट से बाहर रहना भी फ़ेडरर के संन्यास की अटकलों को बढ़ावा दे रहा था। लेकिन फ़ेडरर ने किसी मक़सद के साथ अपने आप को टेनिस कोर्ट से दूर रखा था, ये उसी उदाहरण की तरह था जैसे शेर शिकार करने से पहले कुछ क़दम पीछे जाता है और फिर वहां से अपने शिकार पर पूरी रफ़्तार और ताक़त के साथ झपट्टा मारता है।

फ़ेडरर भी कोर्ट से तो दूर थे लेकिन कोर्ट पर शानदार वापसी के लिए वह अपने आप को तैयार कर रहे थे। 2017 में फ़ेडरर ने कोर्ट पर वापसी का ऐलान करते हुए सभी को चौंका दिया, अब बारी थी साल के पहले ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट की जहां फ़ेडरर अपने करियर की सबसे ख़राब रैंकिंग के साथ 17वीं सीडेड खिलाड़ी के तौर पर शिरकत कर रहे थे। लेकिन रैंकिंग और सीड को फ़ेडेरर ने ठीक उसी तरह एक नंबर साबित कर दिया जैसे उनके लिए उम्र भी बस एक नंबर थी। फ़ेडरर ने एक के बाद एक शानदार जीत दर्ज करते हुए फ़ाइनल में एंट्री ले ली और वहां अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी राफ़ेल नडाल को हराकर 5 साल बाद किसी ग्रैंड स्लैम पर कब्ज़ा जमाया और साबित कर दिया था कि टेनिस और रोजर फ़ेडरर अभी भी साथ साथ हैं।

रोजर फ़ेडरर ने इसके बाद इसी साल इंडियन वेल्स और मियामी ओपन के भी चैंपियन बने और इस बात का सभी को अहसास करा दिया कि ऑस्ट्रेलियन ओपन में जीत कोई तुक्का नहीं थी। इसके बाद अपने शरीर और चोट को देखते हुए फ़ेडरर ने फ़्रेंच ओपन से अपना नाम वापस ले लिया था और कहा कि वह ग्रास और हार्ड कोर्ट पर ही खेलेंगे।

सभी की नज़रें अब विंबलडन पर थीं, जहां फ़ेडरर एक अलग अंदाज़ में खेलते हुए नज़र आए। लग रहा था मानो ये वही नौजवान है जिसने पहली बार 2003 में विंबलडन अपने नाम किया था। उनके सामने कोई भी विपक्षी हो फ़ेडरर के लिए जीत महज़ औपचारिकता बनती जा रही थी। अगले महीने की 8 तारीख़ को अपना 36वां बसंत पूरा करने वाले फ़ेडरर ने विंबलडन में वह कर दिया जो आज तक सिर्फ़ एक ही खिलाड़ी ने किया था और वह थे बजोर्न बोर्ग जिन्होंने 1976 में पूरे टूर्नामेंट में बिना कोई सेट गंवाए ख़िताब जीता था।

रोजर फ़ेडरर ने भी विंबलडन 2017 में एक भी सेट नहीं गंवाते हुए ख़िताबी मुक़ाबले में पहुंचे और फ़ाइनल में भी मैरिन सिलिक को सीधे सेटों में हराते हुए अपना 8वां विंबलडन और करियर का 19वां ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीत लिया। इस जीत के साथ ही फेडरर ने न सिर्फ़ अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया बल्कि उन्हें भी अपने खेल का दीवाना बना लिया। जीत के बाद फ़ेडरर ने जो कहा वह इस बात की तरफ़ इशारा कर रहा है कि उनमें अभी भी टेनिस बाक़ी है और वह खेलते रहेंगे। उन्होंने कहा, ‘’अगर मैं इसी तरह वापसी करते रहा तो फिर 6 महीने का ब्रेक ले लूंगा…।“

रोजर फ़ेडरर की इस वापसी को आप शानदार कहें, या ड्रीम कमबैक कहें या फिर उनका दूसरा जन्म कहा जाए। लेकिन मेरी नज़र में ये खिलाड़ी या फिर कोई शख़्सियत नहीं बल्कि टेनिस के पर्यायवाची बन चुके हैं जो अब सभी के लिए प्रेरणास्रोत से बढ़कर एक सोच हैं।

ज़हीर ख़ान-राहुल द्रविड़ के टीम इंडिया के साथ जुड़ने पर विराम लगाना रवि शास्त्री की जीत नहीं भारतीय क्रिकेट की हार है !

आख़िरकार वही हुआ जिसका अंदाज़ा हम सभी को था, रवि शास्त्री की मांगों के सामने बीसीसीआई को झुकना पड़ा और भरत अरुण के गेंदबाज़ी कोच पर मुहर लग ही गई। जिसकी औपचारिक घोषणा भी बस होने ही वाली है, श्रीलंका दौरे के साथ ही 54 वर्षीय भरत अरुण गेंदबाज़ी कोच के तौर पर अपनी दूसरी पारी शूरू करने जा रहे हैं।

रवि शास्त्री का समय और उनका भविष्य सुनहरे दौर में है, आप ही सोचिए जिसके लिए वक़्त की सुई और कैलेंडर की तारीख़ों को रोक और बढ़ा दिया जाता है वह कितना ख़ुशक़िस्मत होगा। रवि शास्त्री के लिए सब कुछ मानो उनके मुताबिक़ चल रहा है, पॉवर का एक छोटा सा नमूना तो उन्होंने दे ही दिया। ख़बरें ये भी हैं कि उन्हें एक मोटी रक़म भी मिलने वाली है, कोच के तौर पर टीम इंडिया की सेवा करने के लिए शास्त्री के साथ बीसीसीआई ने सालाना 7 से 7.5 करोड़ रुपये का क़रार किया है।

ख़ैर पॉवर और पैसों का खेल तो बीसीसीआई में कैसे चलता है ये हम सभी जानते हैं, लेकिन जिन्हें ये लग रहा है कि सौरव गांगुली के ख़िलाफ़ शास्त्री की ये पहली जीत है। उन्हें इसके लिए अभी थोड़ा इंतज़ार करना होगा, क्योंकि ये भले ही रवि शास्त्री की जीत या दबदबदा हो सकता है पर भारतीय क्रिकेट के लिए ये एक बड़ी हार है।
बीसीसीआई ने रवि शास्त्री के लिए जो फ़ैसला किया है, उसके बाद तो ऐसा लगता है कि उन्हें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट ‘कंन्फ़ूज़न’ बोर्ड कहा जाए तो शायद ग़लत नहीं होगा। ऐसा इसलिए कि पहले वह एक समिति बनाते हैं जिसमें भारतीय क्रिकेट के तीन बड़े दिग्ग्जों को शामिल किया जाता है। क्रिकेट एडवाइज़री कमिटी (CAC) यानी क्रिकेट सलाहकार समिति में सचिन रमेश तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीवएस लक्ष्मण शामिल हैं।

इन तीनों को इस मक़सद के साथ रखा गया है कि भारतीय क्रिकेट और उसके भविष्य के लिए ये शानदार सलाह दे सकें और फिर उसपर अमल करते हुए बीसीसीआई बेहतर फ़ैसले लेगी। इस समिति ने अपने पहले चरण में तो अनिल कुंबले को बतौर कोच रखने की सलाह दी जिसे बीसीसीआई ने स्वीकार किया। और फिर तमाम क्रिकेट जगत ने इसका स्वागत किया। एक बार लगा कि सचिन, सौरव और लक्ष्मण जैसे महान खिलाड़ियों की ये समिति भारतीय क्रिकेट की दिशा और दशा बदल देगी।

हालांकि कुंबले और कोहली के बीच में तालमेल न बैठ पाया और फिर एक साल के बाद ही नए कोच के लिए इस समिति ने रवि शास्त्री के नाम को आगे किया। कुंबले प्रकरण देखने के बाद दादा ने इस बार रवि शास्त्री की मदद के लिए रहुल द्रविड़ और ज़हीर ख़ान जैसे दिग्गजों को भी सलाहकार के तौर पर टीम इंडिया के साथ जोड़ा।

लेकिन शास्त्री को ये बात पसंद नहीं आई और उन्होंने ये कह कर ज़हीर और द्रविड़ के शामिल होने को चुनौती दे दी कि ये काम सलाहकार समिति का नहीं बल्कि एक कोच का है कि वह किसको सपोर्ट स्टाफ़ रखें और किसको नहीं। यानी दूसरे अल्फ़ाज़ों में कहें तो सलाहकार समिति के इस फ़ैसले को शास्त्री ने ख़ारिज कर दिया। इसकी वजह है उनके अंडर-19 के साथी भरत अरुण जिन्हें वे गेंदबाज़ी कोच के तौर पर जोड़ना चाह रहे थे और बीसीसीआई ने उनकी बात को मान भी लिया।

इतना ही नहीं बीसीसआई ने ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ के सलाहकार के तौर पर टीम इंडिया से जुड़ने के CAC के फ़ैसले पर फ़िलहाल रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के द्वारा गठित CoA ने ये कहा है कि 22 जुलाई को रवि शास्त्री से मिलने के बाद वह इसका फ़ैसला करेंगे कि ज़हीर ख़ान और राहुल द्रविड़ का रोल क्या होगा। ख़बरें ये भी हैं कि अगर वे (ज़हीर और द्रविड़) टीम के साथ जुड़े तब भी उनका इस्तेमाल कैसे और कब करना है इसका फ़ैसला भी शास्त्री करेंगे।

ऐसे में सवाल ये उठता है:
• इस सलाहकार समिति को बनाने का मक़सद क्या था ? जब उनके फ़ैसले और उनकी सलाह का कोई महत्व ही नहीं है तो फिर इस समिति को बनाया ही क्यों गया ?

• गेंदबाज़ी कोच की भूमिका अगर भरत अरुण निभाएंगे तो ज़हीर का क्या काम रह जाएगा ?

• बल्लेबाज़ी कोच के तौर पर अगर संजय बांगर ही फ़िट हैं तो फिर राहुल द्रविड़ का क्या रोल होगा ?

इन सवालों का जवाब न बीसीसीआई के पास है और न ही सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण समझ पा रहे हैं कि ये हो क्या रहा है। रवि शास्त्री को ज़रूरत से ज़्यादा समर्थन करना और उन्हें अधिकार देना न सिर्फ़ सौरव गांगुली या सचिन तेंदुलकर या लक्ष्मण के क़द का अपमान है बल्कि इतनी छूट टीम इंडिया के भविष्य के लिए ख़तरनाक है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए ग्रेग चैपल को भी कोच के तौर पर बीसीसीआई ने ज़रूरत से ज़्यादा आज़ादी और पॉवर दिए थे, जिसका इस्तेमाल उन्होंने उस समय पूर्व कप्तान सौरव गांगुली के ख़िलाफ़ ही किया था और ख़ामियाज़ा पूरी टीम को भुगतना पड़ा था।

एक बार फिर वक़्त ने करवट ली है और हम उसी दिशा में जा रहे हैं इत्तेफ़ाक देखिए इस बार भी विवाद कोच और सौरव गांगुली के बीच ही है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है तब दादा एक खिलाड़ी और कप्तान के तौर पर मैदान के अंदर थे और अब वह एक अधिकारी और पूर्व खिलाड़ी के तौर पर मैदान से बाहर हैं। लेकिन दादा और कोच की लड़ाई में जीत कोच की हो या दादा की, पर हार भारतीय क्रिकेट की ही हो रही है।

एम एस धोनी, ‘द अनटोल्ड स्टोरी’ माही के आलोचकों को भी बना सकती है प्रशंसक

महेंद्र सिंह धोनी, भारतीय क्रिकेट इतिहास के सफलतम कप्तानों में शुमार इस खिलाड़ी पर बनी बायोपिक एम एस धोनी, द अनटोल्ड स्टोरी शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई। धोनी की करिश्माई छवि किसी से छिपी नहीं है और इसी को भुनाने के मक़सद से निर्माता-निर्देशक नीरज पांडे ने धोनी की ज़िंदगी पर ये फ़िल्म बनाई।
हालांकि, बायोपिक में जिन बारीकियों का ध्यान रखना चाहिए, वहां नीरज पांडे से थोड़ी चूक हुई है। या फिर धोनी ने उनके साथ बैठकर ये तय किया होगा कि फ़िल्म किस चीज़ को कैसे और कितना दिखाना चाहिए। लेकिन फिर भी जिस अंदाज़ में धोनी की ज़िंदगी के अनछुए और अनसुने पहलुओं को नीरज पांडे ने दिखाने की कोशिश की है, वह लाजवाब है।

मसलन एक क्रिकेट प्रेमी ये तो जानता है कि धोनी ने कब और कैसे भारत का नाम रोशन किया है, लेकिन शायद ही उसने ये जाना था कि धोनी कभी रेलवे में टीसी भी रहे हैं, या धोनी को क्रिकेट में रूची नहीं थी, या साक्षी से पहले धोनी का प्यार कोई और था।

धोनी का नाम आते ही क्रिकेट प्रेमियों के ज़ेहन में 2011 विश्वकप क्रिकेट फ़ाइनल याद आ जाता है, जहां धोनी ने छक्के के साथ भारत को 28 साल बाद वर्ल्डकप चैंपियन बनाया था। फ़िल्म की शुरुआत भी वहीं से होती है, धोनी तभी के कोच गैरी कर्स्टन को कहते हैं कि अब बल्लेबाज़ी के लिए मैं जाउंगा, क्योंकि मुरलीधरण गेंदबाज़ी कर रहा है और युवराज उनके सामने असहज खेलते हैं।

फ़िल्म में ये सीन देखते ही दर्शकों में जोश भर जाता है, और मुंबई के वानखेड़े की तरह ही सिनेमा घरों में भी धोनी धोनी की गूंज सुनाई देने लगती है। इसके बाद फ़िल्म 30 साल पीछे जाती है जब रांची के अस्पताल में 7 जुलाई 1981 को महेंद्र सिंह धोनी का जन्म होता है। धोनी के पिता पान सिंह धोनी का किरदार अनुपम खेर ने बेहतरीन अंदाज़ में निभाया है। यहां से धोनी के क्रिकेट करियर के सफ़र की शुरुआत को बेहद संजीदगी से दिखाया जाता है। हर एक छोटी छोटी चीज़ों पर ध्यान दिया गया है, जिसमें नीरज पांडे माहिर हैं।

इस सफ़र के दौरान कई बातों के बारे में क्रिकेट प्रेमियों को जानकारी मिलती है जैसे कि धोनी को क्रिकेट खेलना पसंद नहीं था। वह एक गोलकीपर थे, स्कूल में विकेटकीपर की जगह ख़ाली रहती है इसलिए धोनी को इसके लिए चुना जाता है। धोनी का सबसे मशहूर ‘हेलिकॉप्टर शॉट’ उन्होंने अपने दोस्त संतोष से सीखा, जिसे उनका दोस्त ‘स्लैप शॉट’ कहता था। इसके बदले में धोनी ने संतोष को समोसे की पार्टी दी थी।

धोनी के किरदार को सुशांत सिंह राजपूत ने बेहद करीने से निभाया है, उनके शॉट्स देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई क्रिकेटर ही खेल रहा हो। सुशांत ने अपने करियर की सबसे बेहतरीन अदाकारी की है और इस रोल के साथ न्याय किया है। आमूमन ऐसा देखा जाता है कि बायोपिक में दर्शक या तो बोर होने लगते हैं या फिर फ़िल्म धीमी हो जाती है। लेकिन नीरज पांडे ने इस बात का ध्यान रखते हुए बीच बीच में कुछ ऐसे सीन डाले हैं जो दर्शकों को बांधे रखते हैं और उन्हें तालियां और सीटियां बजाने का मौक़ा भी देती हैं।

धोनी के परिवार की आर्थिक हालत बहुत ज्यादा अच्छी नहीं थी। एक ऐसे परिवार का मुखिया यही सोचता है कि उसका बेटा पढ़ लिख कर सरकारी नौकरी हासिल कर ले। पान सिंह धोनी भी यही चाहते थे और माही खेल में कुछ करना चाहता था। पिता खिलाफ नहीं थे, लेकिन एक आम पिता का डर उनके मन में मौजूद था। अपने पिता की खातिर धोनी रेलवे में टीसी की नौकरी करते हैं।

टीसी की नौकरी में धोनी के डिप्रेशन को अच्छे से दिखाया गया है जब वह पूरा दिन रेलवे प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हैं और शाम को मैदान में पसीना बहाते हैं। अपनी इस कुंठा को दूर करने के लिए धोनी टेनिस बॉल टूर्नामेंट भी खेलते हैं, और एक दिन टीसी की नौकरी को छोड़ देते हैं। अंडर-19 चयन से लेकर भारत-ए के लिए खेलने से पहले तक धोनी कैसे राजनीति का शिकार भी हुए हैं वह भी इस फ़िल्म में दिखाया गया है। दिलीप ट्रॉफ़ी का एक मैच धोनी कैसे सिर्फ़ इसलिए नहीं खेल पाए थे क्योंकि उन्हें इसकी जानकारी देर से मिली थी, उसे भी इस फ़िल्म में शानदार अंदाज़ में दिखाया गया है।

पहले हाफ़ तक फ़िल्म काफ़ी अच्छी रही है, दूसरे हाफ़ में थोड़ा मसाला भी डालने की कोशिश की गई है। कुछ सीन्स पचते नहीं हैं, जैसे भारतीय क्रिकेट टीम में आने के बाद फ्लाइट में सफ़र करते हुए धोनी के ठीक बग़ल में एक आम लड़की बैठ जाती है जबकि दूसरे क्रिकेटर्स कहीं और बैठे होते हैं। ये दिशा पटानी होती हैं, जो धोनी की पहली गर्लफ़्रेंड प्रियंका झा का किरदार निभा रही हैं जहां से धोनी और उनके बीच प्यार की शुरुआत होती है। हालांकि फ़िल्म में दिखाया गया है कि प्रियंका और उनकी मुलाक़ात 2005 में हुई थी और 2006 में प्रियंका की एक सड़क हादसे में मौत हो जाती है, जबकि ख़बरों की मानें तो प्रियंका और धोनी का प्यार उनके भारतीय क्रिकेट टीम में आने से बहुत पहले की बात है। और उनकी मौत 2002 में ही हो गई थी।
इसके बाद धोनी को दूसरा प्यार साक्षी से होता है, इस किरदार को किआरा आडवाणी ने निभाया है। उन्होंने भी इस भूमिका के साथ न्याय किया है।

भारतीय क्रिकेट प्रेमी और धोनी के फ़ैन्स को इस फ़िल्म से उम्मीद थी कि आख़िर ड्रेसिंग रूम के अंदर क्या होता होगा? धोनी और युवराज के बीच क्या सही मायनों में लड़ाई हुई थी ? धोनी किस तरह से बतौर कप्तान अपनी रणनीति बनाते थे? करोड़ों उम्मीद का तनाव ‘कैप्टन कूल’ किस तरह झेलते थे? अपने खिलाड़ियों के साथ किस तरह व्यवहार करते थे? उन्हें क्या टिप्स देते थे? सीनियर खिलाड़ियों को कैसे नियंत्रित करते थे? 90 टेस्ट खेलने के बाद उन्होंने अचानक ऑस्ट्रेलियाई दौरे के बीच में टेस्ट क्रिकेट को क्यों अलविदा कह दिया? क्या उन पर किसी किस्म का दबाव था?

लेकिन फ़ैन्स को इन सवालों के जवाब नहीं मिलते हैं। यहां तक कि फ़िल्म के टीज़र में बोले गए एक डायलोग को फ़िल्म से हटा दिया गया है। धोनी जब अपने पसंद की टीम चुनना चाहते हैं तो चयनकर्ता आपस में बात करते हुए कहते हैं कि आज ये उन्हें ही हटाना चाह रहा है जिन्होंने इसे आगे बढ़ाया था। लेकिन फ़िल्म में आपको ये डायलोग नहीं मिलेगा। साथ ही फ़िल्म में ये सस्पेंस बना रहता है कि धोनी कौन से तीन सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर करना चाहते थे, इसका भी जवाब नहीं मिल पाया।

एक और चीज़ जो हैरान करने वाली है वह ये कि धोनी के भाई नरेंद्र सिंह धोनी का फ़िल्म में कहीं कोई ज़िक्र नहीं है। फ़िल्म में धोनी (सुशांत सिंह राजपूत) और उनकी बहन (भूमिका चावला) का किरदार प्रभावशाली रहा है। अभिनय के मामले में सुशांत सिंह राजपूत का जवाब नहीं है, पहले ही फ्रेम से सुशांत धोनी दिखाई देने लगते हैं। अगर सुशांत की जगह कोई नामी सितारा होता तो शायद उन्हें धोनी के रूप में देखना कठिन होता।
सुशांत ने बॉडी लैंग्वेज में भी धोनी की छाप छोड़ जाते हैं। फ़िल्म की एडिटिंग भी बेहतरीन है, मैचों की क्लिपिंग में जिस अंदाज़ में खिलाड़ियों के साथ सुशांत सिंह राजपूत नज़र आते हैं, वह बिल्कुल असली मालूम पड़ता है। फ़िल्म के आख़िर में महेंद्र सिंह धोनी भी नज़र आए हैं, और उनके आते ही सिनेमाघरों में तालियों की गड़गड़ाहट और सीटियां बजने लगती हैं।

कुल मिलाकर धोनी के आलोचकों से लेकर प्रशसंकों तक को ये फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए, धोनी के फ़ैंस जहां इसे देखकर ख़ुश होंगे वहीं उनके आलोचकों को धोनी की ज़िंदगी को समझने और उनके यहां तक के सफ़र को देखने के बाद एक अलग अहसास अवश्य होगा। फिल्म में धोनी की ज़िंदगी से जुड़ी कुछ बातों का उल्लेख भले ही न हो, लेकिन फ़िल्म देखने लायक़ है।

****(4 स्टार)

काश ‘अज़हर’ का सच यही होता…

भारत में आप होश संभालते ही कुछ सीखें या न सीखें कुछ समझें या न समझें, लेकिन दो चीज़ ज़रूर समझ में आती है और वह है क्रिकेट और बॉलीवुड फ़िल्म।

मैं भी इन चीज़ों से अलग नहीं था, मुझपर भी क्रिकेट और फ़िल्म ने जादू की तरह असर किया था, उस वक़्त जहां मेरे ऊपर बॉलीवुड के सुपरस्टार आमिर ख़ान का भूत सवार था, तो क्रिकेट में अज़हर और सचिन तेंदुलकर का। मैं भी जब फ़ील्ड में उतरता था तो अज़हर की तरह कॉलर ऊपर रहता, बैटिंग करने वक़्त अज़हर की ही तरह ओपन स्टांज़ रहता और सचिन की तरह बॉटम हैंड का इस्तेमाल करता और हर चीज़ में आमिर ख़ान की तरह पर्फ़ेक्शन तलाशता या कोशिश करता।

ऑफ़ स्टंप के बाहर की गेंद को मैं भी चाहता था कि अज़हर की तरह स्कॉयर लेग की तरफ़ फ़्लिक कर दूं, लेकिन कभी आउट हो जाता तो कभी हाथों में दर्द हो जाता था। लेकिन वह जादू नहीं हो पाता था। सचिन और अज़हर को साथ साथ कई बार खेलते देखा, जो किसी सपने से कम नहीं था और आज भी दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ दक्षिण अफ़्रीका में इन दोनों के बीच 200 रनों से ज़्यादा की साझेदारी (शायद 222, अगर यादाश्त अच्छी है तो) आज भी ज़ेहन में ज़िंदा है।

और फिर अज़हर की वह पारी भी याद है जो इत्तेफ़ाक से दक्षिण अफ़्रीका के ऑलराउंडर लांस क्लूज़नर का पहला टेस्ट भी था और इडेन गार्डेन में जब क्लूज़नर के ख़िलाफ़ कोई भी भारतीय बल्लेबाज़ टिक नहीं पा रहा था, तब उस मैच में अज़हर ने बेहतरीन शॉट खेलते हुए भले ही टीम इंडिया को जीत न दिला पाई हो, लेकिन दिल ज़रूर ख़ुश कर दिया था।

इन सब के बीच जब मैच फ़िक्सिंग की ख़बर आई, तो हम जैसे क्रिकेट फ़ैंस जो क्रिकेट को जीते थे उनका न सिर्फ़ दिल टूटा था, बल्कि अज़हर से नफ़रत तक हो गई थी। बिना सच्चाई जाने, जो अज़हर के अलावा शायद ही कोई और जान भी पाए।

अज़हर की पर्सनल लाइफ़ क्या थी, कैसी थी, कितनी शादियां की थी, सच पूछो तो उस वक़्त इसकी कोई फ़िक्र नहीं होती। बस दिल को ठेस पहुंचती थी कि मैं जिसको इतना चाहता था, उसने भारत को कैसे कलंकित कर दिया। फिर धीरे धीरे वक़्त बीता और ऐसी उम्र में पहुंच गया जहां से भावनाओं और प्रैक्टिकल लाइफ़ का फ़र्क समझ आने लगा। फिर पता नहीं क्यों अज़हर से नफ़रत कम हो गई थी, और फिर वह मैच फ़िक्सिंग की बातें भूला तो नहीं पाया था लेकिन उसको लेकर और अज़हर को सोच कर दर्द नहीं होता था।

और जब अब बॉलीवुड पर्दे पर अज़हर की पूरी ज़िंदगी को 2 घंटों में दिखाने की बात आई, तो मैं कैसे चूक सकता था। मैंने देखा और जो पाया वह यही है कि बचपन से लेकर अब तक के अज़हर को टोनी डीसूज़ा ने हू-ब-हू उतारने की कोशिश की है। इमरान हाशमी जिन्होंने इससे पहले भी क्रिकेट पर एक फ़िल्म की थी (जन्नत), लेकिन इस फ़िल्म में न उन्होंने सिर्फ़ कमाल की अदाकारी की है बल्कि अज़हर के उन मैजिकल फ़्लिक शॉट, उनके चलने का अंदाज़, यहां तक की बैटिंग का स्टांज़ हर एक चीज़ में ख़ुद को ढाल लिया।

अब बात उस चीज़ की, जो शायद हर क्रिकेट फ़ैन या फिर अज़हर फ़ैन आज भी सुनना चाहता है कि उनका फ़ेवरेट अज़हर बेगुनाह था। ज़ाहिर है ये एक फ़िल्म है और अज़हर की ज़िंदगी पर आधारित है तो इसका अंत अच्छा ही किया गया होगा। जो एक फ़ैन के लिए शानदार अंत है, मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि जिस तरह इस फ़िल्म में अज़हर को और उनकी कहानी को दिखाया गया है अगर वह सच होती, जो शायद हो भी सकती है तो एक बार फिर हमें अज़हर से प्यार हो जाता और सलाम करने का दिल करता।

फ़िल्म में हर एक पहलू और मैचों से लेकर खिलाड़ियों तक पर बारीकी से तो काम किया गया है, लेकिन यही बारीकियां कुछ क्रिकेटर्स की पर्सनल लाइफ़ और अज़हर के साथ उनकी दोस्ती की पोल भी खोल देती है। क्योंकि खिलाड़ियों का नाम तक नहीं छुपाया गया है आपको इस फ़िल्म में वह सारे खिलाड़ी मिल जाएंगे, जो कभी आपके और हमारे चहेते हुआ करते थे और हैं भी।

अज़हर की पहली पत्नी नौरीन का किरदार प्राची देसाई ने शानदार तरीक़े से निभाया है तो दूसरी पत्नी और बॉलीवुड अदाकारा संगिता बिजलानी के रोल में नरगिस फ़ाकरी ने भी ख़ूब बिजली गिराई है। सिवाय इमरान हाशमी के किसी भी बड़े चेहरे को फ़िल्म में न लेना बेहतरीन है, क्योंकि पूरी फ़िल्म में सिर्फ़ अज़हर ही अज़हर का स्कोप था, जिसमें इमरान हाशमी ने पूरा इंसाफ़ करने की कोशिश की है और किया भी है।

आख़िर में बस ये कहना चाहूंगा कि अगर आप भी क्रिकेट के दीवाने हैं और अज़हर और मैच फ़िक्सिंग प्रकरण ने आपको भी झकझोड़ा है तो इस बॉलीवुड फ़िल्म को ज़रूर देखिए और यादों को न सिर्फ़ ताज़ा कीजिए बल्कि श्रीलंका के ख़िलाफ़ अज़हर की 94 नॉट आउट मैच जिताउ पारी को एक बार फिर देखते हुए तालियां भी बजाइए।

सैयद की स्याही से रेटिंग: 4.5